तो क्या प्रयागराज के बुद्धिवादी ‘मुरदे’ हो चुके हैं?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

वाह! नाम ‘प्रयागराज’ और यहाँ का बुद्धिवादी ‘ग़ुलाम’!..? ‘पूरब का ऑक्सफोर्ड’ कहलानेवाले तथाकथित ‘केन्द्रीय विश्वविद्यालय’ के समस्त शिक्षक, आइ० ए० एस०-आइ०पी०एस०-पी०सी०एस० की फैक्टरी कहलानेवाले प्रयागराज के सफ़ेदपोश अधिकारी, बाज़ारवाद को जवानी की दहलीज़ पर ले जानेवाले तरह-तरह के कोचिंग-केन्द्र के पढ़े-लिखे-कढ़े मठाधीश, साधु-सन्त-परम्परा के ध्वजवाहक धर्माधीश, संस्कृतभाषा-व्याकरण-साहित्यादिक की ठीकेदारी करनेवाला ‘गंगानाथ झा राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्’ और सम्बद्ध समस्त संस्कृत-पाठशालाओं के शिक्षक, शिक्षा, साहित्य, व्याकरणादिक क्षेत्रों में पुरस्कार-सम्मान झटकनेवाले चेहरे, संस्कृत-हिन्दी के शोधच्छात्र, प्रयागराज के समस्त शैक्षणिक संस्थानों के संस्कृत और हिन्दी के आचार्य तथा मीडिया-प्रहरीगण!

नीचे दिखाये गये चित्रों को आप सभी ने न जाने कितनी बार देखे होंगे; किन्तु ‘विरोध’ के स्वर उठाने का साहस नहीं कर पा रहे होंगे; क्योंकि स्वयं के शिक्षार्जन के प्रति आपकी आस्था नहीं है। यदि आस्था रहती तो स्वकर्त्तव्य के प्रति ‘सत्यनिष्ठ’ रहते, विमुख नहीं।

‘नगर निगम’ में तो ‘अँगूठा-टेक’ हैं, अन्यथा ‘भरद्वाज मुनि’ को ‘भारद्वाज’ मुनि अंकित नहीं कराते।

गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस’ में लिखा है :—
“भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहिं रामपद अति अनुरागा।।”
तुलसी बाबा पुन: कहते हैं :–
“भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिवर मनभावन।।”
तीर्थराज प्रयाग की सत्ता और महत्ता को इस रूप में रेखांकित किया गया है :—
“त्रिवेणी माधवं सोमं, भरद्वाजं च वासुकिम्।
वन्दे अक्षयवटं शेषं प्रयागं तीर्थनायकम्।।”

इतना सब पढ़ने और घटने के बाद भी यदि प्रयाग का नामकरण करनेवाले प्रयाग के प्रथम वासी, प्रथम कुलाधिपति तथा प्रथम विमानविज्ञानी ‘ऋषि भरद्वाज’ का नाम प्रयागराज में ही अशुद्ध (भारद्वाज) लिखा जाये तो ऐसी स्थिति के लिए उत्तरदायी लोग को धिक्कारने के लिए शब्दकोश में कोई शब्द नहीं दिखता।

यहाँ हम किसी भी राजनीतिक नेता को दोषी नहीं ठहरायेंगे; क्योंकि उनकी ‘अयोग्यता’ ही ‘उनकी योग्यता’ होती है।

इतना ही नहीं, ‘मुख्य’ शब्द के आगे ‘योजक-चिह्न’ (-)-प्रयोग करने का कोई औचित्य नहीं है। खेद है, जहाँ योजकचिह्न लगेगा वहाँ लगाया ही नहीं गया है। शुद्ध शब्द है, ‘भरद्वाजाश्रम’/’भरद्वाज-आश्रम’। ‘प्रवेश द्वार’ भी अशुद्ध लिखा गया है। ‘प्रवेश द्वार’ में ‘षष्ठी तत्पुरुष’ समास है, जिसका विग्रह है, ‘प्रवेश करने का द्वार’, इसलिए इसे ऐसे लिखा जायेगा :– ‘प्रवेश-द्वार’/’प्रवेशद्वार’।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २४ जनवरी, २०२० ईसवी)

url and counting visits