सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

सण्डीला के लड्डू हैं अपनी जगह, सियासत का स्वाद बदलते रहे लोग (अतीत का आलाप)

बृजेश ‘कबीर’ / स्वतन्त्र पत्रकार (अन्तर्ध्वनि)-


राजधानी से सटी इस विधानसभा सीट का इतिहास बेहद दिलचस्प है। पहली विधानसभा को छोड़ दें तो बाद की 03 विधानसभा के लिए मतदाताओं ने कांग्रेस को ठेंगा दिखा दिया। 1969 जाने दें तो बाद की लगातार 02 विधानसभा के लिए वोटर्स ने कांग्रेस को नकार दिया। 1967 में अनारक्षित हुई सीट पर जनता ने जनसंघ का दीपक प्रज्ज्वलित कर दिया। बेगम और राजा की ज़मीन पर 1996 में लोगों ने सामान्य परिवार से निकले शख्स को हाथी पर सवार कर शहसवार बना दिया। परिसीमन से पहले हरदोई की नौवीं और बाद में आठवीं सीट हुई सण्डीला का सफ़र, आज आपकी नज़र।

1951 में यह सीट सण्डीला साउथ ईस्ट कम बिलग्राम नाम से हुआ करती थी और तब एक दलित और एक सामान्य विधायक चुना जाता था। पहले चुनाव में सामान्य सीट से कांग्रेस की लक्ष्मी देवी 28165 और आरक्षित सीट से तिलकराम 29211 वोट के साथ निर्वाचित हुए थे। सामान्य सीट से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सुन्दर लाल 10208 और आरक्षित सीट से जगन्नाथ प्रसाद 9620 मत लेकर रनर रहे थे।

1957 में मतदाताओं ने नतीजा उलट दिया। सामान्य सीट से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के मोहन लाल वर्मा 49081 और आरक्षित सीट से शम्भूदयाल 40054 वोट के साथ निर्वाचित हुए। सामान्य सीट पर कांग्रेस के सैय्यद एजाज़ रसूल 28303 और आरक्षित सीट पर टीकाराम 31276 मत लेकर रनर रहे। आरक्षित सीट पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इण्डिया के लक्ष्मण प्रसाद को 14889 वोट मिले थे।

1962 में सण्डीला नाम से सीट अस्तित्व में आई लेकिन श्रेणी आरक्षित ही रही। इस चुनाव में निर्दल पंचम 7827 वोट लेकर विधानसभा पहुंचे। 67 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से विधायक रहे शम्भूदयाल कांग्रेस से उतरे और 5879 मत लेकर रनर रहे। जनसंघ के जगन्नाथ प्रसाद को 5260 वोट मिले।

1967 में सीट अनारक्षित हो गई और मतदाताओं ने जनसंघ का दीपक जला दिया। जनसंघ से के0 नाथ 20873 वोट लेकर विधानसभा पहुंचे। निर्दल अब्दुल जब्बार 17135 मत लेकर रनर रहे। कांग्रेस तीसरे पायदान पर खिसक गई और उसके उम्मीदवार एम0एल0 वर्मा को 7955 वोट मिले। निर्दल एस0 प्रसाद को 4706 व बी0 लाल को 3056, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इण्डिया के एम0 सिंह को 2056 और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इण्डिया के एस0 नाथ को 1236 मत मिले।

1969 में बेगम कुदशिया एजाज़ रसूल ने सीट पर कांग्रेस का 18 बरसों का सूखा ख़त्म किया और 32031 वोट लेकर सियासी डेब्यू किया। जनसंघ के काशीनाथ 31955 मत पाकर रनर रहे। रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इण्डिया के शम्भू को 1382 वोट मिले। 1974 में वोटर्स ने कांग्रेस को ख़ारिज कर दिया और जनसंघ के काशीनाथ 18976 वोट हासिल कर जीत गए। कांग्रेस के निहाल अज़मत चौधरी 13003 मत लेकर रनर रहे।

