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शतरुद्रिय पाठ की महिमा

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शतरुद्रिय रुद्राष्टाध्यायीका मुख्य भाग है। शतरुद्रियका माहात्म्य रुद्राष्टाध्यायीका ही माहात्म्य है। मुख्यरूपसे रुद्राष्टाध्यायीका पञ्चम अध्याय शतरुद्रिय कहलाता है। इसमें भगवान् रुद्रके शताधिक नामोंद्वारा उन्हें नमस्कार किया गया है। ‘शतं रुद्रा देवता अस्येति शतरुद्रीयमुच्यते ‘ (भट्टभास्करका उपोद्धात भाष्य) । शतरुद्रियका पाठ अथवा जप समस्त वेदोंके पारायणके तुल्य माना गया है। शतरुद्रियको रुद्राध्याय भी कहा गया है। भगवान् वेदव्यासजीने अर्जुनको इसकी महिमा बताते हुए कहा है-
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।
सर्वार्थसाधनं पुण्यं सर्वकिल्बिषनाशनम्।
सर्वपापप्रशमनं सर्वदुःखभयापहम्।
पठन् वै शतरुद्रीयं शृण्वंश्च सततोत्थितः॥
भक्तो विश्वेश्वरं देवं मानुषेषु च यः सदा।
वरान् कामान् स लभते प्रसन्ने त्र्यम्बके नरः॥
(महा०, द्रोणपर्व २०२।१४८-१४९, १५१-१५२)

पार्थ ! वेदसम्मित यह शतरुद्रिय परम पवित्र तथा धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला है। इसके पाठसे सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है। यह पवित्र, सम्पूर्ण किल्बिषोंका नाशक, सब पापोंका निवारक तथा सब प्रकारके दुःख और भयको दूर करनेवाला है। जो सदा उद्यत रहकर शतरुद्रियको पढ़ता और सुनता है तथा मनुष्योंमें जो कोई भी निरन्तर भगवान् विश्वेश्वरका भक्तिभावसे भजन करता है, वह उन त्रिलोचनके प्रसन्न होनेपर समस्त उत्तम कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।

अथर्ववेदीय जाबालोपनिषद् में महर्षि याज्ञवल्क्यजीने शतरुद्रियको अमृतत्त्वका साधन कहा है।-
अथ हैनं ब्रह्मचारिण ऊचुः किं जप्येनामृतत्वं ब्रूहीति॥ स होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ शतरुद्रियेणेत्येतान्येव ह वा अमृतस्य नामानि ।। एतैर्ह वा अमृतो भवतीति एवमेवैतद्याज्ञवल्क्यः॥ (जाबालोपनिषद् ३)

कृष्णयजुर्वेदीय कैवल्योपनिषद् में शतरुद्रियको कैवल्यपदप्राप्तिका साधन बताया गया है। पितामह भगवान् ब्रह्माजीने महर्षि आश्वलायनसे शतरुद्रियकी महिमा इस प्रकार बतायी है-
यः शतरुद्रियमधीते सोऽग्निपूतो भवति स वायुपूतो भवति स आत्मपूतो भवति स सुरापानात्पूतो भवति स ब्रह्महत्यायाः पूतो भवति स सुवर्णस्तेयात्यूतो भवति स कृत्याकृत्यात्पूतो भवति तस्मादविमुक्तमाश्रितो भवत्यत्याश्रमी सर्वदा सकृद्वा जपेत्॥ अनेन ज्ञानमाप्नोति संसारार्णवनाशनम्। तस्मादेवं विदित्वैनं कैवल्यं पदमश्नुते कैवल्यं पदमश्नुत इति ॥

अर्थात् जो शतरुद्रियका पाठ करता है, वह अग्निपूत होता है, वायुपूत होता है, आत्मपूत होता है, सुरापानके दोषसे छूट जाता है, ब्रह्महत्याके दोषसे मुक्त हो जाता है, स्वर्णकी चोरीके पापसे छूट जाता है, शुभाशुभ कर्मोंसे उद्धार पाता है, भगवान् सदाशिवके आश्रित हो जाता है तथा वह अविमुक्तस्वरूप हो जाता है। अतएव जो आश्रमसे अतीत हो गये हैं, उन परमहंसोंको सदा-सर्वदा अथवा कम से कम एक बार इसका पाठ अवश्य करना चाहिये। इससे उस ज्ञान की प्राप्ति होती है, जो भवसागरका नाश कर देता है।

इसलिये इसको इस प्रकार जानकर मनुष्य कैवल्यरूप मुक्तिको प्राप्त होता है, कैवल्यपदको प्राप्त होता है। शतरुद्रिय नामसे एक सौ मन्त्रोंके पाठ की परम्परा भी कहीं-कहीं है। इस संदर्भमें निम्न श्लोक प्रसिद्ध है-
षट्षष्टिर्नीलसूक्तं पुनः षोडशमेव च।
एष ते द्वे नमस्ते द्वे न तं विद्वयमेव च॥
मीढुष्टमेति चत्वारि वय सोमाष्टमेव च।
वेदवादिभिराख्यातमेतद्वै शतरुद्रियम्॥

अर्थात् रुद्राष्टाध्यायीके पञ्चम अध्यायके ‘नमस्ते रुद्र० ‘ इत्यादि ६६ मन्त्र, फिर उसी पञ्चम अध्यायके प्रारम्भिक १६ मन्त्र, तदनन्तर रुद्राष्टाध्यायीके छठे अध्यायके ‘एष ते०’ और ‘अवरुद्र०’ ये दो मन्त्र, फिर रुद्राष्टाध्यायीके पञ्चम अध्यायके ‘ नमस्ते ‘ और ‘या ते०’ ये दो मन्त्र, फिर शुक्ल यजुर्वेदसंहिताके १७वें अध्यायके ३१वें तथा ३२वें मन्त्र (‘न तं विद्’ तथा ‘विश्वकर्मा०’) तदनन्तर रुद्राष्टाध्यायीके पञ्चम अध्यायके ५१वें मन्त्रसे ५४वें मन्त्र (‘मीढुष्टम शिवतम०’ से ‘असंख्याता सहस्राणि०’)- तक और फिर रुद्राष्टाध्यायीके सम्पूर्ण छठे अध्यायके आठ मन्त्रोंका यथोक्त रूपसे आनुपूर्वी पाठ करनेपर सौ मन्त्र हो जाते हैं। सौ मन्त्र होनेसे इसे शतरुद्रिय कहा जाता है।