आगत-अनागत

जड़-चेतन हैं सोच में, मानव बहुत कठोर। पापकर्म गठिया रहा, रात हो गयी भोर।।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


एक :
नभ से उतरा चाँद है, दिखता बहुत उदास।
धरती सिसकी रातभर, नहीं दिखे अब आस।।
दो :
जड़-चेतन हैं सोच में, मानव बहुत कठोर।
पापकर्म गठिया रहा, रात हो गयी भोर।।
तीन :
पुण्य पंक में धँस रहा, उदय पाप का होय।
चित्त अशान्त मानव बना, मन का आपा खोय।।
चार :
दिन दस के व्यवहार में, भ्रम समीप है आय।
मानव ऐसा मुग्ध है, मरीचिका है पाय।।
पाँच :
पानी-पानी हो गया, धिक्! लज्जा से दूर।
हुए सज्जन दुर्लभ बहुत,
दुष्ट यहाँ भरपूर।।
छ: :
अहंकार है मिट गया, पा जीवन सन्देश।
मानव-जीवन श्रेष्ठ है, सच्चा यह उपदेश।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १८ जून, २०१८ ईसवी)

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