Interview : स्नातक निर्वाचन क्षेत्र लखनऊ की निर्दलीय प्रत्याक्षी कान्ति सिंह का विशेष साक्षात्कार

आचार्य पृथ्वीनाथ पाण्डेय के प्रति रविनन्दन सिंह की की गयी आपत्तिजनक टिप्पणी का उत्तर

आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ को अपनी जागीर समझनेवाला निरीह जीव रविनन्दन सिंह की चरित्रगाथा सुनिए!

रविनन्दन सिंह की भाषाशैली बहुत अलग हटकर है। लगता नहीं कि अपने विद्यार्थीजीवन में मेरी किताबें पढ़कर अपना भविष्य उन्नत बनानेवाला रविनन्दन सिंह इतना उद्धत हो सकता है। वैसे कुछ वर्षों-पूर्व और अभी कुछ ही दिनों पूर्व हिन्दुस्तानी एकेडेमी के भाषाप्रयोग और १८ अक्तूबर को ‘सरस्वती’ पत्रिका के लोकार्पण-अवसर पर जो आमन्त्रणपत्र मुद्रित हुआ था, उसमें ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ की भी सहभागिता थी। उस आमन्त्रणपत्र में बड़ी संख्या में तथ्यों और शब्दों के आपत्तिजनक प्रयोग थे। उन सभी विसंगतियों को मैंने सार्वजनिक किया था; क्योंकि ‘सरस्वती’ रविनन्दन और उनके चहेतों की बपौती नहीं है। यदि ऐसा कुछ भी ग़लत होता है, जिससे समाज दुष्प्रभावित होता है तो हमारा दायित्व बनता है कि उसे परिष्कृत किया जाये। नितान्त अवसरवादी और वर्षों से दो-दो जगहों से रुपये बटोरनेवाला (उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग के कर्मचारी के रूप में और हिन्दुस्तानी एकेडेमी से वर्षों तक प्रकारान्तर से आर्थिक लाभ प्राप्त कर) हिन्दुस्तानी एकेडेमी की पत्रिका ‘हिन्दुस्तानी’ की एक पत्रिका का वास्तविक मूल्य कितना है और अधिकृत काग़ज़ पर कितना दिखाया जाता था? रविनन्दन सिंह का पद ‘कोषाध्यक्ष’ का था और एकेडेमी के नियमों के साथ बलात्कार करते हुए इस उद्धत और निकृष्ट चरित्र का व्यक्ति रविनन्दन सिंह ने पत्रिका के सम्पादक, हिन्दुस्तानी एकेडेमी के कार्यक्रम-अधिकारी, आयोजक, संचालक के रूप में अवैध रूप में ‘विष-पुरुष’ की तरह से कुण्डली मारकर बैठा रहा। ऐसे में, स्वाभाविक प्रश्न है, उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग का यह कर्मचारी आयोग में कितने घण्टे काम करता था और हिन्दुस्तानी एकेडेमी में कितने समय तक रहता था? हिन्दुस्तानी एकेडेमी का कार्यसमय और आयोग के कार्यसमय की इसकी फाइलें निकलवाकर समझा जा सकता है। ऐसे में, इसकी सी० बी० आइ०-जाँच अपरिहार्य हो जाती है। मैं रविनन्दन सिंह-जैसे धूर्त्त और मक्कार व्यक्ति की नस-नस से वाक़िफ़ होता रहा, इसीलिए इससे एक बहुत बड़ी दूरी बना ली थी। इसे जब भी देखता था, अपना चेहरा हटा लेता था, तब यह मेरे पास आता था और कहता था– बड़े भाई नाराज़ हैं क्या? एकेडेमी आइए और मार्गदर्शन कीजिए तब मैं यही कहता था– मार्गदर्शन करनेवाले बहुत हैं। कुछ वर्षों-पूर्व के० पी० कॉलेज-मैदान में एक पुस्तकप्रदर्शनी में मेरी अध्यक्षता में एक कविसम्मेलन हुआ था, जिसमें धूर्त्तता और चाटुकारिता की प्रतिमूर्ति-सा दिखनेवाला इसी रविनन्दन सिंह ने इस तथ्य को सार्वजनिक किया था– मैं ‘सर’ की पुस्तकें पढ़कर यहाँ तक पहुँचा हूँ। कल तक जिस व्यक्ति को मेरी पुस्तकें उपयोगी लग रही थीं, वही उसके लिए आज गाइड, कुंजी, कट्-पेस्ट की क्षुद्र सामग्री बन गयी है। “जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो” का घिनौना चरित्र जीनेवाला और अधिक वर्षा के कारण बजबजाते हुए नाले सा उमड़नेवाला, जोंक की प्रवृत्तिवाला कुत्सित-कलुषित हृदयवाला रविनन्दन सिंह! तुम चुल्लूभर पानी में डूब मरो।

