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शरलीन इमाम के विरुद्ध अभी तक त्वरित काररवाई क्यों नहीं की गयी?

भाषाविद्-समीक्षक आचार्य पं॰ पृथ्वीनाथ पाण्डेय

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

शरलीन/सरलीन/शर्लीन इमाम के बयानात बेहद ज़ह्रीले हैं, जो अलगाववादी ताक़तों का मनोबल बढ़ा रहे हैं। उसकी दो बातें शोचनीय हैं :– पहली, हम असम को भारत से अलग कर देंगे और दूसरी, महात्मा गांधी ‘फासिस्ट’ थे।

जे० एन० यू० के उक्त पूर्व-छात्रसंघनेता के वक्तव्य से निस्सन्देह, पृथकतावादी ‘मुसलिम लीग्’ के विश्वासघाती नेताओं के ‘द्विराष्ट्र-सिद्धान्त’ की झलक मिल रही है। अलगाववाद का राग अलापनेवाले ऐसे विश्वासघातियों के लिए भारत में कहीं-कोई स्थान नहीं है।

बेशक, देश की सरकार की प्रत्येक असंवैधानिक और अलोकतान्त्रिक कार्यों की तीव्र भर्त्सना की जानी चाहिए; किन्तु भारत राष्ट्र के अस्तित्व और उसकी अस्मिता के विरुद्ध किसी भी प्रकार का भ्रामक प्रचार-प्रसार नहीं किया जाना चाहिए और यदि कोई भी व्यक्ति अथवा कोई संस्था वैसा करती है तो उसे एक घातक ‘राष्ट्रविरोधी’ के रूप में देखा जाना चाहिए और उसके विरुद्ध समुचित काररवाई की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में अलगाववादी ताक़तें एक बार फिर से गरदन न उठा सकें। खेद है, जहाँ पहली ओर, सामान्य प्रकार की गतिविधियों को लेकर देश के प्रतिष्ठित लोग को दिल्ली की पुलिस घसीटते और धक्का देते हुए बन्दी बना लेती है, वहीं शरलीन-जैसे पृथकतावादी शक्तियों के सम्मुख वही दिल्ली की सरकार फ़िलहाल, घुटने टेकती-सी दिख रही है।

अपनी हर बात को “डंके की चोट पर” कहनेवाले गृहमन्त्री अमित शाह उक्त विषय पर मौन क्यों साधे हुए हैं?

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २६ जनवरी, २०२० ईसवी)

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