सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

टीपू… द मैन इन एक्शन

विवेकानन्द सिंह (युवा पत्रकार / विचारक), बिहार-


सियासत एक ऐसी कुश्ती है, जहां मिनटों में खेल का मिजाज बदलता रहता है। फ़िलहाल, उत्तर प्रदेश में चल रहे सियासी घमासान में एक जीत तो टीपू यानी अखिलेश यादव ने हासिल कर ही ली है। खास बात है कि पिता के ऊपर टीपू को मिली इस जीत में मुलायम की जीत भी छिपी हुई है।

अगर, आप यह सोच रहे हैं कि बाप-बेटे की लड़ाई में नुकसान समाजवादियों का होगा, तो फिर आप भूल कर रहे हैं। आज उत्तर प्रदेश में समाजवाद की एक नयी धारा प्रस्फुटित हुई है। यह धारा समतामूलक विकास की परिपाटी व परिकल्पना के साथ जनता के सामने आयी है। इस धारा का स्लोगन है कि “काम बोलता है।”

सही मायने में परेशान होने का समय उनके लिए है, जिन्हें समाजवादी 2017 के उत्तर प्रदेश चुनाव की रेस में ही नहीं दिख रहे थे। अब उत्तर प्रदेश में टीपू के विकास के इरादों की लड़ाई के आगे दूसरी पार्टियों में साफ़ चेहरों का घोर अकाल नज़र आ रहा है। आखिर, ऐसा टीपू ने क्या किया? दरअसल, टीपू ने उत्तर प्रदेश की आम आवाम के दिल में तो पहले ही जगह बना ली थी, बस पिता और चाचाओं के ग्रहण की वजह से इनकी काबिलियत बौनी नज़र आती थी। आज जैसे ही उस ग्रहण से टीपू बाहर निकले हैं, इनकी शख्सियत यकायक बदल-सी गयी है।

बाप से लड़कर बेटे ने न सिर्फ बाप के लिए जीत की संभावनाओं के द्वार खोल दिये हैं, बल्कि समाजवाद की एक नयी जमीन तैयार कर दी है। स्थिति यहां तक बन चुकी है कि सबसे बड़ी पार्टी बन कर अगर समाजवादी आते हैं, तो भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियां भी इन्हें समर्थन दे सकती हैं।

जीत के सपने संजोये बैठी भाजपा के लिए टीपू हर अगले दिन बड़ी चुनौती बनता जा रहा है, भाजपा इस स्थिति में भी नहीं है कि वे यह बोल सकें कि वे जीते तो फलाना या ढिमका को मुख्यमंत्री बनायेंगे। लोग जानते हैं कि बसपा जीती तो माया सीएम होंगी, सपा जीती तो टीपू सीएम होंगे, लेकिन अगर भाजपा जीतती है तो सीएम कौन होगा? यह यक्ष प्रश्न है!

अभी अगर भाजपा ने किसी ब्राह्मण का नाम आगे किया, तो अन्य सवर्ण नाराज़ होंगे, अगर ठाकुर को आगे किया तो ब्राह्मण नाराज़ होंगे। पिछले साल, भाजपा द्वारा पिछड़ा प्रदेश अध्यक्ष बनाने का फैसला इसी उम्मीद में लिया गया है कि यूपी में यादवों से नाराज़ कुछ भी पिछड़े आ गए तो भाजपा के लिए बोनस का काम करेंगे। लेकिन, अभी तो मानना पड़ेगा, अखिलेश-मुलायम की राजनीति को। जियो टीपू!