सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

समाजवादी पार्टी के 1992 में गठन और 2017 में संगठन की सत्ता के हस्तांतरण में हरदोई का अहम् किरदार

बृजेश ‘कबीर’ / स्वतन्त्र पत्रकार (अन्तर्ध्वनि)-


हरदोई की पहचान उसके राजनीति में प्रभावी दखल से है, ऐसा कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगा। कभी भारतीय जनसंघ के प्रदेश अध्यक्ष पद पर गंगाभक्त सिंह आसीन हुए तो सूबे में संगठन का केन्द्र हरदोई हुआ। फिर पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाले लोकदल के अशोक बाजपेयी युवा प्रदेश अध्यक्ष बने तो युवा राजनीति में हरदोई का प्रभाव रेखांकित हुआ। 90 के दशक में नरेश अग्रवाल ने यूपी में कांग्रेस को तोड़कर लोकतान्त्रिक कांग्रेस का गठन किया और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, तब हरदोई अखिल भारतीय राजनीति के मानचित्र पर उभरा। नई सदी में वो भी दौर आया जब हरदोई के दो दिग्गज नेता डॉ0 अशोक बाजपेई और नरेश अग्रवाल समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हुए। पिछले दिनों समाजवादी पार्टी में संगठन की सत्ता के संघर्ष में नरेश अग्रवाल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पैरवी में खड़े हुए आपात राष्ट्रीय अधिवेशन से लेकर चुनाव आयोग तक, तब हरदोई केन्द्रीय किरदार में रही। चलिए, आज टाइम मशीन पर सवार होकर चलते हैं समाजवादी पार्टी के अतीत के सफ़र पर।

25 बरस पहले समाजवादी जनता पार्टी से अलग होकर मुलायम सिंह यादव ने नई पार्टी बनाई थी। सजपा अध्यक्ष/पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने उन पर महत्वाकांक्षा के चलते धोखे का आरोप लगाया था। मुलायम की दलील थी कि चंद्रशेखर की कांग्रेस से बढ़ती नज़दीकियों से वह परेशान थे। पिछले 25 सालों में मुलायम ने प्रदेश में तीन बार सरकार बनाई और केन्द्रीय राजनीति के केन्द्र में बने रहे। किसी नई पार्टी के लिए यह छोटी उपलब्धि नहीं है। 1989 से 1992 तक राजनीतिक झंझावातों से मुलायम उलझन में थे। मण्डल और कमण्डल की राजनीति पर उन्होंने सख्त रुख़ अपनाया था। 89 में जब भाजपा ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस लिया तो उन्होंने वीपी सिंह के जनता दल से नाता तोड़ा। वह चंद्रशेखर की सजपा में शामिल हुए और कांग्रेस के समर्थन से प्रदेश में सरकार बचाई।

लेकिन, चंद्रशेखर से उनके मतभेद का संकेत तब मिला जब तत्कालीन संचार मंत्री जनेश्वर मिश्र ने चंद्रशेखर मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। जनेश्वर छोटे लोहिया के नाम से जाने जाते थे और मुलायम से नज़दीकियों के लिए भी। मुलायम इससे बेचैन थे कि राजीव गांधी प्रायः कहते थे कि चंद्रशेखर पुराने कांग्रेसी हैं और कभी भी कांग्रेस में शामिल हो जाएंगे। राजीव की हत्या के बाद चंद्रशेखर तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के करीब हो गए। वह राव के घर अक्सर जाने लगे। राव सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चंद्रशेखर के चार में तीन सांसदों ने वोट ही नहीं दिया। इसके बाद तस्वीर बदलने लगी। राव के हिमायती चंद्रशेखर अकेले पड़ गए। मुलायम ने अपना अलग रास्ता तैयार करने का फैसला किया।

