शुद्ध शब्द ‘बीभत्स’ है अथवा ‘वीभत्स’?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


यहाँ पर दो शब्द हैं : ‘बीभत्स’ और ‘वीभत्स’। ‘मुक्त मीडिया’ की एक मित्र हैं, ‘सुधा मिश्र द्विवेदी जी’। सुधा जी रेलविभाग में ‘राजभाषा-अधिकारी’ हैं; कई भाषाओं की ज्ञाता हैं तथा ‘गोल्ड मेडलिस्ट’ भी। नीचे का सम्प्रेषण सुधा जी का ही है, जिसमें उन्होंने कई प्रकार के तर्क प्रस्तुत करते हुए और ‘शब्दकोश’ से प्रमाण प्रस्तुत करते हुए, ‘वीभत्स’ को ही शुद्ध ठहराया है। उन्होंने ‘बीभत्स’ को भोजपुरी और प्रान्तीय भाषा-भाषियों का उच्चारण बताया है। यदि ऐसा है तो वे ‘शुद्ध’ उच्चारण करते हैं।
इस विवादित सम्प्रेषण के साथ एक अन्य मित्र आर० एन० मिश्र जी भी जुड़े हुए हैं और वे भी सुधा जी के “हाँ- में-हाँ’ मिलाते हुए उनके साथ चल रहे हैं। उन दोनों के तर्क शुद्ध शब्दलोक में भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं, जो दोनों के लिए घातक तो है ही, हमारे विद्यार्थियों और अध्यापकों के लिए महा घातक है।
मैं इनके सारे तर्कों और प्रमाणों को ‘शुद्धता के स्तर’ पर अपने तर्कों-तथ्यों तथा साक्ष्यों के आधार पर ‘मिथ्या’ सिद्ध करता आ रहा हूँ परन्तु वे दोनों स्वीकार नहीं कर रहे हैं, यद्यपि अन्तत:, उन्हें अपने ‘असत्य’ को स्वीकार करना पड़ेगा।
आर०एन० मिश्र जी का यह कहना कि ‘बीभत्स’ शब्द भोजपुरी में है, जो कि पूर्णत: अनुपयुक्त है। भोजपुरी में ‘बीभत्स’ नहीं, ‘भिनुक’, ‘भिनुकाइ’, ‘भिरुकि’ तथा ‘भिरुकाइ’ कहते हैं। उदाहरण : हो मुअल कुकुरा के देखि के मनवा भिरुकि/ भिनुकि गइल बा।
सुधा जी को इस तथ्य का संज्ञान लेना चाहिए कि भारत में प्रान्त नहीं, अपितु ‘राज्य’ और ‘संघ-शासित क्षेत्र’ हैं अतएव उन्हें प्रान्तीय के स्थान पर राज्यीय अथवा भारतीय भाषाएँ का प्रयोग करना चाहिए था।
क्या सुधा जी और आर० एन० मिश्र जी मेरे इस शब्दप्रयोग को मिथ्या सिद्ध कर सकते हैं? सुधा जी तो तेलुगू, पंजाबी तथा बांग्लाभाषा भी जानती हैं। वे बता सकती हैं, इन भाषाओं में ‘बीभत्स’ क्या कहते हैं?
सुधा जी और आर० एन० मिश्र जी ‘बाहर’ के अर्थ में ‘वाह्य’ को शुद्ध शब्द स्वीकार करते हैं अथवा ‘बाह्य’ को?
‘हलायुधकोश:’ और संस्कृत के शेष कोश में ‘बीभत्स’ को ही शुद्ध माना गया है, जिसे अकाट्य साक्ष्य के रूप में मैंने नीचे प्रस्तुत किया है।
‘साहित्यदर्पण’ नामक ग्रन्थ में रस की परिभाषान्तर्गत ‘बीभत्स’ का उल्लेख हुआ है, समझें :——
“शृङ़्गाराद्यष्टरसान्तर्गतषष्ठरस: ; जुगप्सास्थायिभावस्तु बीभत्स: कथ्यते रस:।” इति साहित्यदर्पणे (३। २६३)
इस ‘मुक्त मीडिया’ से देश के विद्वान्-विदुषीवृन्द सम्बद्ध हैं अत: आप सभी को सप्रमाण यह सुस्पष्ट करना है, ‘बीभत्स’ शब्द शुद्ध है अथवा ‘वीभत्स’ शब्द शुद्ध है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय; २५ नवम्बर, २०१७ ई०)