रविनन्दन सिंह! जितनी तुम्हारी अवस्था होगी, उसकी पाँच गुना कर लो और जितना तुम्हारे शरीर का भार हो, उसका भी पाँच गुना कर लो; अब उनको जोड़ लो। उस योगफल से भी अधिक तुम्हारे शब्दों में– मेरी कट-पेस्ट, गाइड आदिक हैं।
मैं तो सीना ठोककर डॉ०, आचार्य, भाषाविद् लिखता हूँ, तू तो जहाँ था, वहीं तक रह गया है। तेरी पुस्तकें भी मेरे पास हैं; रँगकर रख दिये हैं, ज़रूरत पड़ने पर उन्हें भी इतनी तल्ख़ी के साथ सार्वजनिक करूँगा कि तू ‘मरते दम तक’ भूल नहीं पायेगा। तेरे-जैसे कीड़े-मकोड़े रोज़ चिपकने की कोशिश करते हैं; मगर मसल देता हूँ।

अल्पज्ञानी, कुछ समाचारपत्रों के संवाददाताओं की मेहरबानी पर छपनेवाले रविनन्दन सिंह! मैंने एक समाचारपत्र में किसी विषय पर छपे तुम्हारे और तुम्हारे एक चहेते के वक्तव्य को ‘लाल स्याही’ से घेरकर सम्बन्धित संवाददाता से कह दिया था– वह तुम दोनों के पास भेज दे, ताकि तुम दोनों अपनी ‘अस्ली औक़ात’ समझ सको।

रविनन्दन सिंह! किस संस्था के आयोजन में मैं यह शर्त रखकर जाता हूँ– मुझे ‘अध्यक्ष’ बनाया जायेगा तो मैं आऊँगा? यदि कोई अध्यक्ष बनाता है तो वह उसकी श्रद्धा रहती है। पहुँच तो तुम्हारी भी समाचारपत्र के संवाददाताओं तक है, उन्हीं आयोजन में तो तुम भी आते थे, फिर क्यों नहीं मंच पा जाते थे?

मैंने आज तक किसी से नहीं कहा है कि मुझे पुरस्कार-सम्मान दो। तुम तो लखनऊ से दिल्ली तक की यात्रा करते रहे कि तुम्हें पुरस्कार मिल जाये और तुमने पाये भी; परन्तु हिन्दुस्तानी एकेडेमी को आड़ बनाकर।

आज का मेरे विरोध में की गयी तुम्हारी टिप्पणी से लगने लगा है कि तुम कुछ भी कर गुज़रोगे; मेरी हत्या भी करा सकते हो; क्योंकि मुझे ‘लाइलाज कैंसर’ कहनेवाले और सम्मेलन में मेरी उपेक्षा करनेवाले ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’, प्रयागराज के सहायक मन्त्री, दबंग श्यामकृष्ण पाण्डेय कविता उपाध्याय, ऊषा पाण्डेय (प्रयागराज) तथा तुम्हारे इस सम्प्रेषण पर तुम्हारा समर्थन करनेवाले लोग (सबका पता-ठिकाना अंकित कर चुका हूँ।) तुम्हारे इस घिनौने कृत्य में शामिल होकर तुम्हारा समर्थन कर रहे हैं।

नियम को ताक पर रखकर तुम्हारे कार्यकाल में जिस व्यक्ति को पुरस्कार दिया गया था, उसको भी मैंने सार्वजनिक किया था, इसलिए मिर्ची का लगना स्वाभाविक और मनोवैज्ञानिक है। हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने सरकारी राजस्व की बरबादी कैसे की है, इसे भी समझ लो। कुछ समय एक ही पाण्डुलिपि को दो बार छपवाया गया था। पहली छपी पुस्तक को रद्द कर दिया गया और उसे पुन: छपवाया गया है। प्रमाण और साक्ष्य बहुत हैं; ज़रूरत पड़ने पर न्यायालय तक पहुँचने में देर नहीं लगेगी। एक लाख रुपये तुम्हारी कारगुज़ारियों के नाम करते हुए, न्यायिक प्रक्रिया के अन्तर्गत मैं कहाँ तक जा सकता हूँ, यह तुम्हारी कल्पना से परे है, फिर तो एफ०आइ०आर० और अदालत का चक्कर शुरू हो जायेगा; देश की पत्र-पत्रिकाओं में छपने का सिलसिला चलता रहेगा।

तुमने मेरे मित्र, विद्यार्थी तथा साहित्यकार मित्रवृन्द के लिए अपमानभरे शब्द कहे हैं, तो सुन! मेरे प्रबुद्ध विद्यार्थी ही तुझे प्रत्येक स्तर पर पानी पिलाने के लिए पर्याप्त हैं। मेरे साहित्यिक मित्रों की रचनात्मक क्षमता से तू अभी अनजान हैं। एक साहित्य मित्र तेरी लेखनयात्रा पर इतने भारी पड़ेंगे, जिसकी तू कल्पना नहीं कर सकता।

