सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

समाजवादी पार्टी महिला आरक्षण के ख़िलाफ़, पर ज़िले में 03 सीटें कर दीं रिज़र्व

बृजेश ‘कबीर’ / स्वतन्त्र पत्रकार (अन्तर्ध्वनि)-


समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आज हरदोई के उम्मीदवारों की जो फ़ेहरिस्त जारी की, उसे देख हैरानी हुई। हालांकि, दो सीटों गोपामऊ और साण्डी पर महिला उम्मीदवारों को उतारा जाना पहले से तय था, लेकिन आज जब प्रत्याशियों की लिस्ट सामने आई तो #बालामऊ भी आधी दुनिया के हवाले दिखा। बसपा ने गोपामऊ से मीना कुमारी और बालामऊ से डॉ0 नीलू सत्यार्थी की सूरत में 02 महिलाओं को उतारा है, जिसके बरक्स सपा ने 03 महिला उम्मीदवार देकर किन समीकरणों को साधा है, 11 मार्च बताएगी। यही नहीं, सपा ने सामान्य 05 सीटों में 02-02 पिछड़ा और मुस्लिम वर्ग की नज़र की हैं। अगड़ी बिरादरी में केवल सदर सीट से नितिन अग्रवाल को साईकिल की सवारी मिली है। क्या है सपा उम्मीदवारों का प्रोफ़ाइल और पार्टी ने किस तरह साधे हैं सियासी समीकरण, देखें रपट।

#154_सवायजपुर : सपा के संस्थापक जिलाध्यक्ष और परिसीमन से पहले की बिलग्राम सीट से 02 मर्तबा 1993 और 2002 में विधायक रहे विश्राम सिंह यादव के पुत्र पद्मराग सिंह यादव ‘पम्मू’ का यह दूसरा चुनाव होगा। 2012 में पिता की परम्परागत सीट से टिकट कटने पर सपा के तत्कालीन जिलाध्यक्ष पम्मू ने पार्टी से बग़ावत कर कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रान्ति पार्टी के सिम्बल पर चुनाव लड़ा था। उन्हें 44580 मत मिले थे और 4469 मतों के अंतर से पराजित हुए थे। तब सपा से चुनाव लड़े सपा के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव डॉ0 अशोक बाजपेयी 35022 मत के साथ चौथे पायदान पर खिसक गए थे। पार्टी ने बाद में उन्हें एमएलसी बना दिया और अबकी पम्मू के लिए सवायजपुर का मैदान खाली था। पम्मू, पिता की विरासत (जिलाध्यक्ष पद) पार्टी में हासिल कर चुके थे बग़ावत से पहले ही, सवायजपुर के मतदाता विधायी राजनीति की विरासत उनके हवाले करेंगे, इंतज़ार 11 मार्च का करना होगा।

#155_शाहाबाद– सपा ने अपने सिटिंग विधायक बाबू खां के साहबज़ादे सरताज खां पर दांव लगाया है। बाबू 1985 में जनता पार्टी और 1989 में जनता दल से हारने के बाद पहला चुनाव 1991 की रामलहर के बीच निर्दल जीते थे। इसके बाद 1993 और 1996 में वह सपा से लड़े और जीत की हैट्रिक भी बनाई। 2002 और 2007 में वह हारे। 2012 में सपा के सिम्बल पर चौथी बार जीते। वहीं, सरताज नगर पालिका परिषद शाहाबाद के अध्यक्ष पद का 02 बार चुनाव लड़े और हारे। उनके चचेरे भाई रिज़वान खां पाली नगर पंचायत के चेयरमैन हैं, जोकि परिसीमन बाद सवायजपुर क्षेत्र का हिस्सा है। पिता की विरासत को हासिल करने उनकी परम्परागत सीट से उतरे सरताज का मुक़ाबला उन आसिफ़ खां ‘बब्बू’ से है, जिनके हाथों पालिकाध्यक्ष पद के चुनाव में 02 बार मात खा चुके हैं। क्या होगा सरताज का सियासी मुस्तक़बिल, मार्च की 11 तारीख़ खुलासा करेगी।