सुधा मिश्र द्विवेदी

Note : श्री आर० एन० मिश्र जी का तर्क समझें :—–
बिहार में भोजपुरी में V को “वी” न कहकर “भी” कहते हैं very को वेरी न कहकर भेरी कहा जाता है vinod विनोद न लिखकर binod बिनोद, वीर को बीर, वृहस्पतिवार को बृहस्पतिवार लिखा जाता है इसी तरह वीभत्स को बीभत्स लिखा जाता है । शुद्ध हिन्दी शब्द वीभत्स है और संस्कृत में भी वीभत्स ही है । बीभत्स भोजपुरी में है ।
सुधा मिश्र द्विवेदी जी का कथन :——
दो तीन दिन पहले मेरे पोस्ट में वीभत्स शब्द पर वाद विवाद हुआ था ।अधिकांश लोग यहां तक कि मैं भी वीभत्स शब्द को सही कह रही थी जबकि डा पृथ्वीनाथ पांडेय जी केवल बीभत्स शब्द सही है यह बता रहे थे ।
अतः आज मानक शब्दकोश देखने पर पता चला कि दोनों ही शब्द सही हैं । खडी बोली मे प्रचलन में वीभत्स ही सही है । जबकि भोजपुरी इत्यादि प्रांतीय भाषाओं के बोलने वाले बीभत्स कहते हैं ।शब्द संस्कृत में वीभत्स ही है ।मैंने शब्दकोश के पन्नों की तस्वीर लगा दी है ।

डॉ० अतिराज सिंह (महिला) का वक्तव्य :—- भाषा विज्ञान की सही जानकारी होने के बाद ही किसी शब्द को लेकर अपनी विद्वता दिखाना सही होता है…….अन्यथा उसे विद्वता नहीं अधकचरा ज्ञान कहा जाता है |

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय :—- डॉ० अतिराज सिंह जी ! शब्दप्रयोग करते समय ‘अतिवादिता’ का परिचय न दें। पहले आप शुद्ध वाक्यरचना