मुलायम अपने मित्र भगवती सिंह के दारुलशफा स्थित विधायक आवास पर जनेश्वर मिश्र, कपिल देव सिंह, आजम खान, अशोक बाजपेयी, बेनी प्रसाद वर्मा, धनीराम वर्मा, रेवती रमण सिंह, मोहन सिंह और रामशरण दास जैसे साथियों के साथ लम्बी बैठकें करते और भविष्य की योजना तैयार करते। साथियों ने चेताया कि अकेले पार्टी बनाना आसान नहीं है। बन भी गई, तो चलाना आसान नहीं होगा। मुलायम का कहना था, “भीड़ और पैसा जुटाकर हम देते हैं। फिर देवीलाल, चंद्रशेखर, वीपी सिंह हमें बताते हैं कि क्या करना है, क्या बोलना है ? हम अपना रास्ता खुद बनाएंगे।” आख़िर सितम्बर 1992 में मुलायम ने सजपा से नाता तोड़ ही दिया। 04 अक्टूबर को लखनऊ में उन्होंने समाजवादी पार्टी बनाने की घोषणा कर दी। 04 और 05 नवम्बर 1992 को लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में उन्होंने पार्टी का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित किया। मुलायम सपा के अध्यक्ष, जनेश्वर उपाध्यक्ष, कपिल देव और मोहम्मद आजम खान पार्टी के महामंत्री बने। मोहन सिंह को प्रवक्ता नियुक्त किया गया। बेनी प्रसाद वर्मा कोई पद न मिलने से रूठकर घर बैठ गए और सम्मेलन में नहीं गए। मुलायम ने उन्हें घर जाकर मनाया और सम्मेलन में लेकर पहुंचे।

समाजवादी पार्टी बनने के ठीक एक महीने बाद बडी राजनीतिक घटना घट गई। कारसेवकों ने 06 दिसम्बर को विवादित बाबरी ढांचा ढहा दिया। पूरा प्रदेश भाजपा-मय हो गया। इसी दौरान मुलायम के पैर की हड्डी टूट गई। वह जनवरी-फ़रवरी में अपने घर के लॉन में बैठे-बैठे पार्टी के भविष्य के बारे में सोचते। नित नई रणनीति बनाते। इसी बीच उनके गृह जिले इटावा में लोकसभा का उपचुनाव हुआ। बहुजन समाज पार्टी अध्यक्ष कांशीराम ने पर्चा दाखिल किया। सपा के उम्मीदवार थे मुलायम के पुराने सहयोगी राम सिंह शाक्य। कहते हैं, इस चुनाव में मुलायम ने शाक्य के ख़िलाफ़ गुपचुप प्रचार कराया और कांशीराम को जिताया। वहीं से मुलायम और कांशीराम को लगा कि कांग्रेस और भाजपा का मुक़ाबला करने के लिए ‘पिछड़ों और दलितों’ को साथ आना पड़ेगा और सपा-बसपा गठबंधन की नींव पड़ी। बसपा इससे पहले यूपी में आठ से दस सीटें जीतती थी।

1993 में सपा के साथ गठबंधन करने से बसपा ने 67 सीटें हासिल कीं और मुलायम दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। कांशीराम ने पार्टी उपाध्यक्ष मायावती को बसपा का प्रदेश का प्रभारी बनाया, लेकिन वह शासन ही परोक्ष रूप से चलाने लगीं। मायावती, मुलायम पर हुक्म चलातीं जो उन्हें क़तई स्वीकार नहीं होता। मुलायम ने जनता दल, सीपीएम और सीपीआई के विधायकों को तोड़ा और बहुमत करने के लिए फिर बसपा के विधायकों पर डोरे डाले। मायावती ने समर्थन वापस ले लिया। कहा जाता है कि मायावती को ‘डराने’ के लिए 02 जून, 1995 को स्टेट गेस्ट हाउस काण्ड करवाया गया। कथित तौर पर सपा के लोगों ने मायावती पर हमला कर दिया और 12 बसपा विधायकों को जबरन उठा ले गए। इस घटनाक्रम के बाद बीजेपी के सहयोग से बसपा ने सरकार बनाई।

1996 में केन्द्र की संयुक्त मोर्चा सरकार में मुलायम रक्षामंत्री बन गए। अगर लालू यादव ने विरोध न किया होता तो बहुत सम्भव था कि देवगौड़ा की सरकार गिरने के बाद इंद्र कुमार गुजराल की जगह मुलायम ही प्रधानमंत्री होते। इसी दौरान मुलायम को अमर सिंह का साथ मिला। पैसा और ग्लैमर सपा का अभिन्न हिस्सा बन गया। 1999 में चुनाव प्रचार के दौरान मुलायम की अपने उम्मीदवारों को एक ही नसीहत होती- “यह लो 05 लाख रुपया। कल से प्रचार की बीस गाड़ी बढ़ा देना। इसमें से पैसा बचाना नहीं, क्योंकि अगर कम प्रचार की वजह से हार गए तो कोई दो पैसे को भी नहीं पूछेगा और जीत जाओगे तो जिंदगी भर पैसे की कमी नहीं रहेगी।”

