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सलामे इश्क़ के नाम कहो! बग़ावत लिख दूँ

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

ख़ता क़ुबूल हो तो कहो! नफ़ासत लिख दूँ,
पयामे इश्क़ के नाम इक वरासत लिख दूँ।
न झुकाओ निगाहें चिलमन उठाकर आज,
सलामे इश्क़ के नाम कहो! बग़ावत लिख दूँ।
बला हो, हूर हो वा हूर-मानिन्द हो दिखते,
ख़ता मुआफ़ हो तो इक मलामत लिख दूँ।
रवाँ होकर के लौटी है कहीं से शोख़ हवा,
अल्हड़ की दीवानगी की महारत लिख दूँ।
तेरी पाकीज़गी के सलामे अन्दाज़ क्या कहने!
ताउम्र रहे सादगी कहो! इक सलामत लिख दूँ।
चंचल हिरनी-सी नज़रों का थमना-चलना,
सितमगर कहो! तो इक अदालत लिख दूँ।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ सितम्बर, २०२१ ईसवी।)