करने की सामर्थ्य ग्रहण करें।

डॉ० अतिराज सिंह का विचार :–——–
“मैं स्पष्ट और कम शब्दों में सबकी जिज्ञासा शांत कर देती हूँ………
हिंदी भाषा में चार तरह के शब्द हैं……
तत्सम,तद्भव ,देशज और विदेशी|
तत्सम-संस्कृतनिष्ठ
तद्भव-उसी का बिगड़ा रूप
देशज…..क्षेत्रीय
विदेशी–फारसी,अरबी,उर्दू.अंग्रेजी आदि |
अब प्रश्न ‘वीभत्स ‘ और ‘बीभत्स ‘
का — ‘वीभत्स ‘ संस्कृतनिष्ठ शब्द है शुद्ध रूप
‘ बीभत्स ‘ तद्भव रूप……
भाषा की दृष्टि से दोनों सही|
रहा सवाल उच्चारण का तो डाॅ . पाण्डेय मेरा भी जन्म और शिक्षा बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्बी क्षेत्र में हुआ है| वहाँ ‘व’ का उच्चारण ‘ब’ और ‘श ‘ का ‘स’ किया जाता है और लिखने में भी वही आ जाता है| इसमें बुरा मानने की क्या बात है ?
सुधा जी सही हैं |
अब भी कोई प्रश्न करे या बहस करे तो उसकी समस्या है|”
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की प्रतिक्रिया :————
“डॉ० सिंह जी! आपके अनुसार, यदि ‘बीभत्स’ तद्भव है तो मानक कोश ‘हलायुधकोश:’ ‘बीभत्स’ को स्वीकार क्यों कर रहा है?
आप कृपया नीचे दिये गये अकाट्य प्रमाण का अध्ययन करें :—–
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय के तर्क और प्रमाण प्रस्तुत करने के बाद डॉ० अतिराज सिंह जी के स्वर बदल गये, जबकि वे ऊपर स्पष्ट शब्दों में कह चुकी हैं, “बीभत्स ‘तद्भव रूप…..”
अब नीचे डॉ० अतिराज सिंह क्या कहती हैं, समझिए :——
“आदरणीय डाॅ.पाण्डेय जी ! कौन कहता है कि बीभत्स स्वीकार्य नहीं है या अशुद्ध है| हिंदी साहित्य के स्वीकार्य चार तरह के शब्दों में तद्भव शब्द भी हैं …..अब कोई कहे कि नर्स ,स्टेशन अंग्रेजी शब्द है…..सही है….पर हिंदी साहित्य में ऐसे शब्द भी मान्य हैं | हिंदी साहित्य इतना धनी और विशाल हो गया है कि अध्ययन के लिए शायद एक जन्म कम पड़ जाए |
अब विराम दीजिए…..सभी विद्वज्जन को नमन!”
 
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय –
ज्ञातव्य है कि तद्भव शब्द शुद्ध नहीं होता, तत्सम शब्द शुद्ध है। ऐसे में, प्रश्न है, जिस शब्द को डॉ० अतिराज सिंह जी ‘तद्भव’ बता रही हैं, उसी शब्द को शुद्ध भी कह रही हैं? ऐसे में, ‘तत्सम’ के अस्तित्व का औचित्य क्या है? तत्सम के स्थान पर ‘तद्भव’ को ही संस्कृतनिष्ठ क्यों नहीं मान लिया जाता?
आर० एन० मिश्र जी का तर्क समझिए :——
“पाण्डेय जी प्रमाण तो बहुत सारे हैं इसके समर्थन में मेरे पास लेकिन मैं इसे देने की आवश्यकता नहीं समझता । आप के माध्यम से काफी अच्छी जानकारी प्राप्त हुई, धन्यवाद । आप को जो सही लगे वह आप लिखें मुझे , गिल साहब व सुधा जी को जो सही लग रहा है हम लोग लिख रहे हैं । सोशल मीडिया, आपसी सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाने का माध्यम है न कि वाद विवाद व श्रेष्ठता सिद्ध करने का मंच। कृपया इसको अब विराम दें। सबको नमन सादर ….”
 रेणु त्रिवेदी मिश्र जी :——-
“अच्छा,पर मुझे भी लगता है कि वीभत्स ही होता है।वैसे एक बात तो है कि हिंदी बड़ी उदार भाषा है।प्रांतीय असर,बोलचाल का लहज़ा ,भी वर्तनी कों प्रभावित करते हैं,जिसे बड़ी सहजता से अपनाया गया है।अनावश्यक विवाद हो रहा।समय और ऊर्जा नष्ट हो रही।दोनों ही सही हैं।”
अब एक अन्य तर्क को समझिए :——
अधिवक्ता यमुना पाण्डेय :-——–
“आदरणीय विज्ञ बन्धु ,हमारी दी ..सहित यदि पाणिंन के ब्याकरण का यहां अनुसंधान न करें तो ही सब यथार्थ में समझ आ जाएगा । रही बात विद्वता प्रकट करने की तो एक समय जब मैं सीबीआई न्यायालय में कार्य रत था , तब एक पीएचडी सज्जन आये थे , तो उन्हें कहा गया था क्या ” प्रस्थापना का प्रतिसंहरण ,,
हो गया था ,, । हम अब इसको अंग्रेजी में लिख देते हैं ‘A proposal is revoked – वह संघरण लिखते थे और बार बार लिखते थे । कहने का तात्तपर्य यह है कि ” आकृति को आक्रति भी कहा जाता है ,, । वीभत्स को हमारे फतेहपर में भीभत्स का उच्चारण होता है ,, भाषा कंभी भी ब्याकरण से नहीं चली पर जहां भी रही अपनी क्षेत्रियता की भाषा को समवेत उसके संग होकर चली है ।
अस्तु ! यहां पर निवेदन है दी… यहां पर उचित हैं ।
अन्य और भाषा विवाद को परे रखिये , इसपर बड़े बड़े विद्वान अनुतीर्ण हो गए हैं ।
दी ..प्रणाम”

