‘डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ में जानें शब्दों का शुद्ध रूप

हिन्दी के शब्दों का उचित रूप जानें और इन्हें प्रयोग में लाएं

भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

“लम्हों ने ख़ता की, सदियों ने सज़ा पायी”

शताब्दियों से हमारे अधिकतर विद्वज्जन, शिक्षकवर्ग लेखकगण तथा विद्यार्थीवृन्द उच्चारण और लेखनगत अनुशासन की अवहेलना करते आ रहे हैं, जो कि सर्वथा अनुचित है; कारण कि अधिकतर समझते हैं कि वे जिन शब्दों का अपने वाक्यों के अन्तर्गत प्रयोग करते समय, जिस अक्षरी (वर्तनी) का उपयोग करते हैं, वही ‘अन्तिम’ है; और उनकी यही अवधारणा उन्हें शब्द-संसार में ‘अपंग’ बना देती है। किसी को भी ‘कूपमण्डूक’ (कुएँ का मेढक) नहीं, प्रत्युत ‘महासागर की ह्वेल’ (एक प्रकार की विशालकाय मछली) बनने की ओर अग्रसर रहना चाहिए।

आपको ज्ञानार्जन की दिशा में अपनी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का सजग और सचेष्ट करते हुए, विस्तार करना होगा; साथ ही कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा और शक्ति को जाग्रत करते हुए, ‘अ से अ:’ और ‘क से ज्ञ’ तक के शब्द-साम्राज्य पर शासन करने के लिए स्वयं को अभियोग्य सिद्ध करना होगा, तभी ‘शब्दानुशासन’ की परिव्याप्ति संलक्षित होगी।

आइए! शब्दसिन्धु में स्वयं को एक बूँद का सहस्रांश स्वीकार करते हुए, ज्ञानावगाहन करें।

यहाँ वे शब्द दिये गये हैं, जिनका हमारा बौद्धिक वर्ग अन्धभक्ति-भाव के साथ प्राय: व्यवहार करता आ रहा है। उसका प्रयोग कितना शुद्ध होता है और कितना अशुद्ध; आइए! परीक्षण करते हैं :—

नीचे कुछ शब्द दिये गये हैं। जो शब्द ‘लघु कोष्ठक’ के अन्तर्गत दिये गये हैं, वे शुद्ध हैं। अब कृपया इन शब्दों का अवलोकन करें, फिर स्वयं से यह प्रश्न करें— अब तक की जा रही अशुद्धियों के लिए कौन उत्तरदायी रहा है?