“डंके की चोट” पर पत्रकारिता करता आ रहा हूँ। जहाँ कहीं स्वाभिमान पर आँच आयी, पदप्रहार कर बढ़ता गया। कभी किसी सरकार की ग़ुलामी नहीं की।अध्ययन-अध्यवसाय-अभ्यास के बल पर रेखांकित होता आ रहा हूँ।

तुमने जिस समाचारपत्र में व्याकरणलेखन-विषयक बातों पर प्रश्न खड़े किये हैं, उसे मैं आज और अभी से छोड़ने को तैयार हूँ, बशर्ते मेरे स्थान पर ‘तुम’ उसका लेखन करोगे। हो तैयार? तुम्हारे उस लेखन को चिथड़ा करके रख दूँगा। तुमने कुछ पुस्तकों की भूमिकाएँ भी लिखी हैं। सच देखा जाये तो तुम्हारे भीतर ‘कक्षा आठ’ तक के भाषालेखन का संस्कार, सहूर, सलीक़ा तक नहीं है। मैं किसी शब्दप्रयोग को ग़लत कहता हूँ तो उसे सही करके बताता भी हूँ। है तेरे अन्दर क्षमता? तू ही किसी को अपने शब्दों से अपमानित करना जानता है? नहीं। मेरे शब्दतूणीर में ऐसे-ऐसे तीर हैं और ‘ब्रह्मास्त्र भी, जो तुझे इतने भीतर तक बेधकर रख देंगे कि तू कहीं का नहीं रहेगा।
पामर रविनन्दन सिंह! तुझे मैं खुली चुनौती देता हूँ– किसी एक विषय पर शुद्ध लेखन करके दिखा दे। उसका मूल्यांकन किसी जानकार व्यक्ति से करा ले।

मैं क्या लिखता हूँ; नहीं लिखता हूँ, इसका तू ‘ठीकेदार’ है क्या? तू जो लिखता है, कितना सही लिखता है, उधर नज़रें दौड़ा। पहले अपने छेदों को रफ़ू करा ले। मेरे लेखन का मूल्यांकन ‘तू’ करेगा? क्या है तेरी सारस्वत सामर्थ्य/ हैसियत? मेरे प्रति की गयी तेरी इस टिप्पणी में इतनी अशुद्धियाँ हैं कि उन्हें मैं व्यापक स्तर पर सार्वजनिक कर दूँ तो तू कहीं मुँह दिखाने-लायक़ नहीं रहेगा।।

व्याकरण की जिन पुस्तकों को तुमने गाइड, कुंजी, कट्पेस्ट आदिक कहे हैं, जब लिखने बैठेगा तब आँखों से ख़ून फेंक देगा। प्रतियोगी विद्यार्थियों का स्तर “नीर-क्षीर विवेकी” का होता है। वे किसी भी पुस्तक को यों ही नहीं पढ़ते। मेरी अभी सत्रह पुस्तकें प्रकाशन-प्रक्रियान्तर्गत हैं; छपकर आयेंगी तो सार्वजनिक करूँगा, तब तुझे साँप सूँघ जायेगा। हज़ारों पुस्तकों के कट्पेस्ट (तेरे शब्दों में) करने के लिए ‘कलेजा’ चाहिए। है कलेजा तो दो ही पुस्तकों की कट्पेस्ट करके दिखा दे। आजा मेरे अध्ययनकक्ष में। मेरा अध्यवसाय जब देखेगा तब दाँतो तले अँगुली दबाते हुए भाग खड़ा होगा।

उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग में तू कर्मचारी है, पक्ष तो लेगा ही। वर्षों से आयोग में नियुक्तियों का खेल जिस तरह से होता आ रहा है, वह सार्वजनिक हो चुका है; अनेक विवादित प्रकरण न्यायालय में हैं। तुम्हें मालूम हो अथवा न हो, अनेक प्रकरणों में मेरे सारस्वत कर्म को तेरे द्वारा बतायी गयी गाइड, कुंजी, कट्पेस्ट सामग्री को ही न्यायालय ने ‘प्रमाण’ माने हैं। मेरी साधना का ही परिणाम-प्रभाव है कि मेरी व्याकरणात्मक और संरचनात्मक अवधारणाओं और परिभाषाओं को आधार बनाकर अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्न किये जाते रहे हैं। मेरी कार्यक्षमता और कर्तृत्व पर अनेक शोध हुए हैं; देश के अनेक विश्वविद्यालयों और अन्य स्तर की शैक्षणिक संस्थाओं में मेरी पुस्तकों का अध्ययन-अध्यापन किया जाता है। है तेरे में सामर्थ्य?

अहम्मन्य रविनन्दन सिंह! अभी मैंने अपने तरकश से एक ही तीर छोड़ा है। प्रतीक्षा कर!

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