 हरिवल्लभ शर्मा ‘हरि शर्मा’ जी :———
‘वीभस्त’

ओम गिल जी :————–
“मेरे पास कोई भी शास्त्रीय प्रमाण नहीं है पांडेय साहब ! हम कई पीढ़ियों से यही पढ़ते और पढ़ाते आ रहे हैं। वन को बन, वाजपेयी को बाजपेयी, वनिता को बनिता, व्यापारी को ब्यापारी, वज्र को बज्र, वोट को बोट, विमल को बिमल आदि पढ़ सुनकर मुझे वीभत्स ही सही लगा। बीभत्स आपको सही क्यों लग रहा है ?”
 वीरेन्द्र सिन्हा ‘अजनबी’:——
“मैं भाषाविद नहीं, मेरी परीक्षा न लें, किन्तु जो सर्वमान्य है उसे नकारना नही चाहिए। अगर कोई व्याख्या भी कर देगा तो भी आप संतुष्ट होंगे नहीं क्यों कि शायद आप अपभ्रंशों के समर्थक हैं।”
अजनबी जी भाषा के जानकार नहीं है, जिसे वे स्वयं स्वीकार कर रहे हैं; इसके बाद भी उनका आत्मविश्वास देखिए :————-
“वीभत्स” शब्द ही सही है। प्रान्तीय भाषाओं में बीभत्स हो या कुछ और वह अशुद्ध है।”

