भारतीय ‘नोटबन्दी’ का कृष्णपक्ष!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

० देश के सैकड़ों लोग बैंक की क़तारों में खड़े-खड़े दम तोड़ दिये थे।
० देश की सारी जनता का जीवन अस्त-व्यस्त रहा।
० आहार, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, निवास, खेती-किसानी आदिक पूर्णत: दुष्प्रभावी रहे।
० ५०० और १,००० रुपये के जितने नोट बैंक से बाहर थे, उनमें से मात्र १% को छोड़कर सारे नोट बैंक में पहुँचा दिये गये थे। ऐसे में, ‘काला धन’ कहाँ गया?
० नोटबन्दी के समय १५ लाख ४४ हज़ार करोड़ रुपये के नोट बाज़ार में थे।
० २७ हज़ार करोड़ रुपये ‘नये नोट’ छापने में ख़र्च किये गये थे।
‘नोटबन्दी’ के समर्थक उत्तर दे सकते हैं?
१- क्या ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ के किसी भी नियमावली के अन्तर्गत प्रधान मन्त्री को ‘नोटबन्दी’ की घोषणा करने का अधिकार है?
२- कितना काला धन बैंक में आया?
३- असंघटित क्षेत्रों में जिन लोग की नौकरियाँ गयी हैं, उनके लिए सरकार ने क्या किया है?
४- जिन परिवार के लोग को नोटबन्दी ने मार डाला था, उनके लिए सरकार ने क्या किया है?
५- नरेन्द्र मोदी ने कहा था : ५० दिनों के भीतर यदि देश का सारा काला धन नहीं लाया तो मुझे चौराहे पर खड़ा करके ….. पीटना। ऐसे में, अब नरेन्द्र मोदी चौराहे पर क्यों नहीं आ रहे हैं?
६- भ्रष्टाचार पर लगाम लगा?
७- महँगाई घटी?
८- क्या देश के लोकतन्त्र के साथ विश्वासघात नहीं किया गया?

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