रूप और कला का संघर्षण

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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रूप ने कला से कहा :–
तेरा दृष्टि-अनुलेपन है अनुपम,
तू रूप को सुरूप करती है।
विरूप को कुरूप रचती है
तू सुरूप को विद्रूप बनाती है।
तू रंग-रोगन करती है
और उकेरी गयी व्यथा-कथा को,
एक निर्मम ठहराव देती है;
तो कभी सम और सह-अनुभूति की
चादर से उसका शील ढककर
सदाशयता का मरहम लगाती है।
रूप की मासल पीड़ा को,
तू सवर्ण करती है तो कभी विवर्ण।
कातर नज़रें,
निगाहों मे धँस जाती हैं।
एक गहरी सुरंगनुमा
वेदना का आकार,
सिसकियों के आस-पास
घेरा डाल देता है।
आँसू की पहचान धुलने लगती है;
रुदन की अवधारणा पहचान खोने लगती है।
अपने अस्तित्व की तलाश मे,
रूप और कला की अनथक यात्रा
एक अन्तहीन सिलसिला है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ सितम्बर, २०२३ ईसवी।)