व्यंग्य : आजकल के दोस्त

कवि : सितांशु त्रिपाठी

आज जब मुझे लगा कि शायद न अब हैं मेरे भविष्य का कोई ठिकाना ,

तब सारे नौकरी वाले दोस्तों ने कहा नौकरी न लगे तो बिल्कुल न तुम घबराना ,

आएंगे हम जिन शहरों से उन्हीं किसी रेलवे स्टेशन पर दुकान तुम अपनी एक लगाना ,

आएंगे हम उतर के खाने और पीने तुम्हारे यहाँ बस अच्छी चाय और पकौड़े तुम बनाना,

किसी और से मिल पायेंगे या नहीं पर तुमसे मिलने का हमें भी मिल जायेगा एक बहाना,

बस इतना याद रखना कि तब हम थोड़ा ऊँचा सुनेंगे तो जरा तेज-तेज से तुम चिल्लाना,

जरुरत पड़े कभी जो तुम्हें तो बिन कुछ सोचे बस एक फ़ोन तुम घुमाना,

और जरूरत पड़े कभी जो पैसों की तो सबसे पहले मुझको ही तुम बताना ,

अरे दे देना जब होंगे पास तुम्हारे बस ब्याज सहित तुम चुकाना,

और बुलाएँगे अपनी शादी में हम तुमको वहाँ भी एक अच्छी सी दुकान सजाना,

दोस्त हैं थोड़े पैसे कम ही ले लेना पर न किसी को तुम बताना,

निभाएंगे हम अपनी दोस्ती कुछ इस कदर कि याद रखेगा हमें और तुम्हें ये जमाना ।

स. सूत्र – 9399851765  जिला – सतना, मध्यप्रदेश

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