पुस्तक समीक्षा : अपनी माटी और मानुष के अभिन्न सम्बन्धों की सुगन्ध बिखेरने वाला संग्रह है ‘मिट्टी मेरे गाँव की’

लेखिका – जयति जैन “नूतन”
पुस्तक- मिट्टी मेरे गाँव की (बुन्देली काव्य संग्रह)
प्रकाशक- श्वेतांशु प्रकाशन, नई दिल्ली
समीक्षक- गणतंत्र जैन ‘ओजस्वी’
मूल्य- ₹200 र
पृष्ठ – 104 पेज

‘सौ दण्डी एक बुन्देलखण्डी’ अथवा सुभद्राकुमारी चौहान की कालजयी रचना “बुन्देले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी… के बोल सुनकर बुन्देली माटी के गौरवशाली इतिहास से देश का बच्चा-बच्चा परिचित है। बुन्देली शौर्य जहाँ का कण-कण गाता हो, जहाँ रस, छन्द, अलंकारों से अनुप्राणित धारा सतत प्रवहमान रहती हो, वहाँ गीतों की सरितायें प्रवाहित होना स्वाभाविक ही है।

इन्हीं गीतों की अमर गिरा में बसने को आतुर हैं – बुन्देली रचनाकारा जयति जैन ‘नूतन’ की नवीन कृति बुन्देली काव्य-संग्रह – “मिट्टी मेरे गाँव की”।

इस कृति का बाहरी आवरण जितना आकर्षक और रंगीन है उसके भीतर कविताओं का संग्रह लेखिका के संवेदनशील हृदय का परिचायक तो है ही, साथ ही अपनी माटी और मानुष के अभिन्न सम्बन्धों की सुगन्ध बिखेरने वाला भी है।
इस काव्य संग्रह में लेखिका ने 58 रचनाओं के माध्यम से अपनी जन्मभूमि की परम्परा, उत्सव, विभिन्न अवसरों पर गाये जाने वाले गीतों का प्रतिनिधित्व, आपसी सम्बन्धों, उनकी आवश्यकता और नैसर्गिक छेड़खानी का अच्छा मिश्रण किया है।

इस काव्य संग्रह का जायका तब और बढ़ जाता है जब इस भाषा के शब्दों को जानने-समझने के लिये शब्द-कोश का सहारा नहीं लेना पड़ता अपितु काव्य संग्रह में आये अनेक बुन्देली शब्दों का अर्थ ‘बुन्देली शब्दावली’ में देखा जा सकता है जो कि कविताओं के अन्त में दी गयी है।

चूंकि लेखिका स्वयं इसी भूमि से हैं और अपनी माटी से प्रेम किसे नहीं होता है ? यही प्रदर्शन लेखिका ने इस काव्य संग्रह में किया है जिनमें ‘टेड़ी लुगाई’, करिया साँप, बात फैल गयी, अच्छे दिना, प्रेम, फैशन जैसी कविताओं से अपनी सभ्यता और संस्कृति का पक्ष लेती हुयीं नज़र आतीं हैं, वहीं दूसरी ओर छान्दसिक नियम में निबद्ध भाग्य, लातन के भूत, गाँव की माटी आदि अनेक कविताओं में अपने रीति-रिव़ाज, संस्कृति न छोड़ने की अनुशंसा तो करती ही हैं, साथ ही प्रेम और आनन्द का पक्ष भी लेती हैं ।

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि श्वेतांशु प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित यह 104 पृष्ठीय, 58 अनेक सामाजिक विषयों को छूती हुयीं रचनायें पठनीय और श्रवणीय हैं ।200 रु. निर्धारित मूल्य की यह पुस्तक अनेक दृष्टियों से उत्तम है, क्योंकि अपनी माटी और माहौल के बारे में लिख पाना कोई आसान काम नहीं है। अतः ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि लेखिका का यह प्रयास स्तुत्य ही नहीं अनुकरणीय भी है। थोड़ा सा प्रयास विधा को साधने का और होगा तो निश्चित रूप से अल्पवयसि लेखिका भविष्य की एक अच्छी विचारशील और क्रान्तिकारी लेखों, कविताओं का सृजन कर पायेंगी।

आपके गद्य शैली के लेख लाखों की संख्या लोग पढ़ते हैं साथ ही आपकी पूर्व में प्रकाशित पुस्तकें भी पठनीय रहीं हैं, हमें आशा ही नहीं पूरा भरोसा है कि ये पुस्तक ‘मिट्टी मेरे गाँव की’ बुन्देली भाषा की महक जरूर बिखेरेगी। लेखिका को सर्वोत्कृष्ट साधना के लिये हार्दिक बधाई।

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