अब प्रश्न है, अजनबी जी जब भाषाविद् नहीं हैं तब वे किस आधार पर ‘बीभत्स’ को अशुद्ध बता रहे हैं?
वीरेन्द्र सिन्हा ‘अजनबी’ :
डॉ “पृथ्बी”नाथ जी कृपया ‘बिचार’ कीजिये यदि कोई चाहे तो अपने ‘बिबेक’ से किसी भी शब्द का उच्चारण अपनी ‘सुबिधा’ से ‘वदल’ कर प्रयोग कर ले। मैं तो आपके ‘बीभत्स’ को ‘बिभीत्स’ लिखना पसंद करूंगा।”
इस ‘दबंग’ व्यक्ति के बारे में आपकी राय क्या है?
यहाँ यह लोकोक्ति सार्थक बैठती है, “भैंस के आगे बिन बजायी, भैंस खड़ी पगुराय।”
0 विवेक आस्तिक का मत है :———-
“वीभत्स ही संस्कृतिनिष्ठ /तत्सम शब्द है। बीभत्स देशज या तद्भव हो सकता है आदरणीया …अवधी और ब्रजभाषा में भी व की जगह ब हो जाता है।”
आस्तिक जी यह ही नहीं समझ पाते कि ‘बीभत्स’ देशज् है अथवा तद्भव है परन्तु ‘वीभत्स’ को वे ‘संस्कृतिनिष्ठ’ मानने से हिचकते नहीं। उन्होंने एक नया प्रयोग कर दिखाया है; अर्थात् वे तत्सम को ‘संस्कृति’ मानते हैं, जबकि वैयाकरण ‘संस्कृत’ को मानता आया है।
सुधा मिश्रा द्विवेदी– आपने मेरे पोस्ट पर मेरा निम्नलिखित उत्तर अवश्य पढा है , उसके बाद भी आपने अपने कमेंट में बिना कोई संशोधन के यहां पूरा कापी कर दिया ।मैंने विनम्रता पूर्वक आपसे कहा था कि मैं गोल्डमेडलिस्ट नहीं हूं ,फिर भी आप भ्रामक तथ्य यहां दे रहे ।मैंने यह भी नहीं कहा कि भोजपुरी में बीभत्स कहते हे़ैं।
मेरा उत्तर था “आदरणीय प्रथमतः मैंने आपके आपके द्वारा बताये गये बीभत्स शब्द को गलत नहीं कहा ।
द्वितीयतः मैंने यह कहा कि वीभत्स भी गलत नहीं है दोनों सही हैं ,मैंने प्रमाण स्वरुप हिन्दी कोश की तस्वीर लगा दी है ।
तीसरी बात कहीं भी मैंने यह नहीं कहा कि भोजपुरी में बीभत्स कहते हैं ।मैंने लिखा कि भोजपुरी बोलने वाले बीभत्स उच्चारण करते हैं ,यहां बहुत से लोगों को मैंने कहते सुना है ।
आपके बताने के बाद बहुत से हिंदी मे डाक्टरेट किये हुये लोगों से मेरी बात चीत हुई सबने वीभत्स का समर्थन किया ।
अंतिम बात यह कि मेरे विषय में आपने कुछ अधिक ही लिख दिया
मैं राजभाषा अधिकारी जरुर हूं पर गोल्डमेडलिस्ट नहीं ।
मैं यहा तर्क वितर्क या शास्त्रार्थ करने नहीं आई बस लोगों की शंका दूर कर रही थी ।
आप परम ज्ञानी हैं हम अकिंचन आपकी बराबरी कैसे कर सकते हैं ।”
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- कृपया पुन: देखें। सही केवल एक है, दोनों नहीं।
सत्य प्रकाश शर्मा- “ब” स्वीकार्य है , आदरणीय है। बिभेति,बिभेमि आदि।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- मूल प्रश्न है : बीभत्स शुद्ध है अथवा वीभत्स शुद्ध है?

सत्य प्रकाश शर्मा- बीभत्स शुद्ध है।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- शर्मा जी! आपका उत्तर शुद्ध है। आपका साधुवाद करता हूँ। यहाँ एक ऐसा सुशिक्षित-दीक्षित वर्ग है, जो ‘बीभत्स’ की व्याकरणिक प्रामाणिकता को स्वीकार करने से कतरा रहा है; वहीं एक बड़ी संख्या उन लोग की है, जो ‘बीभत्स’ को तद्भव और ‘वीभत्स’ को तत्सम बता रहे हैं। इससे संशय, सन्देह तथा भ्रम का वातावरण बनता जा रहा है।
दु:ख इस बात का है कि देशभर के अधिकतर शिक्षकगण ‘वीभत्स’ को शुद्ध बता रहे हैं।

वीरेन्द्र सिन्हा अजनबी- हिंदी में किसी शब्द के शुद्ध होने या न होने की बात चलेगी तो उसमें अन्य भाषाओं के उच्चारण को मान्य नही कहा जा सकता, हिंदी में क्या है वही मान्य होगा। इसमें बहस क्या है। व की जगह ब हिंदी में मान्य नहीं।

डॉ. रामानन्द तिवारी- आप कहना क्या चाहते हैं? आप किस मान्यता और मानक की बात कर रहे हैं? कृपया तथ्यात्मक ढंग से सप्रमाण अपनी बात रखें।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- अजनबी जी! कृपया भाषाविज्ञान और व्याकरण का पहले अध्ययन करें फिर तर्क करने की स्थिति में अपने को लायें।

वीरेन्द्र सिन्हा अजनबी- कृपया बिचार करें !!!

