आम तो आम, गुठली बताये पिय का मुकाम

ईश्वर ने जो हमें तमाम नेमते दी हैं, उनमें से पका हुआ आम सबसे खूबसूरत, स्वादिष्ट और लजीज नेमतों में से एक है ।

हम भारतीय इस मामले में और भी अधिक भाग्यशाली हैं क्योंकि हमारे यहां विश्व की सबसे अच्छी आम की किस्में पैदा होती हैं। दशहरी, लंगड़ा, हापुस से लेकर अल्फांसो तक दर्जनों आम की किस्में ऐसी हैं कि जिनकी कल्पना करते ही मुंह में पानी आ जाता है। अगर मैं किसी राज्य का सम्राट होता तो फलों के इस राजा के सामने शायद अपना राजपाट दांव पर लगाने को तैयार हो जाता।

पके हुए आम की प्रशंसा में, मैं कई किताबें लिख सकता हूं । लेकिन कच्चे आम की भी अपनी खूबसूरत कहानी है। आओ सुनते हैं-

हमारे यहां बैसवारा में बसंत पंचमी के दिन धोबिन एक थाल में आम के बौर (मंजर) , सिंदूर और साथ ही शिव पार्वती और गणेश की मूर्ति सबके घर लाती। यह थाल वह महिलाओं को दिखाती। महिलाएं थाल से सुहाग लेती और बदले में एक भेली गुड़, ब्लाउज का एक कपड़ा और श्रद्धानुसार कुछ पैसे भी देती। समाज मे यह इस बात की आधिकारिक रूप से घोषणा होती कि अब फलों के राजा आम का आगमन होने वाला है ।

कुछ ही दिनों में बौर (मंजर) में से छोटे-छोटे टिकोरे (अमिया) नजर आने लगते। कुछ और बड़े होते और कभी तेज हवा , आंधी चलती तो टिकोरे जमीन पर गिर जाते । जिस रात आंधी आती या पत्थर गिरते , हम बच्चे लोग सुबह मुंह अंधेरे ही आम के पेड़ के पास पहुंच जाते और अमिया बीन कर ऐसे खुश होते , गोया कि अशर्फी लूट लाए हों।

आधे टिकोरे तो हम रास्ते में ही चट कर जाते, जो बच जाते उनमें से कुछ की धनिया, पुदीना के साथ स्वादिष्ट चटनी बनती। कुछ टिकोरे दाल में डाल दिए जाते, जिससे साधारण सी दाल का स्वाद कई गुना बढ़ जाता। टिकोरे कुछ और बड़े होते तो उनके अंदर सफेद गुठली पड़ जाती। गुठली पड़ने के साथ ही कलमी टिकोरों में मीठापन और देशी टिकोरों में खट्टापन बढ़ जाता। इसलिए इन टिकोरों के प्रति हमारा आकर्षण भी और अधिक बढ़ जाता।

हम जब भी कभी हरहा-गोरु लेकर या कभी ऐसे ही जंगल की तरफ जाते तो दो-चार अमिया सबकी नजर बचाकर जरूर तोड़ते । फिर नमक के साथ स्वाद ले -लेकर उन्हें खाते। हम बच्चा पार्टी “आम के आम और गुठलियों के दाम” वसूल ऐसे करते कि अमिया के अंदर की सफेद, चिकनी गुठली को निकालते और उसे अंगूठे और तर्जनी उंगली के बीच दबाकर किसी दोस्त या खुद का नाम लेकर जोर से ऊपर उछाल देते और कहते-

“गुठली रे गुठली बस इतना समझा दे।
‘रज्जन’ की मेहरारू का पता बता दे।।”

उस समय हमारा ऐसा दृढ़ विश्वास था कि जिस दिशा अमिया की गुठली जाती थी, जिसके नाम से गुठली उछाली गई है, उस लड़के की शादी या किसी लड़की से उसका चक्कर उसी दिशा में चलता।

(आशा विनय सिंह बैस)