#156_सदर– 80 के दशक के आख़िर से अब तक कद्दावर नेता नरेश अग्रवाल का अभेद्य दुर्ग रही इस सीट से सपा के उम्मीदवार के चेहरे पर कोई सस्पेंस नहीं था। पार्टी ने दूसरी दफ़े सिटिंग विधायक और सूबे के स्वतंत्र प्रभार राज्यमन्त्री नितिन अग्रवाल को उम्मीदवार बनाया है। इस सीट से उनके पिता 1980, 89, 91, 93 और 96 में कांग्रेस, 2002 व 2007 में सपा से विधायक रह चुके हैं। 2008 में नरेश अग्रवाल ने इस्तीफा देकर राजनीतिक विरासत बेटे नितिन को सौंप दी थी। उपचुनाव में नितिन बसपा के सिम्बल पर 65533 और 2012 आमचुनाव में सपा के निशान पर 110063 मत पाकर निर्वाचित हुए थे। अखिलेश कैबिनेट में पहले वह स्वास्थ्य एवं चिकित्सा राज्यमन्त्री थे। बाद में प्रमोट कर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम निर्यात एवं प्रोत्साहन राज्यमन्त्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाए गए। नरेश अग्रवाल सपा के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सदस्य हैं। अखिलेश को सपा की विरासत दिलवाने में उन्होंने केन्द्रीय किरदार निभाया। पिता ने 02 विजयी हैट्रिक बनाईं, पुत्र जीत की पहली हैट्रिक बनाएगा, तस्दीक़ 11 मार्च देगा।

#157_गोपामऊ (सु0)- साण्डी की अपनी सिटिंग विधायक राजेश्वरी देवी को सपा ने उम्मीदवार बनाया है। राजेश्वरी दिग्गज नेता रहे परमाई लाल की बड़ी बहू हैं। उन्होंने पंचायत की राजनीति से कॅरियर शुरू किया था और 1995 में अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित ज़िला पंचायत अध्यक्ष पद पर क़ाबिज़ हुई थीं। हरदोई ज़िला पंचायत की वह पहली महिला अध्यक्ष भी थीं। इसके बाद वह अहिरोरी ब्लॉक की प्रमुख रहीं। राजेश्वरी विधानसभा का पहला चुनाव परिसीमन से पहले की बावन-हरियावां (सु0) सीट से 2007 में बसपा के सिम्बल पर लड़ीं थीं। राजेश्वरी 51633 मत लेकर निर्वाचित हुई थीं। उनके पति विपिन बिहारी 1989 में जनता दल से इस सीट से विधायक चुने गए थे। परिसीमन के बाद राजेश्वरी नवसृजित साण्डी (सु0) से सपा के सिम्बल पर लड़ीं और 66325 मत हासिल कर लगातार दूसरी बार जीतीं। अब वह सीट बदल कर सपा की प्रत्याशी हैं और सवाल ज़हन में है कि क्या वह अपने ससुर के विजयी हैट्रिक के रिकॉर्ड की बराबरी कर पाएंगी ??? सपा की सिटिंग गोपामऊ सीट पर एंटी इनकंबेंसी फैक्टर के बीच जवाब के लिए 11 मार्च आने दीजिए।

#158_साण्डी– सपा ने अपनी इस सिटिंग सीट पर ऊषा वर्मा को उतारा है। वह कद्दावर नेता परमाई लाल की छोटी बहू ने राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत अहिरोरी ब्लॉक के प्रमुख पद से की। 1998 में वह हरदोई (सु0) लोकसभा चुनाव में सपा के सिम्बल पर 206634 मत के साथ निर्वाचित हुईं। 1999 के लोकसभा चुनाव में उन्हें 200852 मत मिले और 5404 मतों के क़रीबी अंतर से हार गईं। 2002 के विधानसभा आमचुनाव में अहिरोरी (सु0) सीट पर सपा के सिम्बल पर 47799 मत लेकर निर्वाचित हुईं और महिला कल्याण एवं बाल विकास राज्यमन्त्री बनीं। 2004 और 2009 के लोकसभा आमचुनाव में क्रमशः 203415 और 294030 मत लेकर जीतीं। 2014 में मोदी-लहर में हुए लोकसभा चुनाव में वह पांचवीं बार सपा के सिम्बल पर उतरीं और 276543 मतों के साथ तीसरे स्थान पर खिसक गईं। करीब डेढ़ दशक बाद ऊषा ने विधायी राजनीति में वापसी की है और उस सीट से जहां की राहों में कांटे ही कांटे हैं। एक तो स्वाभाविक सत्ता विरोधी लहर है, तिस पर सपा की सिटिंग विधायक उनकी जेठानी राजेश्वरी देवी पर पूरे कार्यकाल में पलटकर क्षेत्र की ओर नहीं देखने की तोहमत भी है। मृदु और सहज व्यवहार के लिए जानी जाने वाली ऊषा प्रतिकूल हालात से पार पाएंगी, हवाल 11 मार्च देगा।

#159_बिलग्राम_मल्लावां– सपा ने सुभाष पाल को उम्मीदवार पहले ही घोषित किया था। लेकिन, कुनबे में संगठन की सत्ता के संग्राम में पलड़ा शिवपाल सिंह यादव का भारी हुआ तो उन्होंने प्रतापगढ़ के अनीस मंसूरी को प्रत्याशी घोषित कर दिया था। हालात बदले और अखिलेश यादव ने सुभाष को फिर साईकिल पर सवार कर दिया। सुभाष 2012 का चुनाव पीस पार्टी से लड़े थे और 54153 मत हासिल कर सपा का गेम ख़राब कर दिया था। इसके बाद पंचायत चुनाव से पहले सुभाष ने सपा का दामन थाम लिया और पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार घोषित कर दिया था। पिछले दिनों की उहापोह के बाद अब तस्वीर साफ़ हो चुकी है, तो सपा के लिए सुभाष कितने कारगर होंगे, जवाब के लिए 11 मार्च आने दीजिए।

