०समय-सापेक्ष चिन्तन० तब ‘रावण’ का भी ‘विकल्प’ पूछा जाता था

भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

रावण का अर्थ है, ‘जो सम्पूर्ण लोक को रुला दे’, जो आज भी प्रासंगिक है। आज का रावण सम्पूर्ण भारतवासियों को रुला रहा है और हमारी आहें उसकी ‘अहम्मन्यता के घड़े’ में भरती जा रही हैं।

रावण जब तक लंकानगरी का अधिपति रहा, देव-दानव उसका विकल्प पूछते रह गये और वास्तव में, उस समय का मायावी वातावरण ही ऐसा था कि किसी को ‘रावण का विकल्प’ सूझ ही नहीं पा रहा था और न ही विकल्प-विषयक चिन्तन-अनुचिन्तन करने की सामर्थ्य किसी में जग पा रही थी।

शिशु राम ने अवध में जन्म लिया और नाना घटनाओं के प्रतिक्रियास्वरूप वय-वार्द्धक्य के साथ किशोर राम वन जाने के लिए उद्यत हो गये। जैसे ही राम के चरणद्वय चौखट से बाहर निकले, रावण का विकल्प’ उनके साथ हो लिया था, जिसे कोई तत्कालीन निष्णात और समयसत्य ‘तत्त्वदर्शी’ ही अपने दृष्टिपथ पर ला सकता था।

राम जब ‘किष्किन्धापर्वत’ पर पहुँचे थे तब विकल्प की एक सूक्ष्म आकृति उभरी थी और एक मन्द स्मिति अवधकुमार के अधरों पर खिल गयी। हनुमान् जब लंकानगरी का दहन करने में प्रवृत्त थे तभी समर्थ विकल्प की एक सूक्ष्म आभा उनके दृष्टिपथ से होकर अपने निर्दिष्ट स्थान पर लौट आयी।

दुर्हृदय, दुर्धर्ष, दुर्दम्य, दुर्विनीत, दुर्मति, दुर्मद, दुर्मना, दुर्मुख, दुर्व्यसनी लंकापति रावण के अन्ध समर्थक ‘देवलोक’ की ओर अँगुलियाँ उठाकर अनयी-कदाचारी दैत्य-अधिपति का ‘विकल्प’ पूछ रहे थे।

समरांगण में जब अहम्मन्य रावण का राघव संहार नहीं कर पा रहे थे तब ‘नाभि में अमृतकुण्ड’ के भेद-उद्घाटन के साथ ही अविवेकी और आत्मघाती ‘रावण का विकल्प’ प्रत्यक्ष हो उठा था; परन्तु हतप्रभ सुर-असुर-समवाय उस विकल्प को ‘रावण के विकल्प’ के रूप में ग्रहण करने के चिन्तन से पृथक्, मात्र ‘राम-रावण’ के समर के साक्षी बन सकने की स्थिति में स्वयं को पा रहे थे।

दुरभिमानी रावण का दैहिक अन्त करने के बाद रावण-मृत्यु के रहस्योद्घाटक ‘विभीषण’ को जैसे ही राघवेन्द्र सरकार ने अपने बाहुपाश में आबद्ध किया था, ‘विकल्प’ गौरवान्वित हो उठा था, फिर ज्योंही विभीषण का राजतिलक करने के उपरान्त रघुकुलरक्षक राम (प्राण जाये बरु बचन न जाये) ने उन्हें लंका की सत्ता सौंपी थी, अप्रत्याशित विकल्प अकस्मात् सभी के नेत्रपटल पर ‘अंकित’ हो आया और यह जयघोष निनादित हो उठा :– सियावर रामचन्द्र की जय।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० सितम्बर, २०१९ ईसवी)

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