सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

इतिहास ने खुद को दोहराया और बावन का हो गया हरदोई में लोप

बृजेश ‘कबीर’


बावन-हरियावां क्षेत्र 1967 में स्वतंत्र विधानसभा क्षेत्र के रूप में अस्तित्व में आया और कांग्रेस के प्रभुत्व वाले दौर में मतदाताओं ने सीट जनसंघ की झोली में डाल दी। जनसंघ के गंगाभक्त सिंह विधायी राजनीति के डेब्यू इलेक्शन में पहली बार बावन सीट से ही निर्वाचित हुए थे। इस सीट के मतदाताओं के जुदा अंदाज़ और मिजाज़ की ये तो सिर्फ बानगी है। 1974 में सीट रिज़र्व हुई तो वोटर्स ने फिर जनसंघ को उपकृत किया। लेकिन, 1996 में भाजपा से निर्वाचित हुए छोटेलाल कार्यकाल पूरा किए बगैर दिवंगत हुए तो उपचुनाव में सहानुभूति एकदम नहीं दिखाई और उनके भतीजे अनिल वर्मा के बरक्स बसपा से आए बाहरी शिवप्रसाद के विजय तिलक कर दिया। परिसीमन के बाद की 08 सीटों की चर्चा के क्रम में बावन-हरियावां सीट इसलिए रह गई थी, क्योंकि इसका बंटवारा सदर, गोपामऊ, सवायजपुर में होने से सिरा जोड़े नहीं जुड़ रहा था। चलिए, सुनाते हैं इस सीट की भूली-बिसरी कहानी …हुंकारी ज़रूर भरते रहिएगा-

आज़ादी के बाद हुए दो चुनावों 1951 और 57 में बावन-हरियावां क्षेत्र हरदोई ईस्ट नाम की दो सीटों (01 आरक्षित, 01 अनारक्षित) में शुमार था। 51 में आरक्षित सीट से कांग्रेस के किन्दर लाल 21247 और अनारक्षित सीट से चंद्रहास 27160 वोट लेकर पहले विधायक निर्वाचित हुए थे। क्रमशः एससीएफ के मेंडई लाल 9388 और निर्दल नरेन्द्र नाथ 9798 मत पाकर रनर रहे थे। 57 में आरक्षित सीट से कांग्रेस के बुलाकी राम 42530 और अनारक्षित सीट से महेश सिंह 41905 वोट हासिलकर विधानसभा पहुंचे। जनसंघ के क्रमशः झम्मन लाल 25165 और सुरेन्द्र नाथ 27280 मत के साथ रनर रहे थे।

1962 में गोपामऊ (रिज़र्व) सीट तस्वीर में आई और बावन का सदर और हरियावां का गोपामऊ में लोप हो गया। लेकिन, 1967 में बावन अनारक्षित सीट की शक़्ल में स्वतंत्र अस्तित्व के साथ सामने आई। पहले चुनाव में जनसंघ के गंगाभक्त सिंह 16047 वोट लेकर जीते और कांग्रेस के महेश सिंह 15312 मत पाकर करीबी मुक़ाबले में रनर रहे। एसडब्ल्यूए के आर0 लाल को 5853 और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इण्डिया के डी0एल0 आदमी को 4721 वोट हासिल हुए। 1969 में कांग्रेस के श्रीश चन्द्र अग्रवाल ने कांग्रेस से डेब्यू किया और 29768 वोट के साथ निर्वाचित हुए। जनसंघ के सिटिंग विधायक गंगाभक्त सिंह 24904 मत हासिल कर रनर रहे।

1974 में सीट रिज़र्व हो गई और जनसंघ के पूरन लाल 22799 वोट लेकर जीत गए। कांग्रेस के नत्थू लाल 17134 मत पाकर रनर रहे। आपातकाल के बाद 1977 में कांग्रेस के ख़िलाफ़ हवा के बीच सिटिंग विधायक पूरन लाल उसके सिम्बल पर लड़े और 21431 वोट हासिल कर लगातार दूसरी मर्तबा विधानसभा पहुंचे। जनता पार्टी के छोटेलाल 21172 मत के साथ क़रीबी मुक़ाबले में रनर रहे।