आपातकाल के बाद 1977 में कुदशिया बेगम निर्दल उतरीं और 22855 वोट लेकर दूसरी मर्तबा जीतीं। जनसंघ के सिटिंग विधायक काशीनाथ जनता पार्टी से लड़े और 18039 मत लेकर रनर रहे। कांग्रेस 1967 की तरह तीसरे स्थान पर खिसक गई और उसके उम्मीदवार छेदीनाथ सेठी को 8656 और निर्दल शिव शर्मा को 5445 वोट मिले।

1980 में कांग्रेस की कुदशिया बेगम 24137 वोट के साथ तीसरी दफ़ा जीतीं। भाजपा आगाज़ चुनाव में रनर रही और उसके उम्मीदवार सुरेन्द्र दुबे को 19908 मत मिले। जनता पार्टी (सोशलिस्ट) के शराफ़त अली को 9642, निर्दल मुन्नीदेवी को 4581, आरपीके के बिराजी दास को 2489, निर्दल रामभरोसे को 2469, जनता पार्टी (जेपी) के अवध कुमार सिंह को 546 वोट मिले।

1985 में कांग्रेस की कुदशिया बेगम को 27568 वोट मिले और उन्होंने पहली विजयी हैट्रिक लगाई। भाजपा के सुरेन्द्र दुबे 25913 मत लेकर दूसरी बार रनर रहे। निर्दल सोमवती को 4131, राष्ट्रीय लोकदल के शराफ़त अली को 3974 और जनता पार्टी के अवध कुमार सिंह बागी को 1392 वोट मिले।

1989 का चुनाव जनता दल के सुरेन्द्र दुबे जीते और उन्हें 40394 वोट मिले। कांग्रेस की कुदशिया बेगम 35124 मत लेकर रनर रहीं। भाजपा अबकी तीसरे पायदान पर रही और उसके प्रत्याशी सुरेन्द्र विक्रम सिंह को 4545 वोट मिले। बसपा के आगाज़ चुनाव में उसके उम्मीदवार बिराजी दास को 3053 मत हासिल हुए।

1991 में सण्डीला वाले रामलहर में बहे और भाजपा के कुंवर महावीर सिंह 29175 वोट के साथ पहली बार विधानसभा पहुंचे। कांग्रेस की कुदशिया बेगम 25438 मत लेकर रनर रहीं और इसके साथ उनके सियासी कॅरियर पर फुलस्टॉप लग गया। जनता दल के सिटिंग विधायक सुरेन्द्र दुबे अबकी जनता पार्टी से लड़कर तीसरे स्थान पर रहे और उन्हें 9645 वोट मिले। बसपा के ओमप्रकाश को 5067 और जनता दल की सुमित्रा सिंह को 1599 मत मिले।

1993 में भी महावीर सिंह ने सीट भाजपा की झोली में डाली और उन्हें विजयी 34907 वोट मिले। आगाज़ चुनाव में सपा रनर रही और उसके उम्मीदवार अज़ीज हसन खान को 31601 मत मिले। निर्दल अब्दुल मन्नान को 22427, कांग्रेस के वीरेंद्र सिंह मल्हेरा को 16182, निर्दल बोधलाल शुक्ला को 5526, जनता दल के शराफ़त अली को 1952 वोट मिले। बसपा ने समझौते में सीट सपा के लिए छोड़ी थी। आंकड़े कसौटी पर कसें तो पाएंगे कि पहले चुनाव में सपा की जीत की राह रोड़ा साफ़ तौर पर निर्दल लड़े अब्दुल मन्नान बने दिखते हैं।