2003 में सपा की यूपी में दूसरी सरकार बनी और मुलायम तीसरी बार मुख्यमंत्री, जबकि न तो बहुमत था न ही किसी पार्टी का समर्थन। मुलायम ने बसपा को एक बार फिर तोड़ दिया था। रही सही कसर बीजेपी के साथ डील से पूरी हो गई थी। प्रमोद महाजन के साथ अमर सिंह के समझौते के तहत बीजेपी ने विश्वास प्रस्ताव पर वॉक आउट किया था। महाजन को लगा था कि मुलायम के अल्पसंख्यकवाद से बहुसंख्यक बीजेपी के साथ आ जाएंगे। 2006 में महाजन की हत्या के बाद यूपी में बीजेपी की हालत बहुत ख़राब हो गई।

2007 के चुनाव में सपा के ख़िलाफ़ जबरदस्त लहर थी, लेकिन उसका लाभ बीजेपी की जगह बसपा को मिला और मायावती मुख्यमंत्री बनीं। 2009 में अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील पर मनमोहन सिंह सरकार से वाम दलों के समर्थन वापसी के बाद आए अविश्वास प्रस्ताव के बाद अमर सिंह की तिकड़म और सपा के समर्थन के जरिए यूपीए सरकार को बचा लिया गया। तब अमर सिंह के सपा में बढ़ते प्रभुत्व के खिलाफ रामगोपाल यादव से लेकर अखिलेश यादव तक सभी खड़े हो गए। मुलायम को न चाहते हुए भी अमर को पार्टी से निकालना पड़ा।

प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की बहुमत की सरकार के कार्यकाल पूरा कर लेने के बाद अखिलेश को समाजवादी युवजन सभा का अध्यक्ष बनाकर 2012 का विधानसभा चुनाव लड़ा गया। मतदाताओं ने मार्च 2012 में विशाल बहुमत देकर सपा को सत्तासीन किया। चाचा शिवपाल सिंह यादव की आपत्तियों को ख़ारिज कर अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाया तो गया, लेकिन आधा-अधूरा। उनके पिता, चाचा और दूसरे वरिष्ठ नेता प्रशासन में दख़ल देते रहे और वह चुपचाप काम करते रहे। छह महीने पहले अमर सिंह की पार्टी में वापसी हुई और उसके बाद जो कुछ भी हुआ, वह समाजवादी पार्टी के इतिहास में एक यादगार अध्याय के रूप में याद रखा जाएगा।

साथ ही, हरदोई की सियासत में भी पूरा घटनाक्रम स्मृतियों में रहेगा। सपा में रार के बीच 16 जुलाई 2016 को अधिवेशन में राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित मुलायम सिंह यादव ने नरेश अग्रवाल को महासचिव बरक़रार रखा लेकिन संस्थापक सदस्य अशोक बाजपेयी की महासचिव पद से छुट्टी कर दी। मुलायम ने सितम्बर में अखिलेश को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर शिवपाल को पदासीन किया तो उन्होंने अशोक बाजपेई को प्रदेश प्रवक्ता बनाया। साथ ही हरदोई के पूर्व जिला अध्यक्ष राजेश यादव और मौजूदा जिला उपाध्यक्ष पारुल दीक्षित को प्रदेश सचिव बनाया। साल बदला तो सपा में तस्वीर बदल गई। 01 जनवरी को जिस आपात अधिवेशन में अखिलेश राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए, उसके कर्ता-धर्ता राष्ट्रीय महासचिवों रामगोपाल और नरेश अग्रवाल को मुलायम ने सपा से निष्कासित कर दिया। हालांकि, अब साफ़ हो चुका है कि ‘सूबे की सत्ता के बैरोमीटर’ से चर्चित नरेश अग्रवाल ‘संगठन की सत्ता के बैरोमीटर’ भी साबित हुए।