1980 में कांग्रेस के नत्थू लाल 16368 वोट लेकर जीते और भाजपा के छोटेलाल 15524 मत के साथ रनर रहे। निर्दल रामभजन को 10358 वोट मिले। कांग्रेस के स्थापित नेता किन्दर लाल जनता पार्टी (सोशलिस्ट) से उतरे और उन्हें महज़ 9034 मत हासिल हुए। 1985 में कांग्रेस के नत्थू लाल 17349 वोट लेकर दोबारा जीत गए और भाजपा से आए पूर्व विधायक पूरन लाल 15709 मत के साथ रनर रहे। डीडीपी के मलिखे राम को 3304 और लोकदल के आरके पंकज को 2837 वोट मिले।

1989 में दिग्गज नेता परमाई लाल के बड़े बेटे विपिन बिहारी जनता दल से डेब्यू किए और 23535 वोट लेकर जीत गए। इसी चुनाव में कांग्रेस के कद्दावर नेता किन्दर लाल के बेटे दिलीप कुमार ‘मुन्ना’ ने कांग्रेस से डेब्यू किया लेकिन 20762 मत पाकर रनर रहे। 1991 में मतदाता रामलहर पर सवार हो गए। भाजपा ने पुराने नेता छोटेलाल को नज़रन्दाज़ कर दयाराम वर्मा को उतारा और वह 23759 वोट लेकर जीते। भाजपा छोड़ बसपा से उतरे छोटेलाल 17979 मत के साथ रनर रहे। जनता दल के सिटिंग विधायक जनता पार्टी से आए अबकी लेकिन तीसरे पायदान पर खिसक गए और 14926 वोट ही पाए। कांग्रेस के पूर्व विधायक नत्थू लाल को 8148 और जनता दल के दिवाकर प्रसाद नाहर को 4181 मत मिले।

1993 का चुनाव सपा+बसपा ने गठजोड़ करके लड़ा और बसपा के खाते में आई इस सीट से छोटेलाल की साध पूरी हुई। वह 38464 वोट हासिल कर जीते और भाजपा के सन्दीप वर्मा 27440 मत लेकर रनर रहे। 1996 में बसपा ने छोटेलाल का टिकट काटा तो उन्होंने घर-वापसी कर ली और भाजपा के सिम्बल पर 45988 वोट हासिल कर लगातार दूसरी जीत दर्ज की। बसपा के उम्मीदवार सेवानिवृत्त आईपीएस रामस्वरूप पिप्पल 38110 मत के साथ रनर रहे। कांग्रेस (तिवारी) के पूर्व विधायक नत्थू लाल को 13525 और निर्दल वंशीधर को 9476 वोट मिले।

कार्यकाल के दौरान ही भाजपा विधायक छोटेलाल दिवंगत हो गए। पार्टी ने उनके पुत्र देवदत्त पर भतीजे अनिल वर्मा को तवज्जो दी और उपचुनाव में उतार दिया। सीएसएन महाविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे अनिल वर्मा को मतदाताओं ने नकार दिया। बसपा की झोली में दूसरी बार सीट गई और उसके प्रत्याशी शिवप्रसाद जीत गए। हालांकि, 2002 के आमचुनाव में भाजपा ने फिर अनिल पर भरोसा किया और अबकी वह 47803 मत के साथ जीत गए। सपा की राजेश्वरी देवी पति विपिन बिहारी जितनी खुशनसीब नहीं रहीं और डेब्यू इलेक्शन में 37589 वोट लेकर रनर रहीं। सिटिंग सीट पर बसपा तीसरे स्थान पर खिसकी और उसके उम्मीदवार रामकुमार को 25973 मत मिले। कांग्रेस के रामेश्वर प्रसाद को महज 1635 वोट हासिल हुए।

परिसीमन से पहले 2007 में इस सीट पर हुए अन्तिम चुनाव में भाजपा के सिटिंग विधायक अनिल वर्मा ने मैदान छोड़ा तो बसपा ने तीसरी बार बादशाहत कायम की। बसपा की राजेश्वरी देवी ने 51633 वोट लेकर पहली मर्तबा जीत का स्वाद चखा। अहिरोरी से सपा के सिटिंग विधायक श्याम प्रकाश ने अबकी साईकिल का रुख़ इस ओर किया लेकिन 30010 मत के साथ रनर रहे। भाजपा के प्रदीप कुमार ‘पीके’ को 14103 वोट मिले। कांग्रेस के संतोष कुमार को महज़ 1017 मत मिले। कांग्रेस से ज़्यादा वोट तो निर्दल हरिराम (1882) और राष्ट्रवादी कांग्रेस की लाडली (1237) को हासिल हुए।