१- अनाधिकार (अनधिकार) २- अनाधिकृत (अनधिकृत) ३- गृहणी (गृहिणी)
४- प्रज्जवलन (प्रज्वलन) ५- कार्यकत्री (कार्यकर्त्री) ६- रंग-बिरंगे (रंग-विरंगे)
७- पाठ्येत्तर (पाठ्येतर) ८-साहित्येत्तर (साहित्येतर) ९- बहुत अधिक संख्या में (बहुत बड़ी संख्या में) १०- बहुत बड़ी मात्रा में (अत्यधिक मात्रा में) ११- सृजन (सर्जन) १२- अनुग्रहीत (अनुगृहीत) १३- सच्चाई (सचाई) १४- सौहार्द्र (सौहार्द) १५- भारी बहुमत से (बहुमत से) १६- अत्यन्त ही (अत्यन्त) १७- अज्ञानता (अज्ञान)
१८- निरोग (नीरोग) १९- निर्दयी (निर्दय) २०-स्वजनों-परिजनों (स्वजन-परिजन)
२१- आर्ट्स (आट् र्स) २२- आध्यात्म (अध्यात्म) २३- चाहिये (चाहिए)
२४- काबिलियत (क़ाबिलीयत)
२५- शख़्सियत (शख़्सीयत) २६-विद्वान्/महिला विद्वान् महिला (विदुषी) २७- वृहद् (बृहद्) २८- पूर्वाग्रह (पूर्वग्रह) २९- बहुत बेहतर (बेहतर) ३०- सबसे बेहतरीन (बेहतरीन) ३१- हिन्दी से एम.ए. (हिन्दी में एम०ए०) ३२- विशिष्ठ (विशिष्ट) ३३- विशिष्टताओं (वैशिष्ट्य/विशेषताओं) ३४- बसन्त-ऋतु (वसन्त-ऋतु) ३५- ऐलान (एलान) ३६- अहम् भूमिका (अहम भूमिका) ३७- अहमियत-एहमियत (अहम्मीयत) ३८- फ़ितरत (फ़ित्रत) ३९- पूज्यनीय (पूजनीय/पूज्य) ४०- तत्कालिक (तात्कालिक) ४१- एतिहासिक-एतेहासिक (ऐतिहासिक) ४२- गण्यमान (गणमान्य) ४३- परलौकिक (पारलौकिक) ४४- सहस्त्र (सहस्र) ४५- व्यवसायिक (व्यावसायिक) ४६- हस्ताक्षेप (हस्तक्षेप) ४७- प्रत्यार्पण (प्रत्यर्पण) ४८- अन्ताक्षरी (अन्त्याक्षरी)
४९- इन्तज़ार (इन्तिज़ार) ५०- इन्तकाम (इन्तिक़ाम) ५१- इन्तकाल (इन्तिक़ाल)
५२- इन्तजाम (इन्तिज़ाम) ५३- पश्चाताप (पश्चात्ताप) ५४- प्रायश्चित (प्रायश्चित्त)
५५- मजदूर-मजदूरी (मज़्दूर-मज़्दूरी)
५६- मज़बूर-मज़बूरी (मज्बूर-मज्बूरी)
५७ मजबूत-मजबूती (मज़्बूत-मज़्बूती
५८- बवाल (वबाल) ५९- परिवर्तन (परिवर्त्तन) ६०- कूबत-कुबत (क़ुव्वत)
६१- नकल (नक़्ल) ६२- दरअसल (दरअस्ल) ६३-उपरोक्त (उपर्युक्त) ६४- आद्यान्त (आद्यन्त) ६५- प्रवाहमान (प्रवहमान)
६६- प्रमाणिक (प्रामाणिक) ६७- गत्यावरोध (गत्यवरोध) ६८- लिप्यान्तरण (लिप्यन्तरण) ६९- अधिशासी (अधिशाषी)
७०- प्रत्युतपनमति (प्रत्युत्पन्नमति)
७१- विद्ववतजन (विद्वज्जन) ७२- अनुषांगिक-आनुषांगिक (आनुषंगिक) ७३- अनुवांशिक-आनुवांशिक (आनुवंशिक) ७४- प्राकृतिक आपदा (आपदा) ७५- बिल्कुल (बिलकुल) ७६- नौरात्रि-पर्व (नवरात्र-पर्व) ७७- सन्यासी (संन्यासी) ७८- बाहर निकल जाना (बाहर निकल आना) ७९- वधु (वधू) ८०- अभ्यस्थ (अभ्यस्त) ८१- मत्योपरान्त (मृत्यूपरान्त) ८२- शोधछात्र-शोधछात्रा (शोधच्छात्र-शोधच्छात्रा) ८३- भेदना१ (बेधना)
८४- तत्व-महत्व (तत्त्व-महत्त्व) ८५-सक्षम (क्षम) ८६- सशक्त (शक्त) ८७- शुद्धिकरण (शुद्धीकरण) ८८- सशक्तिकरण (शक्तीकरण) ८९- सुश्रूषा (शुश्रूषा)
९०- महन्थ (महन्त) ९१- परिछेद (परिच्छेद) ९२- छत्रछाया (छत्रच्छाया) ९३- छत्रिय (क्षत्रिय) ९४- पुनर्जीवित (पुनरुज्जीवित) ९५- पुनर्जीवन (पुनरुज्जीवन)
९६- अन्तर्स्थापन (अन्तरस्थापन) ९७- रोशनी (रौशनी) ९८- वाङ्गमय (वाङ्मय) ९९- महिला नेत्री (नेत्री) १००- मिष्ठान्न (मिष्टान्न) १०१- परिशिष्ठ (परिशिष्ट) १०२- प्राणप्रण (प्राणपण)१०३- वीभत्स (बीभत्स) १०४- शायद ही (शायद)।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ८ जुलाई, २०१९ ईसवी)।

url and counting visits