गीत – दिल टूटा खिलौने की तरह, पर मैं तो मुसकाता रहा

जगन्नाथ शुक्ल..✍ (इलाहाबाद)

नज़्म-ए-वफ़ा अहल-ए-बज़्म में,मैं सदा गाता रहा।

दिल टूटा खिलौने की तरह,पर मैं तो मुसकाता रहा।।—२
अठखेलियाँ  करते  हैं  आँसू,
जब तब मेरे पलकों के भीतर,
हूँ विवश  मैं   इस  क़दर  कि-
घूँटता   भीतर    ही    भीतर।
शब्द हैं     चीत्कार     करते,फ़िर   भी   भरमाता रहा।
दिल टूटा खिलौने की तरह,पर मैं तो मुसकाता  रहा।।१।।
दुःख  हृदय  पर  नृत्य करता,
मैं    परुष    पाषाण   बनता।
जिसको समझता था कुसुम सम,
मुझको   बन   के शूल चुभता।
वर्जनाएँ  सब तोड़कर, वो रह-रह कर के उकसाता रहा।
दिल टूटा खिलौने की तरह,पर मैं तो मुसकाता  रहा।।२।।
वो      मेरी     तक़दीर   न थी,
मैंने    ही    तस्वीर   गढ़   ली।
प्रेम    के  दो    शब्द   से   ही,
मैंने इश्क़ का  संगीत कढ़  ली।
जब   नशे    की   लत लगी, मैं   डूबता -उतराता रहा।
दिल टूटा खिलौने की तरह,पर मैं तो मुसकाता  रहा।।३।।
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