संस्मरण : मेला और समाज

लेखक- उपेंद्र सिंह /सोनू (ग्राम-कनकुआ, पोस्ट-ताखा, जिला-इटावा)

इम्तिहानों से पार पाने के बाद ननिहाल जाने की ऐसी कोई चाहत नहीं हुआ करती थी लेकिन एक लक्ष्य ज़रूर होता था । गेहूँ की कटाई कब शुरू होगी ? जानते हैं ! यहाँ एक ऐसा मैच होता था जिसे खेलने और जीतने में बराबर मज़ा आता था । अब पूछो वो कैसे ? तो सुनो ! गेहूँ की कटाई होने के बाद कुछ बालियां खेतों मे ही छूट जाती थीं और हम सब इन्हें इकट्ठा करते थे । इससे जो हमारी कमाई होती थी, वो हमारी पूँजी थी जो मेले मे खर्च करते थे । यकीन मानिए इसमें हमारे बाबा लोग बिल्कुल चालाकी नहीं करते थे । हमारी सारी मेहनत की कमाई हमें ही मिलती थी । हाँ कई बार अगर गेहूँ कटाई मशीन की कमी की वजह से ज़्यादा अनाज अवशेष के रूप में बचता था तो फिर बाबा की नीयत खराब हो जाती थी (मज़ाक है प्यार भरा) । इस स्थिति में बाबा कुछ मेहनताना काट लेते थे । लेकिन हम तब भी खुश होते थे । क्योंकि गणित तो हमारा प्रारंभ से ही ठीक था ? ज़्यादा अवशेष, ज़्यादा संग्रहण और ज़्यादा कमाई (लागत-लाभ विश्लेषण) ।

मंगल भैया और इमरान भाई सुत्त (याद) है तुम्हे ? उस समय हम नंगे पैर ही जेठ की दोपहरी में सारे खेत नाप दिया करते थे । एक जोड़ी वो भी प्लास्टिक वाली चप्पलें थीं जो कहीं आने जाने के लिए संभाल के रखनी पड़ती थीं । कभी-कभी तो कटी फसल के वो डंठल पैरों के तलवे फाड़ देते थे । लेकिन मज़ाल कि घर पे कोई जान पाए । मटकी की फूटी हुई गोटियाँ ही हमारी मल्लम-पट्टी होती थी । इससे हम उस घाव को तब तक दबाए रहते थे जब तक कि खून आना बंद ना हो जाए ।

पढ़ने वालों अब दिमाग़ मत लगाने लगना कि इससे तो टिटेनस हो जाता होगा । कुछ नहीं होता था । बल्कि उसके बाद भी लकड़ी की डंडी और पुराने टायर की रेस लगाया करते थे ।

हाँ तो बात चल रही थी मेले की । हम आठ आने की चाट और जलेबी खा के काली माई के मंदिर के सामने वाले नल से पानी पीते और फिर निकल जाते बकरियाँ चराने । एक बात और थी अगर मेले के चक्कर में बकरियाँ चराने नहीं गये तो बाबा का बेंत तैयार रहता था हम पर प्यार बरसाने को । कई दिनों तक मेला चलता था और आख़िरी दिन होती थी “नौटंकी वाली रात” । क्या बच्चे, क्या बूढ़े सब के सब जाते थे नौटंकी देखने ? इसमें कोई ना कोई एक ऐसा किरदार होता था जो सबसे चर्चित होता था । लोग उसकी कला की खूब तारीफ़ करते थे । पर मैं हमेशा खुद से एक प्रश्न करता था कि ये जो किरदार जिनकी इतनी तारीफ़ होती है, वो हम ठाकुरों के चबूतरे पे क्यों नही चढ़ सकते थे । वो हमारे साथ घर की थाली में खाना क्यों नही खा सकते थे ? जानते हैं ये किरदार अक्सर स्त्रियाँ हुआ करती थीं, जिन्हे लोग सिर्फ़ मनोरंजन का साधन समझते थे । इनके अपने उपनाम होते थे । आज मैं खुद को इन शब्दों से महरूम नहीं रख सकता (प्यासा सिनेमा, गुरुदत्त साहब, साहिर लुधियानवी के वो शब्द….)
ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां ज़िन्दगी के
कहाँ हैं, कहाँ हैं मुहाफ़िज़ खुदी के
जिन्हे नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं ?

तो मेले और समाज में ‘समाज वाला कोना’ मेरी इन्हीं तकलीफ़ों की ओर है । आज नर्तक-नर्ताकियाँ, जादूगर, हास्य कलाकार, शायर आदि सब के सब हमारे आदर्श हैं । यहाँ तक कि चुनावों में पर्चा दाखिल भर कर दें, जीत तो सुनिश्चित है । यकीन मानिए ये बहुत गर्व की बात है । लेकिन फिर वही, जो चले गये उनका क्या कसूर था ? क्या समाज के ठेकेदार अपने पुरखों के किए का पछतावा करेंगे ? मैं आरक्षण पे तो अब विश्लेषण चाहता ही नही हूँ । किसका आरक्षण भैया ? क्या वो महिला जिसको हम हिना बुलाते थे, वापस आएगी आरक्षण लेने ? नहीं मित्र नहीं…..कभी नही…. !

हम भी अब जीवन और तरक्की में ऐसे बहे कि न मेला याद रहा और न समाज की वो घिनोनी सोच । तर्क करते हैं कि राजनीति में क्या चल रहा है ? दिमाग़ की नसें तानना बंद कीजिए । एक बार अकेले मे बैठकर, आखें मींचकर उस मेले की याद में जाइए, समाज खुद ब खुद बदल जाएगा । मोहब्बत करके तो देखिए बहुत मज़ा आएगा । क्योंकि हम, मंगल भैया और इमरान तो आज भी उसी अंदाज में जी रहे हैं ।

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