कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

कविता : मृगमरीचिका

राश दादा राश (दार्शनिक/साहित्यकार)-

राश दादा राश, बंगालुरू

जमीं से उठता वो ;जो

आसमाँ नजर आता है

ये सही नहीं

वो आशियाँ बनाता है

बलुआई रेत के संशय
सुखद

लुभाए ,, ,, मृगमरीचिका

जो टूटे धैर्य का बन्धन

करूँ क्रन्दन ; मैं क्रन्दन ।।