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विश्व दिव्यांगजन दिवस पर विशेष : सच से दूर दिव्यांगों की दुनिया

 अभिषेक सिंह (सहसंपादक)


सुलतानपुर – घने कोहरे और गिरते पारे के बीच एक वृद्ध महिला गोपाल दास पुलिया पर भीख माँगने बैठी है । यह वृद्ध महिला दोनों पैरों एवं आँखों से दिव्यांग है और गोपाल दास पुलिया विकास भवन , कलेक्ट्रैट और सूचना विभाग के बिल्कुल बगल में दिखती है । जिलाधिकारी एवम अन्य विकास अधिकारियों के आवागमन का मुख्य मार्ग भी यही है पर किसी भी अधिकारी की नजर इस वृद्ध महिला पर नहीं पड़ी और आज पूरी दुनिया विश्व दिव्यांगजन दिवस मनाने की तैयारी में है । यह सच्चाई तो यही बयां करती है की ” किताबों में छपते है इबादत के किस्से , हकीकत की दुनिया में कुछ भी नहीं है ।” एक बात और प्रकाश में आती है कि न जाने कितने और दिव्यांग इस निरंकुशता के शिकार हो रहे है जिनको न तो बड़े – बड़े वायदे करने वाले नेता पूछते है और न ही पद एवं गोपनीयता तथा समाज के विकास की शपथ लेने वाले नौकरशाह पूछते है । फिलहाल यह महिला अपना नाम नहीं बता पाती है । अगल बगल वालों से पूछने पर पता चला कि इस महिला को कोई सुबह छोड़ जाता है और फिर शाम को लेकर चला जाता है ।


दिव्यांग दिवस के मुख्य बिंदु


 संयुक्त राष्ट्र संघ ने 3 दिसम्बर 1991 से प्रतिवर्ष अन्तरराष्ट्रीय विकलांग दिवस को मनाने की स्वीकृति प्रदान की थी। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1981 को अन्तर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस के रूप में घोषित किया था।सयुंक्त राष्ट्र महासभा ने सयुंक्त राष्ट्र संघ के साथ मिलकर वर्ष 1983-92 को अन्तर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस दशक घोषित किया था । भारत में दिव्यांगों से संबंधित योजनाओं का क्रियान्वयन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन होता है।


अन्तर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस के बारे में


अन्तर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस का उद्देश्य आधुनिक समाज में शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के साथ हो रहे भेद-भाव को समाप्त करना है। इस भेद-भाव में समाज और व्यक्ति दोनों की भूमिका रेखांकित होती रही है। भारत सरकार के किये गए प्रयास में, सरकारी सेवा में आरक्षण देना, योजनाओं में विकलांगो की भागीदारी को प्रमुखता देना, आदि को शामिल किया जाता रहा है।