1996 में सीट पर बसपा का खाता खुला और अब्दुल मन्नान के सिर पहली बार जीत का सेहरा बंधा। उन्हें रिकॉर्ड 52221 वोट मिले। भाजपा के सिटिंग एमएलए महावीर सिंह पिछले चुनाव की तुलना में 10 हजार से ज़्यादा मतों का इजाफ़ा कर 44093 मत पाए पर रनर रहे। अज़ीज हसन खान फिर सपा से लड़े लेकिन वह मन्नान की राह रोक नहीं पाए। उन्हें 39448 वोट मिले। इस चुनाव को आंकड़ों की कसौटी पर रखें तो पाएंगे कि तस्वीर 93 जैसी ही थी, बस मन्नान ज़रूर अबकी दलीय उम्मीदवार थे। हालांकि, ये तस्वीर भाजपा की विजयी हैट्रिक का सबब नहीं बन सकी।

2002 में बसपा के अब्दुल मन्नान 52852 वोट के साथ लगातार दूसरी बार विधानसभा पहुंचे। अबकी सपा के वीरेंद्र सिंह मल्हेरा 33292 मत लेकर रनर रहे। भाजपा के महावीर सिंह 33078 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे। कांग्रेस ने 1985 में हरदोई-सुरसा से विधायक रहीं उमा त्रिपाठी को उतारा लेकिन उन्हें हासिल हुए महज़ 1614 मत।

2007 में बसपा के अब्दुल मन्नान को टक्कर कड़ी मिली लेकिन उन्होंने 56115 वोट लेकर विजयी हैट्रिक लगाई और कुदशिया बेगम के 12 बरस पुराने रिकॉर्ड की बराबरी करने के साथ मायावती सरकार में कैबिनेट मन्त्री बने। सपा ने अबकी कुदशिया बेगम की बहू बेगम इशरत रसूल को उतारा और वह 53060 मत के साथ रनर रहीं। भाजपा के सुरेन्द्र दुबे को 7764, निर्दल ओमप्रकाश मिश्रा को 1078 व सैफ़ी अहमद को 1849 और कांग्रेस के हरिओम त्रिपाठी को 798 मत मिले।

परिसीमन के बाद 2012 के चुनाव में सपा की साध पूरी हुई और महावीर सिंह ने 84644 वोट के साथ सीट पहली बार उसकी झोली में डाली। बसपा के मन्नान 65510 मत लेकर रनर रहे। सपा से निष्कासित होने के बाद अमर सिंह के बनाए राष्ट्रीय लोकमंच के मनोज कुमार सिंह को 16060 वोट मिले। अबकी कांग्रेस से लड़ीं बेगम इशरत रसूल को 6886 और निर्दल विनोद सिंह तोमर को 4801 मत हासिल हुए।

2017 की बात करें तो सपा ने सिटिंग विधायक महावीर सिंह को दरकिनार कर बसपा से निष्कासित उन अब्दुल मन्नान को उम्मीदवार बनाया है, जो 1993 के सपा के आगाज़ चुनाव में उसकी जीत की राह का रोड़ा बने थे। हालांकि, सपा में रार के बीच भविष्य की तस्वीर में क्या रंग होंगे, देखने की बात होगी। अखिलेश यादव ने हरदोई में जिन 05 सीटों पर उम्मीदवार घोषित नहीं किए हैं, उनमे सण्डीला भी है। बसपा ने पवन कुमार सिंह को प्रत्याशी बनाया है। भाजपा के उम्मीदवार की सूरत आज सामने आने की सम्भावना है। कांग्रेस में ख़ामोशी पसरी हुई है।

विशेष ; रिकॉर्ड 04 विधानसभा चुनाव जीतने वाली कुदशिया बेगम का पूरा नाम बेगम कुदशिया एजाज़ रसूल था। बेगम रसूल 80 और 85 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार में मन्त्री रहीं। बेगम संविधान सभा की सदस्य रही थीं। उनकी बहू बेगम इशरत रसूल 2007 और 2012 के चुनाव लड़ीं लेकिन कामयाब नहीं हुईं।