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“सुरमई अँखियों में इक नन्हा-मुन्ना सपना दे जा रे!”

‘सर्जनपीठ’ के निदेशक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

अभिनय में वह शक्ति है, जो पाषाण को भी द्रवीभूत कर दे। ‘सदमा’ अर्थात् आघात मनुष्य को एक ऐसी मानसिक अवस्था में प्रवेश कराता है, जहाँ उसका जीवन किसी अभिनय से अल्पतर अनुभव नहीं होता। उसके मस्तिष्क के तन्तु इतने संश्लिष्ट और विकीर्ण हो जाते हैं कि आचरण का स्तर प्रकीर्ण रूप में प्रत्यक्ष होने लगता है। उसके लिए ‘अश्व’ और ‘गर्दभ’ पर आरुढ़ होना, सिद्धान्त और व्यवहार में समानार्थक प्रतीत होते हैं; वह आग का स्पर्श कर रहा है अथवा बर्फ़ का, दोनों के गुण-धर्म से वह अनभिज्ञ रहता है। प्रतिपल वह अपने संसार का अज्ञात पक्ष ‘रेतीली तूलिका’ से बालुकामय प्रदेश में उरेहता रहता है; अपेक्षा और आकांक्षा का एक क्षणभंगुर भविष्य रचता है, जो मुट्ठी में समा सकता है। वह हथेली पर कल्पना- लोक का सूर्य उगाता रहता है; यथार्थ में वह अंकुरण का श्रेय प्राप्त करेगा अथवा नहीं, इसके गणितशास्त्र से परे रहकर आशान्वित बना रहता है। हम ऐसे मनुष्य को ‘विक्षिप्त’ की संज्ञा से तिरस्कृत भी नहीं कर सकते। ऐसे मनुष्य विरले ही होते हैं; क्योंकि वे ‘आनन्द’ के एक ऐसे अनुभूति-सागर में निमग्न रहते हैं, जहाँ न ‘दु:ख’ होता है और न ‘सुख’। इसी अवस्था में ‘सत्’, ‘चित’ तथा ‘आनन्द’ की अनुभूति होती है, जो ‘हर्ष’ और ‘विषाद’ से परे ‘सच्चिदानन्द’ का सान्निध्य उपलब्ध कराती है। ऐसी निराली मानसिक अवस्था उस मनुष्य को ‘माया-मोह’ से सम्पृक्त नहीं करती। ऐसा इसलिए कि वह मनुष्य ‘आंशिक’ रूप में चेतना जाग्रत् कर पाता है, जिसके कारण पर-प्रसन्नता और सम्पन्नता में वह प्रफुल्ल रहता है तथा पर-कष्ट में व्यथित हो जाता है; किसी विषय के सन्दर्भ में अपने आक्रोश और प्रतिवाद को अभिव्यक्त भी करता है।

उसी परिदृश्य में कुछ ऐसे पात्र होते हैं, जो अप्रत्याशित ‘आघात’ को ज्ञात-अज्ञात सहानुभूति- समानुभूति और सौजन्य ‘कर’ का संस्पर्श दे, ‘आघात-प्रभावित’ मनुष्य को उसकी पूर्व-स्थिति’ में प्रत्यागमित करने में समर्थ हो जाते हैं। ऐसी स्थिति प्राप्त होते ही एक ऐसा परिदृश्य आ ठहरता है, जहाँ ‘सदमा’ (आघात) का प्रत्यारोपण-विज्ञान एक और अप्रत्याशित घटना की उत्पत्ति कर देता है। मोहजन्य आत्मीय सम्बन्धों का धरातल शिथिल पड़ने लगता है। जिसकी स्मिति और जिसका हास-रुदन, आक्रोश, उपालम्भ, प्रतिकार आदिक मन-प्राण पर इन्द्रधनुषी रंगों के रूप में आच्छादित हो चुके होते हैं; जो श्वास में घुल-मिल चुके होते हैं, पूर्ण चेतना जाग्रत होते ही, उसका ‘निर्मोही’ आचरण अन्तश्चेतना को झंकृत कर, ‘अवसाद’ और ‘नैराश्य’ का कपाट अनावृत कर देता है।

ऐसे में, अपना-पराया का भेद मिटाकर बनाया गया ‘बालुका-प्रासाद’ भुरभुरा कर धराशायी हो जाता है; परिणामत:-प्रभावत: एक अज्ञात, परन्तु परिचित आत्मीयता की निर्झरिणी का प्रस्फुटन कातर नेत्रों को विषाक्त करने लगता है और व्यतीत किये उन अन्तरंग क्षणों को मनुष्य एक ‘दु:स्वप्न’ स्वीकार कर, विस्मृतिलोक से सम्बद्ध हो जाता है और समय-शिला पर श्रान्त होकर अपने जीवन-व्यापार के साथ सम्पृक्त हो जाता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ६ अगस्त, २०२० ईसवी।)