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“जब घायल हुआ हिमालय ख़तरे में पड़ी आज़ादी….” के रचयिता राष्ट्रवादी अनन्य गीतकार और गायक प्रदीप जी (इलाहाबाद) को नमन!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

आज (११ दिसम्बर) ”ऐ मेरे वतन के लोगो! ज़रा आँख में भर लो पानी” गीत के प्रणेता श्री रामचन्द्र द्विवेदी ‘प्रदीप’ की पुण्य तिथि है। प्रदीप जी ने दारागंज, इलाहाबाद (उत्तरप्रदेश) से हाई स्कूल और इण्टरमीडिएट की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की थीं, जो मेरे निवास से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

ज्ञातव्य है कि इलाहाबाद के साहित्यिक परिवेश में प्रदीप जी को राजर्षि टण्डन जी, महीयसी महादेवी जी, बच्चन जी, बालकृष्ण राव जी, पद्मकान्त मालवीय जी, निराला जी इत्यादिक का सान्निध्य प्राप्त हुआ था, जिससे उनके साहित्यिक प्रातिभ सामर्थ्य का विस्तार हुआ था। कालान्तर में, वे अपने निष्ठा और समर्पण-भाव के साथ काव्य-यात्रा करते हुए, एक ऐसे शिखर पर समासीन हुए, जहाँ आज तक कोई भी प्रतिष्ठित नहीं हो सका है।

भारत चीन से पराजित हो चुका था। ऐसे में, भारतीय सेना के मनोबल को उत्साह, उमंग तथा ऊर्जा देने के उद्देश्य से प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू जी ने २६ जनवरी, १९६३ ईसवी को बम्बई में देशभक्ति से ओत-प्रोत एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन कराया था, जिसमें विशेष रूप से प्रदीप जी से देशभक्ति-निस्सृत एक गीत सर्जन करने का आग्रह किया गया था। उस शौर्य-समारोह के लिए प्रदीप जी ‘परम्परा’ से पृथक् अनन्यता की साहित्यिक-सांस्कृतिक सृष्टि करना चाहते थे। वे इसी उधेड़बुन में सान्ध्य-बेला में ‘माहिम’, बम्बई में वैचारिक भ्रमण कर रहे थे कि अकस्मात् उनके होठ स्पन्दित हो उठे। उन्होंने तत्काल सिगरेट का एक पैकेट ख़रीदा और उसी पर उस गीत का बोल लिपिबद्ध कर दिया था, ताकि भविष्य का वह ‘कालजयी’ बोल विस्मृत न हो सके।

उक्त तिथि पर स्वर-साम्राज्ञी लतादीनानाथ मंगेशकर जी ने जैसे ही दीर्घ अलाप भरते हुए और “ऐ मेरे वतन के लोगो!” की तान छेड़ते हुए, अधराधर को संस्पर्शित किया था, दसों दिशाएँ सन्नद्ध हो उठीं और सम्पूर्ण प्रकृति की क्रियाशीलता मन्त्रमुग्ध हो उठी। शब्दशिल्प, लय, गति-यति का ऐसा सम्मोहक प्रभाव हुआ कि सम्पूर्ण परिवेश कारुणिक हो उठा और पं० नेहरू जी-सहित सहस्रों अभ्यागतवृन्द अपने अश्रु-प्रवाह पर नियन्त्रण न कर सके थे।

चलचित्र-जगत् में अभिनव और अप्रतिम अध्याय के अनन्य सर्जक प्रदीप जी को ‘मुक्त मीडिया’ की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज;२०१९ ईसवी)

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