‘हिन्दी-संसार’ के भव्य समारोह मे ‘आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ कृति का लोकार्पण हुआ

‘हिन्दी-संसार’ संस्था प्रयागराज की ओर से ५ जनवरी को संस्था-सभागार मे राष्ट्रीय स्तरीय पर प्रतिभा-सम्मान समारोह एवं भाषाविशेषज्ञ-सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमे वैयाकरण एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने सभागार मे देश के कई स्थानो से आये हज़ारोँ विद्यार्थियोँ और अध्यापकोँ को भाषा और व्याकरण का बहुविध का ज्ञान कराया। इसी अवसर पर विद्यार्थियों-द्वारा उनकी शुद्धाशुद्ध शब्दोँ पर आधारित चिर-प्रतीक्षित पुस्तक ‘आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ का लोकार्पण किया गया।

समारोह-अध्यक्ष आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने गहन चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा, “जो शब्द, वाक्य आदिक अशुद्ध रूप मे परीक्षाओँ के प्रश्नपत्रोँ मे पूछे जाते हैँ, जिनके उत्तर-विकल्प पूरी तरह से ग़लत रहते हैँ।” उन्होँने उनपर कारणसहित प्रकाश डाला और परीक्षा-एजेँसियोँ, आयोग आदिक की सजगता-सतर्कता पर प्रश्न उठाये थे। उन्होँने केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की ओर से जारी ‘विशिष्ट व्यंजन’ की मान्यता पर प्रश्न उठाया। अभी हाल ही मे जिस तरह से उत्तरप्रदेश लोक सेवा आयोग की ओर से आयोजित पी० सी० एस० परीक्षान्तर्गत सीसैट के हिन्दी-प्रश्नो मे सुस्पष्ट रूप से जिस तरह से छ: प्रश्नात्मक वाक्य और उनके उत्तर-विकल्प ग़लत दिये गये थे, उसके प्रति अपनी गहन चिन्ता व्यक्त की, साथ ही प्रश्नपत्र तैयार करनेवाले सम्बन्धित परीक्षकोँ की पात्रता एवं अभियोग्यता पर प्रश्न खड़े किये।

आचार्य ने भाषा और व्याकरण के नाना पक्षोँ की बारीक़ियोँ को समझाया। अभिव्यक्ति-स्तर पर संकेत करना, बोलना, कहना एवं लिखना के मध्य अन्तर सुपष्ट करते हुए, भाषिक संरचना को समझाया।

संस्था-निदेशक अशोक स्वामी ने कहा, “वही विद्यार्थी जीवन मे सफल होते हैँ, जो अपने अतीत से शिक्षा ग्रहण करते हैँ। विद्यार्थियोँ को विद्या को साधना के रूप मे ग्रहण करना चाहिए। मैने आज आप सबको जो कुछ भी पारितोषिक के रूप मे दिया है, उसमे मेरा अपना कुछ भी नहीँ है; सब आप सबका है।”

इसी अवसर पर शताधिक प्रतिभाशाली विद्यार्थियोँ को पारितोषिक देकर उनका उत्साहवर्द्धन किया गया। वरीयता-क्रम मे प्रतिभाशाली विद्यार्थियोँ को कार, स्कूटी एवं लैपटाप आदिक दिया गया। समारोह मे सहस्राधिक छात्र-छात्राएँ उपस्थित थीँ। समारोह का संयोजन संस्था-निदेशक डॉ० अशोक स्वामी ने किया। संचालन अमरदास देवदानी ने किया।