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‘रसगुल्ला’ की लड़ाई में बंगाल ने ओडिशा को हराया!

बायीं ओर ओडिशा का 'खीर मोहन' और दायीं ओर बंगाल का 'रॉशोगुल्ला'
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


यह सुनकर और पढ़कर बहुत आश्चर्य होता है कि एक प्रकार के मिष्टान्न को लेकर भारत के दो राज्य आपस में भिड़ गये। पहले तो इसे लेकर वैचारिक संवाद होते रहे परन्तु बात नहीं बनने से संवाद ने विवाद का रूप ले लिया और दावे-प्रतिदावे के दौर शुरू हो गये। स्थिति इतनी बिगड़ गयी कि अपने-अपने दावे को पुष्ट करने के लिए बंगाल और ओडिशा को धर्म और इतिहास का सहारा लेना पड़ा। इस तरह से बहुत समय से ‘बेचारा’ रसगुल्ला बंगाल और ओडिशा राज्यों की राजनीति की चाशनी में लुढ़कता-पुढ़कता, डूबता-उतराता रहा। ओडिशावालों का पहला दावा रसगुल्ले पर था, वहीं बंगाल राज्य भी अपनी पहली दावेदारी से टस-से-मस नहीं हो रहा था। यहाँ तक कि ओडिशा में सत्तासीन बीजू जनता दल के सदस्य आर०पी० स्वैन ने ओडिशा-विधानसभा में ‘रसगुल्ला’ के स्वामित्व के विषय को प्रस्तुत किया था, जिसे लेकर कई बार चर्चा-परिचर्चा की गयी थी। अन्त में, मात्र एक रसगुल्ला को लेकर तीन समितियाँ गठित की गयीं और सभी समितियों ने अपनी-अपनी रिपोर्ट में रसगुल्ला के स्वामित्व का अधिकार ओडिशा को देने की सिफ़ारिश की थी।
१४ नवम्बर, २०१७ ई० को यह तय हो गया था कि सबसे पहले रसगुल्ला ‘पश्चिमबंगाल’ में वर्ष १८६८ में अस्तित्व में आया था, जबकि ओडिशा का दावा था कि रसगुल्ला भारत में सबसे पहले ‘उड़िसा’ के पुरी मन्दिर में बनाया और खाया गया था।
अब इस विवाद की वास्तविकता को समझने के लिए समस्या की पृष्ठभूमि को समझना होगा।
सब कुछ सामान्य था। बंगाल में ‘रॉशोगुल्ला’ और ओडिशा में ‘रसगुल्ला’ का बिना किसी भेद-भाव के साथ सेवन किया जाता था। अकस्मात् ओडिशा-शासन के मन में ‘रसगुल्ला’ के प्रथम आविष्कारक, उत्पादक का गौरव प्राप्त करने का विचार उभरा; फिर क्या था, वर्ष २०१५ में महत्त्वपूर्ण मिष्टान्न ‘रसगुल्ला’ को एक प्रकार से ‘पेटेंट’ कराने के लिए ओडिशा-सरकार बढ़ने लगी। वह सरकार ‘जी० आई०’ (जियोग्राफ़िकल इण्डिकेशन) में रसगुल्ले का आविष्कारक होने के लिए ओडिशा और रसगुल्ले का पंजीयन कराना चाहती थी।
उसी समय ओडिशा के विज्ञान-प्रौद्योगिकी मन्त्री प्रदीप कुमार पाणिग्रही ने कहा था,”हमारे पास इस बात के सुबूत हैं कि रसगुल्ले का ओडिशा में अस्तित्व पिछले ६०० वर्षों से बना हुआ है।”
