स्वरक्तै: स्वराष्ट्रं रक्षेत् : चौरी चौरा आंदोलन के 100 वर्ष

डॉ० निर्मल पाण्डेय (इतिहास-व्याख्याता) :

डॉ• निर्मल पाण्डेय

चौरी चौरा की घटना सौ सालों बाद आज भी इतिहास में अपने सही स्थान की बाट जोह रही है। 1922 में घटी इस घटना के साथ तत्कालीन ब्रिटिश सत्ता के साथ ही भारतीय राजनीति के स्वनामधन्य कर्णधारों ने जो किया, उसे जिस तरह अपराध, वेदना, संताप और भर्त्सना का कारण माना; उसी लीक पर आगे चलकर स्वतंत्र भारत के मुख्यधारा के इतिहासकारों ने भी उसे उसी तरह चित्रित किया।

आज जब चार फ़रवरी से हम चौरी चौरा आंदोलन के 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, और जब पूरा देश अगले वर्ष अर्थात् 4 फ़रवरी 2022 तक के लिए चौरी चौरा शताब्दी वर्ष मना रहा है, मैं घटना और उसके डिटेल में जाने से इतर (क्यूँकि वो पहले ही बहुतेरे माध्यमों से अलग अलग मीडिया प्लैट्फार्मों पर पहले से ही मौजूद है), कुछ बिंदुओं, ख़ासकर इतिहासलेखन को लेकर, मैं अपनी बात रख रहा हूँ।

पहली बात, स्वतःस्फूर्त जनाक़्रोश का प्रस्फुटन चौरी चौरा की क्रांतिकारी घटना के साथ लम्बे समय से चले आ रहे काण्ड उपसर्ग को हटाने ज़रूरत है। भले ही तुलसीदास के रामचरितमानस में यह काण्ड शब्द अध्याय (एपिसोड/चैप्टर) के लिए प्रयुक्त हुआ हो, पर आजकल के समय में यह नेगेटिव लोडेड शब्द है, मुझे नहीं लगता किसी को इस बात से इनकार होगा। चौरी चौरा जैसी क्रांतिकारी घटना के साथ काण्ड शब्द के इस्तेमाल लिए जाने से आम जनमानस के साथ ही इतिहासकारों को भी इससे बचना चाहिए।

दूसरी बात, किसी भी देश के राष्ट्रीय इतिहास में किसी एक घटना के दो शहीद स्मारक होना भी एक दुर्लभ तथ्य है। सरकार को चाहिए साथ ही इतिहासकारों को भी कि औपनिवेशिक सत्ता की नुमाइंदगी करने वालों के नाम पर बने स्मारकों से शहादत का तमग़ा उतार कर उसे ‘स्वरक्तै: स्वराष्ट्रं रक्षेत्’ के ध्येय से लड़े-जूझे-प्राणोत्सर्ग करने वाले अमर बलिदानियों को समर्पित करे।

तीसरी बात, इतिहासकारों द्वारा इस घटना को लेकर महात्मा गांधी के पश्चाताप को फिर से कुरेदने की आवश्यकता है। इस घटना को लेकर बाबा राघवदास, महामना मालवीय और सुभाष चंद्र बोस की तत्कालीन प्रतिक्रिया जिस तरह की वैचारिक सोच को दर्शाती है, उसे भी मुख्य धारा के इतिहास में उपस्थिति दर्ज़ होना चाहिए। आप महात्मा गांधी के वेदना/संताप को पढ़िए, पर इसके मूल में जो स्वतःस्फूर्त जनक्रांति या कहिए बहुजन बग़ावत है, उसे भी पढ़ा/समझा जाना चाहिए। अब यह सर्वमान्य तथ्य है कि यह राष्ट्रीय आयाम संजोए (स्थानीय ही सही) ऐसी क्रांतिकारी घटना थी जिसने भारतीय प्रतिरोध की परम्परा को दीर्घकालिक रूप से प्रभावित किया।

चौथा, चौरी चौरा की घटना को लेकर शुरू-शुरू के इतिहासकारों में इस बात को लेकर एकराय रही कि यह बस्स एक ऐसी घटना रही जिसे कारण महात्मा गांधी को असहयोग आंदोलन वापस लेना पड़ा था, इसलिए मुख्यधारा के इतिहास में इसे हाशिए पर हाई लगा कर रखा गया। बावजूद इसके स्वतंत्र भारत में चौरी-चौरा को लेकर किए गए कुछ बेहद ही फ़ोकस्ड काम में शामिल हैं: लिखे गए कुछ एम एन शर्मा की चौरी चौरा वायलेन्स, शाहिद अमीन की इवेंट मेट फ़ॉर मेमरी, और सुभाष चंद्र कुशवाहा के चौरी चौरा विद्रोह और स्वाधीनता आन्दोलन । लेकिन औपनिवेशिक स्रोतों उनकी अतिशय निर्भरता और उन स्रोतों को राष्ट्रीय नज़रिए से ट्रैन्स्लेट न कर पाने की कमी के कारण यह कृतियाँ राष्ट्रीय महत्व की घटनाओं को स्थानीय स्तर की आपराधिक घटना (क्राइम इन सोशल ऑर्डर) के तौर पर देखने के इम्पीरीयल कलायडॉस्कोप से बाहर निकलने में नाकाम रहीं हैं। मेरा-देश, तेरे-देश से बेहतर है, के नज़रिए से आज आगे बढ़ने का समय है।

आवश्यकता है पुनः उन स्थापित इतिहास ग्रंथों की जिल्दों को खोलने की, उन जिल्दों की आड़ में छिपे इतिहास के पन्ने और भी हैं।
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चौरी चौरा आन्दोलन में ‘स्वरक्तै: स्वराष्ट्रं रक्षेत्’ के ध्येय से लड़े-जूझे-प्राणोत्सर्ग करने वाले अमर बलिदानियों को सादर नमन।