डॉ. रामानन्द तिवारी- बिचार~विचार ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- डॉ० तिवारी जी! ये भाषा के साथ बल-प्रयोग करनेवालों में से एक हैं। ये वांछनीय नहीं हैं।

डॉ. रामानन्द तिवारी- सही विश्लेषण। …’बीभत्स’ ही सही है— संस्कृत में भी, हिंदी में भी।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- डॉ० तिवारी जी! इसके बाद भी एक बड़ी संख्या उनकी है, जिनके गले ‘बीभत्स’ अभी उतर नहीं रहा है। आप अपनी टिप्पणी के ठीक ऊपर ‘अजनबी जी’ के तर्क को पढ़िए और दो-टूक प्रतिक्रिया कीजिए।

सुधा मिश्रा द्विवेदी- वीभत्स और बीभत्स दोनों ही सही हैं दोनों ही शब्दकोश में हैं और भाषा का स्वरुप बोलचाल से ही आता है तो खडी बोली के लोग वीभत्स का ही प्रयोग करते हैं और ऊपर के कमेंट इसका प्रमाण हैं ।केवल तीन ही कमेंट बीभत्स के पक्ष में हैं और तीनो इलाहाबाद के निवासी हैं ।अर्थात प्रांतीयता हावी है शब्द पर ।यदि बीभत्स सही है तो वीभत्स भी सही है ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- सुधा मिश्र द्विवेदी जी! मेरी प्रथम प्राथमिकता भाषा-शुचिता की रक्षा करने की है। हम आपने-सामने होते तो आप यह स्वीकार करने के लिए बाध्य हो जातीं कि शुद्ध शब्द मात्र ‘बीभत्स’ है। आपका यह कथन, “तीनों इलाहाबाद के निवासी हैं। अर्थात प्रांतीयता हावी है शब्द पर”, आपके लिए शोभा नहीं देता। आप पहले तत्सम-तद्भव के नियम का परिशीलन करें। हिन्दीशब्दकोश की अवधारणा को समझें।
यहाँ आपकी हठधर्मिता है, अशुद्ध को ‘शुद्ध’ बताने का, तो मेरा संकल्प है, करोड़ों अमित्रों-मित्रों को शुद्ध शब्दों के संज्ञान कराने का।

सुधा मिश्रा द्विवेदी- हठधर्मिता आप कर रहें हैं या मैं ?

डॉ. रामानन्द तिवारी- भाषा बहता नीर है। भाषा की पवित्रता के लिए उसकी अभिव्यक्ति भी पवित्र होनी चाहिए। आपका यह कथन कि “तीनों इलाहाबाद के निवासी हैं। अर्थात प्रांतीयता हावी है शब्द पर”, भाषा और उसकी अभिव्यक्ति की पावनता को दूषित कर रहा है। यहाँ किसी शब्द विशेष के प्रमाण का विमर्श चल रहा है, फिर क्षेत्रीयता और प्रांतीयता की बात कहाँ से आ गई? हम आपके संकल्प में कोई बाधा नहीं डाल रहे हैं। हाँ, संकल्प का कोई विकल्प नही होता और जहाँ तक तत्सम-तद्भव के नियम-परिशीलन और हिंदी-शब्दकोश की अवधारणा का प्रश्न है, उसमें कोई व्यक्तिगत धारणा मान्य नहीं हो सकती; शब्द-व्युत्पत्ति और व्याकरणिक विश्लेषण का फिर क्या मतलब? …नियम के साथ हठधर्मिता का आरोप क्यों? सही रूप में बात रखने के लिए स्वागत है।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- डॉ० तिवारी जी! दु:ख इस बात का है कि सच को स्वीकार करने के स्थान पर आधारहीन विषय को लाया जाता है, जबकि भाषा-शुचिता के सन्दर्भ में मैं किसी के भी साथ किसी भी स्थिति में समझौता नहीं करता, यहाँ तक कि स्वयं के साथ भी नहीं। ये तो मात्र एक ‘राजभाषा-अधिकारी’ हैं, मैं देश-विदेश के अनेक विद्वत्गण के साथ भाषा-परिष्कार को लेकर मुक्त भाव के साथ विषय-केन्द्रित होकर शालीनतापूर्वक संवाद करता हूँ। कभी-कभी लगता है, ऐसे लोग ही आज भाषा-शुचिता को नष्ट करने के लिए ज़िम्मादार हैं और बताने पर भी पूर्वग्रह की मनोवृत्ति से मुक्त नहीं हो पाते; जबकि हमें यहाँ एक-दूसरे से सीखना चाहिए। मैंने तो मुक्त कण्ठ से घोषणा कर दी है कि मेरे सम्प्रेषण पर किसी को भी किसी प्रकार की अशुद्धि दिखे तो मेरा मार्गदर्शन करे।