ओडिशा की ओर से कर्मकाण्डीय धर्म का जिक्र करते हुए कहा गया था कि जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा की अवधि में जगन्नाथ, बहन सुभद्रा तथा भाई बलराम के साथ समापन के समय श्रीमन्दिर लौटते हैं और देवी लक्ष्मी को ‘प्रसाद’ के रूप में ‘रसगुल्ला’ देते हैं; रसगुल्ला देने की यह परम्परा तीन सौ सालों पुरानी है। इसी दिन को ‘नीलाद्रिविजय’ कहते हैं। वहीं अपने पक्ष में पौराणिक आख्यानों का आधार लेते हुए, ओडिशा की सरकार पन्द्रहवीं शताब्दी में लिखित काव्यग्रन्थ ‘दाण्डी रामायण’ को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसमें ‘रसगुल्ला’ नामक मिष्टान्न का वर्णन है। उस ग्रन्थ के प्रणेता ओडिशा के कवि बलराम दास हैं। इतना ही नहीं, ओडिशा ने ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए कहा था– रसगुल्ला पहली बार पुरी में बनाया गया था। वह मिष्टान्न ‘खीर मोहन’ था, जिसे रसगुल्ला का प्रथम संस्करण कहा गया था और बताया गया था कि ‘खीर मोहन’ से ही ‘रसगुल्ला’ का विकास होता है।
ओडिशा के तर्क के बाद बंगाल भी अपने ठोस तर्क देने में कोई चूक नहीं किया। बंगाल ने तीन तर्क दिये थे, जो निम्नांकित हैं :—–
१- यह सभी जानते हैं कि रसगुल्ला ‘छेना’ से बनता है और छेना सर्वप्रथम अस्तित्व में आया है। ‘रॉशोगुल्ला’ बांग्लाभाषा का शब्द है।
२- ओडिशा का यह कहना कि ६०० वर्षों-पूर्व ओडिशा में रसगुल्ला अस्तित्व में आया था, ग़लत है।
३- अट्ठारहवीं शताब्दी की अवधि में बंगाल में डच और पुर्त्तगाली उपनिवेशों ने छेना से मिष्टान्न बनाने की कला सिखायी थी, तभी से रसगुल्ला अस्तित्व में आया है।
अपने इन सारे तथ्यों को सत्य सिद्ध करने के लिए बंगाल-शासन ने बंगाल के प्रसिद्ध मिष्टान्न-भण्डार ‘के०सी०दास प्राइवेट लिमिटेड’ का आश्रय लिया।उल्लेखनीय है कि के०सी० दास प्राइवेट लिमिटेड’ अपने उसी पूर्वज् के मिष्टान्न-भण्डार की विरासत को सँभाले आ रहा है, जो अब ‘रॉशोगुल्ला’/ रसगुल्ला के आविष्कारक कहलाये हैं।
सारे तथ्यों को खँगालने के बाद निष्कर्ष प्राप्त हुआ है कि १८६८ ई० में नवीन चन्द्र दास ने विवादित ‘रॉशोगुल्ला’ का आविष्कार किया था।
विश्व के इतिहास में १४ नवम्बर, २०१७ ई० का अब एक ऐसा महत्त्व है, जो भारत के दो राज्यों— बंगाल और ओडिशा के लिए ‘नाक’ का प्रश्न बन चुका था।
अन्तत:, दोनों पक्षों के तथ्यों, तर्कों तथा साक्ष्यों को गम्भीरता के साथ लेते हुए, ‘जियोग्राफ़िकल इंडिकेशन’ ने १४ नवम्बर, २०१७ ई० को अपना निर्णय बंगाल के पक्ष में सुनाया था। इसप्रकार अब ‘रॉशोगुल्ला’ (रसगुल्ला) का आविष्कारक ‘बंगाल’ को सिद्ध किया जा चुका है। ज्ञातव्य है कि ‘जियोग्राफ़िकल इंडिकेशन’ एक ऐसी न्यायिक इकाई है, जो ‘बौद्धिक सम्पदा’ से सम्बन्धित विवादों का निबटारा करती है। वह यह स्पष्ट करती है कि किसी उत्पाद पर किस क्षेत्र, समाज अथवा समुदाय का अधिकार है। इस प्रकार एक प्रकार का मिष्टान्न ‘रॉशोगुल्ला’/’रसगुल्ला’ को ‘नाक’ का प्रश्न बनाकर वर्षों से चले आ रहे एक रोचक विषय का अन्त हो चुका है। बहरहाल, ‘रॉशोगुल्ला’ का अवर्णनीय आनन्द बंगाल की मुख्य मन्त्री ममता बनर्जी के लिए ऐतिहासिक अवश्य सिद्ध हुआ है।

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