सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

उठो, जागो और ज्ञानी श्रेष्ठजन के सान्निध्य मे ज्ञान प्राप्त करो

उत्तिष्ठ भारत!
तुमुल ध्वनि घन गर्जना से रिपु हृदय आक्रान्त कर दो
हे अमितविक्रम रण बल अतुल, ध्वज-धर्म उन्नत आज कर दो
उठो! रौद्र संग्राम कर दो…

डॉ० निर्मल पाण्डेय

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उस देश-काल में जब राजनीति-समाज-आध्यात्म के स्तर पर देश आत्मविश्वास की कमी से जूझ रहा था, उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशक में स्वामी विवेकानन्द ने मनसा-वाचा-कर्मणा लोक जनमानस में जिस आत्माभिमान का अंकुरण किया; उसी आत्मविश्वास और गौरव के भाव ने बीसवीं सदी के भारत में व्यापक जनान्दोलनों की उर्वर जमीन तैयार की। स्वामी विवेकानन्द भारतीय राष्ट्रवाद के आदि-सिद्धान्तकार यूँ ही नहीं कहे जाते हैं। बीसवीं सदी के उपनिवेशवाद विरोधी मास-पॉलिटिक्स के मूल में जो जन-गुबार था, उसमे शामिल हर शख्स के हृदय में विवेकानन्द का आह्वान ही रक्त संचार का जिम्मेदार था।

स्वामी विवेकानन्द के नाम के साथ सर्वाधिक उद्धृत होने वाली उक्ति है ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’, असल में यह कठोपनिषद का एक मन्त्र है –
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।।
-(कठोपनिषद्, अध्याय-1, वल्ली-3, मंत्र-14)

जिसका अर्थ कुछ यूं निकलता हैः उठो, जागो और ज्ञानी श्रेष्ठजन के सान्निध्य मे ज्ञान प्राप्त करो। विद्वानों का मानना है कि ज्ञान प्राप्ति का मार्ग उसी प्रकार दुर्गम-दुरूह और कष्टकारी है जिस प्रकार पैने छुरे की धार पर चलना।

इसमें यम द्वारा नचिकेता को दिए गए परमात्मा के अंशभूत आत्मा का ज्ञान पाने का मर्म निहित है । यम-नचिकेता दृष्टान्त आध्यात्मिक ज्ञानार्जन की बात करता है, पर स्वामी विवेकानन्द ने इस मंत्र के आरंभिक अंश को लौकिक अर्थ में प्रयोग कर लोक-जनमानस को लक्ष्योन्मुख रहने को प्रेरित-उत्प्रेरित किया ।

बुद्ध, महावीर और अम्बेडकर की तरह विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म की कमियों से आहत हो पलायनवादी रास्ता नहीं अख्तियार किया अपितु शंकराचार्य की तरह उत्थानवादी नजरिया अपनाया । उनका उद्देश्य केवल आध्यात्मिक संतुष्टि तक पहुंचना ही नहीं था, बल्कि वह हिंदूधर्म के नैतिक बल को एक उत्कृष्ट और क्रांतिकारी रूप से तार्किक आधार मुहैया कराना चाहते थे, जिस पर चलकर समाज की व्यावहारिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके ।

सो, आप भी -उठिए और जगाइए स्वयं को! जगाइए ऐसे कि आप भी हिन्दू धर्म, संस्कृति, आध्यात्म, दर्शन का चतुर्दिक विजय पताका फहराने वाले योद्धा-सन्यासी स्वामी विवेकानन्द के दिखाए मार्ग पर चल पाएं ।

आइए स्वामी विवेकानंद के आदर्शों के अनुरूप राजनीति समाज आध्यात्म का लोकोन्मुख पथ अपनाएं।
राष्ट्रीय युवा दिवस की हार्दिक शुभकामना।
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डिस्क्लेमर: कंटेंट रिपोस्ट और पोस्ट की शुरुआती पंक्तियाँ प्रियेश शुक्ल की कविता से ली गयीं हैं।