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देश ‘राष्ट्रद्रोहियों’ और तानाशाहों के शिकंजे में!

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

विपक्ष के चरित्र पर थूकने की भी इच्छा नहीं होती। देश को बरबाद कराने में यदि किसी की भूमिका है तो वह है, देश का विपक्षी दल :– अन्धा, बहरा, गूँगा, लँगड़ा– सर्वांग विकृत। हमारी राष्ट्रीयता को जिस षड्यन्त्र के अन्तर्गत बन्धक बनाकर रख दिया गया है, उससे हमारा रक्त उबलने लगता है। कितना अच्छा रहता, हम पराधीनता के पिंजरे में ही क़ैद रहते। अँगरेज़ अच्छा-बुरा जो भी कहते थे, उसे करके दिखाते थे। वे अपनी नीति और अपने निर्णय पर अटल रहते थे। आज़ाद भारत का शासक और उसके मातहत थूकते हैं और चाटते भी हैं; क्योंकि वैसा उन्होंने संस्कार ही विकसित कर लिया है।

सत्तापक्ष के पास अवकाश ही नहीं है कि वह एक बार सोचे तो– हमारा भारत ‘कल’ क्या था, ‘आज’ क्या हो गया है? निष्कण्टक साम्राज्य भोगने का दु:सह स्वप्न रावण भी देखा करता था; कंस का भी दर्शन वही था; अन्तत:, हुआ क्या?
मत भूलो! जब किसी देश को उसके अधिकारों से वंचित रख, उसे ‘रोटी-कपड़ा-मकान’ से बेदख़्ल कर दोगे तब वह ”जान हथेली पर” लेकर कुछ भी करने के लिए निकल पड़ेगा; क्योंकि तत्कालीन मनोविज्ञान भी यही है कि निर्दोष प्रजा को राजा यदि छलेगा तो वह एक सीमा तक सहन करेगा, उसके बाद “इस पार वा उस पार” को आत्मसात् करता हुआ निकल पड़ेगा, ‘आततायियों का विनाश करने के लिए’।

आगामी चुनावों में ‘नोटा’ प्रयोग कर इन सभी की अस्ली औक़ात दिखानी है। यदि हमारे-आपके घरों में भिक्षुक की मुद्रा में आयें तो वर्षों से भिगोये हुए ‘चमरौंधे जूतों’ से सेवा-सत्कार करना है।

सत्तापक्ष का यदि कोई भी नेता आये तो वर्षों से ‘तेल पिलाये लाठी’ से आवभगत करनी है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ सितम्बर, २०२० ईसवी।)

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