दिल्ली में भक्त से ‘भगवान्’ हारे

भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

तो क्या पाकिस्तान जीत गया? तो क्या आतंकवाद जीत गया? तो क्या हनुमान् किसी की निजी सम्पदा हैं?

यह देश का ऐसा पहला चुनाव था, जिसमें किसी मुख्यमन्त्री ने इस आशय की बात सुस्पष्ट शब्दों में सार्जनिक भाषण करते हुए कही थी– मैंने यदि काम किया है तो आप मुझे ‘वोट’ देना और यदि नहीं किया है तो ‘वोट’ मत देना। ऐसे में, एक तीर से दो शिकार करनेवाले अरविन्द केजरीवाल ने विपक्षी दलों को निरुत्तर कर दिया था। ऐसा इसलिए कि यदि विपक्षी दल अरविन्द केजरीवाल पर अकर्मण्य होने का आरोप करते तो उसका कोई अर्थ नहीं होता। हुआ यही कि भारतीय जनता पार्टी और काँग्रेस ने जिस तरह के और तरीक़े से आरोप मढ़े थे, उसका कोई औचित्य नहीं था। वे सभी आरोप नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के गले का फाँस बन चुके थे।

भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता अमित शाह को तोल-मोल कर बोलना चाहिए था और काँग्रेस के प्रमुख नेता राहुल गांधी को अपनी विकृत मनोवृत्ति को संस्कृति की ओर ले जाना चाहिए था। नरेन्द्र मोदी को अपनी विषैली राजनीति त्यागनी होगी, अन्यथा वही उन्हें खा जायेगी।

देश के उन राज्यों में, जहाँ भारतीय जनता पार्टी का शासन है, वहाँ के अधिकतर मुख्यमन्त्री, केन्द्र-शासन के अधिकतर केन्द्रीय मन्त्री, सांसद, विधायक इत्यादिक दिल्ली-विधानसभा के चुनाव के समय वहाँ ‘खूँटा’ गाड़कर जम गये थे; घर-घर जाकर प्रचार करते रहे; परन्तु दिल्ली की जनता का सुनिश्चय डिगा नहीं सके; निर्णय बदल नहीं सके। जिस करेण्ट के झटके को अमित शाह शाहीनबाग़ में आन्दोलनरत महिलाओं-बच्चों तक पहुँचाना चाहते थे, वही करेण्ट ‘आम आदमी पार्टी’ की ओर सेे ‘अण्डर करेण्ट’ के रूप में ऐसा प्रवाहित हुआ था कि उसे अमित शाह समझ नहीं सके अथवा समझना नहीं चाहते थे; परन्तु दिल्ली की जनता ने अच्छी तरह से समझा दिया है कि राजनेताओं से अधिक ख़तरनाक ‘आम आदमी’ का करेण्ट’ घातक होता है।

‘गुजरात मॉडल’, ‘न्यू इण्डिया’, ‘सम्प्रदायवाद की राजनीति’ तथा ‘भड़कीले वक्तव्य’ पूरी तरह से असफल सिद्ध हुए हैं। प्रमुख विपक्षी नेता आदित्यनाथ योगी ‘बोली का जवाब गोली’ से देने के लिए अपने कार्यकर्त्ताओं को भड़काते रहे। भारतीय जनता पार्टी के सांसद प्रवेश वर्मा ने अरविन्द केजरीवाल को ‘आतंकवादी’ कहा था। कपिल मिश्र के विषैले बोल उनके ही दल के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध हुए हैं। नकारा मनोज तिवारी ऊटपटाँग बोलते रहे। इनके अतिरिक्त अन्य विपक्षी नेता-नेत्रियों ने भी ज़ह्र उगली थीं।

विपक्षियों, विशेषत: भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता– नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को अपने अन्तरात्मा के साथ संवाद कर, भविष्य में, देश की राजनीति में भारत-पाकिस्तान, हिन्दू-मुसलमान, आतंकवाद-आतंकवादी-जैसी शब्दावली के प्रयोग से बचना होगा। उन्हें सिर्फ़ ‘भारत’ का विकास करना होगा और यह तभी सम्भव है जब यहाँ की जनता ख़ुशहाल रहेगी; ख़ुशहाल रहेगी जब उसकी मूलभूत आवश्यकताएँ पूर्ण होती रहे।

सच तो यह है कि ‘जय श्री राम’ की उद्धत गर्जना करनेवालों का साथ भी श्री राम नहीं दे सके; क्योंकि उन्हें अपने अनन्य भक्त हनुमान् के सम्मुख पराजित होना पड़ा है। श्री राम ज़ुम्लेबाज़ी नहीं करते; उन्हें स्मरण है कि उन्होंने कभी कहा था, “हम भक्तन के भक्त हमारे”, “मोरे मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा।।”

भगवान् अधर्मियों का साथ नहीं देता; वह तो प्रेम का भूखा होता है, फिर जहाँ पर उनके भक्त का भक्त गा रहा हो, “जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीश तिहुँ लोक उजागर”, उसका कोई अनिष्ट कैसे कर सकता है? उल्लेखनीय है कि आज ‘मंगलवार’ भी है। भक्त के भक्त का अपमान करने वाले आज मुँह के बल धराशायी हो चुके हैं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ११ फ़रवरी, २०२० ईसवी)

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