नारी-सम्मान को आघात पहुँचानेवाला ‘फेवीकोल इजी स्प्रे’ का विज्ञापन!..?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


दूरदर्शन के सभी चैनलों (सरकारी-ग़ैरसरकारी) पर ‘फेवीकोल’ का जो विज्ञापन सुनाया-दिखाया जा रहा है, वह निस्सन्देह, नारी-सम्मान के प्रति अक्षम्य धृष्टता है। देश के सूचना एवं प्रसारण-मन्त्रालय को सम्बद्ध विज्ञापन-एजेंसी से स्पष्टीकरण माँगते हुए, तत्काल उस विज्ञापन को प्रतिबन्धित करा देना चाहिए। इसके लिए ‘फेवीकोल कम्पनी’, विज्ञापन-एजेंसी, विज्ञापन-लेखक तथा विज्ञापन-वाचक संयुक्त रूप से उत्तरदायी हैं। वह विज्ञापन कुछ इस प्रकार है :— फेवीकोल इजी स्प्रे से ‘लड़की’ सॉरी लकड़ी सेट हो जायेगी।
प्रश्न है, फेवीकोल से चिपकाकर सेट करने के लिए ‘लड़की’ शब्द का प्रयोग क्यों किया गया है? उसके बाद ‘सॉरी’ कहने के स्थान पर ‘लड़की’ शब्द को ‘फेवीकोल’ के उक्त विज्ञापन से हटाया क्यों नहीं गया? इससे सुस्पष्ट हो जाता है कि ‘फेवीकोल’ उत्पाद का निर्माण करनेवाले उद्योग के स्वामी को नारी-अस्मिता और गरिमा की चिन्ता नहीं है; वहीं प्रश्न है : विज्ञापन-एजेंसियों के लिए कोई आचार-संहिता बनायी गयी है अथवा नहीं, क्या सूचना एवं प्रसारण-मन्त्रालय को इसका बोध है?
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की कृति ‘मीडिया और प्रेस-विधि’ में ‘विज्ञापन की आचार-संहिता’ (पृष्ठसंख्या १९३) के अन्तर्गत ‘एडवरटाइसिंग स्टैण्डड् र्स कौंसिल ऑव् इण्डिया’ की आचार-संहिता में सुस्पष्ट शब्दों में कहा गया है,” समस्त विज्ञापनकर्त्ताओं से यह अपेक्षा की जाती है कि सभी विज्ञापन-गतिविधियाँ एवं उनसे जुड़े पहलुओं में सटीकता, सचाई, साफ़-सुथरापन तथा उपभोक्ता-हितों के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण हो।”
इतना ही नहीं, ‘विज्ञापन की नैतिकता’ के अन्तर्गत यह व्यवस्था की गयी है कि इससे किसी की सामाजिक छवि का हनन् न हो तथा कामोत्तेजक और फूहड़ चित्रों का प्रदर्शन न किया जाये। इस प्रकार यह सिद्ध हो चुका है कि ‘फेवीकोल’ विज्ञापन की उक्त शब्दावली एक आपराधिक कृत्य है। इस विज्ञापन से सम्बन्धित समस्त इकाइयों को नारी-अपमान-अवमान के लिए कठघरे में खड़ा किया जाये।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २१ अप्रैल, २०१८ ई०)

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