सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

प्रयाग का विलक्षण आध्यात्मिक वैभव

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

प्रयाग (इलाहाबाद) मे तीर्थयात्रियों का गमनागमन (‘आवागमन’ अशुद्ध है।) आरम्भ हो चुका है। इन दिनो ‘माघ मेला’ की आध्यात्मिक उत्सवधर्मिता के साथ सभी तीर्थयात्री सम्बद्ध हो गये हैं। सुदूर अंचलों से आस्थावान् जनसमूह ‘माघ-स्नान’ करने के लिए आने लगा है; फिर हो क्यों न; ‘कूर्म पुराण’ मे ‘माघस्नान-महिमा’ का वर्णन जो इस रूप में किया गया है :―

“सितासिते तु ये स्नाता माघमासे युधिष्ठिर,
न तेषां पुनरावृत्ति: कल्पकोटि शतैरपि।”
‘तीर्थराज’ प्रयाग की महत्ता को समझिए :―
“त्रिवेणी माधवं सामं भरद्वाज च वासुकिम्।
वन्दे अक्षयवटं शेषं प्रयागं तीर्थ नायकम्।।”

बाबा तुलसी ने प्रयाग के माहात्म्य को इस रूप में रेखांकित किया है :―
”माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथ पतिहि आव सब कोई।।
देव दनुज किन्नर नर श्रेनी। सादर मज्जहि सकल त्रिबेनी।।
पूजहिं माधव पद जल जाता। परसि अखयबटु हरख हिंगाता।।”

वहीं प्रयाग का एक मोहक रूप मे अभिज्ञान (परिचय) कराया गया है :―
”तीर्थावली यस्य तु कण्ठभागे। दानावली वल्गति पाद मूले।
व्रतावली दक्षिण बाहु मूले।
स तीर्थराजो जयति प्रयागः।।”

निस्संदेह, प्रयाग-अस्तित्व का यह प्रमाण अखण्डनीय है :―
”श्रुतिः प्रमाणं स्मृतयः प्रमाणम्। पुराणमप्यन्न परं प्रमाणम्।।
यत्रास्ति गङ्गा यमुना प्रमाणम्।
स तीर्थराजो जयति प्रयागः।।”

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १४ जनवरी, २०२३ ईसवी।)