#160_बालामऊ– सपा ने इस सीट पर अपने सिटिंग विधायक अनिल वर्मा का टिकट काटकर सुशीला सरोज को उतारा है। हालांकि, मुलायम की जारी सूची में प्रत्याशी अनिल ही थे, लेकिन उनके अनमने-पन के बाद इस सीट पर उम्मीदवार बदला जाना तय था। सुशीला सरोज का मायका गोरखपुर और ससुराल हरिद्वार में है। हरदोई से उनका कनेक्शन इस नाते है कि वह पूर्व सांसद ऊषा वर्मा की भाभी हैं। सुशीला ने अपना राजनीतिक कॅरियर हरदोई से ही शुरू किया था। 1993 में वह बेनीगंज (सु0) से सपा के सिम्बल पर 40064 मत लेकर पहली दफ़े विधायक और मुलायम सरकार में समाज कल्याण राज्यमन्त्री बनीं थीं। 1996 में सपा ने उनका टिकट काटा तो वह भाजपा के सिम्बल पर लड़ीं और 37713 मतों के साथ रनर रहीं थीं। 1999 में सुशीला मिश्रिख (सु0) लोकसभा के चुनाव में सपा के सिम्बल पर लड़ीं और 159279 मत लेकर निर्वाचित हुईं। 2004 में सपा से ही फिर लोकसभा चुनाव में उतरीं लेकिन 187659 मतों के साथ रनर रहीं। 2009 में वह मोहनलाल गंज (सु0) लोकसभा सीट से सपा के सिम्बल पर लड़ीं और उन्हें 256367 विजयी मत मिले। मोदी-लहर में 2014 के लोकसभा चुनाव में वह इस सीट पर सपा के टिकट पर उतरीं और 242366 मतों के साथ तीसरे पायदान पर खिसक गईं। सुशीला ने विधायी राजनीति में वापसी उस सीट से की है, जो परिसीमन से पहले की बेनीगंज सीट थी और उनका आगाज़ जीत से हुआ था। बालामऊ क्षेत्र में भी एंटी इनकंबेंसी फैक्टर प्रभावी है और सपा के सिटिंग विधायक अनिल वर्मा पर क्षेत्र की उपेक्षा की तोहमत भी है। ऐसे में सुशीला सरोज इतिहास दोहरा पाएंगी, इंतज़ार शिद्दत से 11 मार्च का करना होगा।

#161_सण्डीला– सपा ने अपनी इस सिटिंग सीट पर भी उलटफेर किया है। अपने विधायक कुंवर महावीर सिंह पर बसपा से निष्कासित अब्दुल मन्नान को तरज़ीह दी है। बेंहदर ब्लॉक के प्रमुख पद से सियासी कॅरियर शुरू करने वाले मन्नान बसपा से 1996 में 52221, 2002 में 52852 और 2007 में 56115 मतों के साथ विजयी हैट्रिक लगा चुके हैं। 2007 में मायावती सरकार में वह काबीना मन्त्री रहे हैं। उसी दौर में छोटे भाई अब्दुल हन्नान को विधान परिषद् की लोकल बॉडी सीट से एमएलसी बनवा चुके हैं। तथ्य ये भी है कि सपा के गठन के बाद 1993 में हुए पहले चुनाव में इस सीट पर साईकिल की रफ़्तार तब निर्दल लड़े मन्नान ने ही मंद कर दी थी। अब वह खुद साईकिल पर सवार हैं और निगाहें इस पर लगी हैं कि मन्नान सण्डीला सीट बतौर नज़राना दूसरी बार सपा की झोली में डाल पाएंगे ??? …इंतज़ार फिर 11 मार्च का ही करना होगा।

2012 में सपा ने 05 सामान्य सीटों का 01 ब्राह्मण, 01 क्षत्रिय, 01 वैश्य, 01 पिछड़ा और 01 मुस्लिम के बीच बंटवारा किया था। अबकी ब्राह्मण और क्षत्रिय का पत्ता साफ़ है। अगड़ों के नाम पर वैश्य बिरादरी को एक टिकट है। मुस्लिम कोटे में एक अतिरिक्त सीट का इज़ाफ़ा है। 01 पर पिछड़ा और 01 पर अति पिछड़ा को उपकृत किया गया है। सपा ने जिस तरह के जातीय समीकरण साधे हैं, उनकी कसौटी 19 फरवरी है और अंजाम 11 मार्च बताएगा।