डॉ. रामानन्द तिवारी- सही कहा आपने।

शेषधर तिवारी- शब्दों का स्वरूप बिगाड़ने के लिए कुछ शब्दकोश भी ज़िम्मेदार हैं।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- निस्सन्देह! ऐसे शब्दकार ‘शब्दकार’ नहीं, नक़्लची होते हैं। वे बिना व्याकरणिक नियम को समझे ,अन्य कोश से सारे शब्द ज्यों-के-त्यों ले लेते हैं। उन्हें तत्सम-तद्भव, देशज तथा वैदेशिक शब्दों का उल्लेख करना चाहिए। अब जैसे हम ‘ज़िम्मेदार’ का प्रयोग करते हैं, जबकि शुद्ध शब्द ‘ज़िम:दार’/ ‘ज़िम्मादार’ है; बिल्कुल नहीं, ‘बिलकुल’ है।

सत्य प्रकाश शर्मा- देशज ।

रवीन्द्र त्रिपाठी- श्रद्धेय पांडेय जी प्रणाम वस्तुत : शुद्ध शब्द बीभत्स ही है लोग बहुत कम अधीत और मुख सुख के अभ्यासी हैं लोक, रूढि, परम्परा, व्याकरण का सम्यक बोध आपके लेखन से मिलता है । एतदर्थ बधाई स्वीकारें आभार सर ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- ज्ञानराशि बिखेरते रहें। अशुद्ध के प्रति आग्रही होने का यही कारण है।

रवीन्द्र त्रिपाठी- पांडेय जी लोग तो गोस्वामी जी के द्वारा लोक भाखा में राम कथा लेखन से भी क्षुब्ध थे आचार्य पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी आदि ने कितने अनुशासित तरीके से मानक बनाये आप अग्रसर रहें सर

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय– दु:ख और खेद का विषय यह है कि मुक्त मीडिया से जुड़े ऐसे हज़ारों लोग हैं, जो उच्चस्तरीय शिक्षणसंस्थानों में अध्यापन करते हैं; अपने को संस्कृत-हिन्दी-व्याकरण का ज्ञाता मानते हैं परन्तु यहाँ अपनी उपस्थिति अंकित कराने के लिए साहस नहीं बटोर पा रहे हैं। आज भाषा-व्याकरण को विकृत करने के लिए सर्वाधिक घातक ऐसे ही लोग हैं।

रवीन्द्र त्रिपाठी- बिलकुल सर बीभत्स ही शुद्ध है

नूतन पटेरिया- सर वसन्त और बसन्त में सही कौन सा है?

रवीन्द्र त्रिपाठी- बनन में बागन में बगरो बसंत है ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- निष्कर्ष : शुद्ध/ तत्सम शब्द ‘बीभत्स’ है।

20 Comments on शुद्ध शब्द ‘बीभत्स’ है अथवा ‘वीभत्स’?

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