पुस्तक समीक्षा : कृति- विज्ञ छंद साधना (काव्य संग्रह)

समीक्षक:- राजेश कुमार शर्मा ‘पुरोहित
(समीक्षक, कवि एवं साहित्यकार)


प्रकाशक :- उत्कर्ष प्रकाशन, दिल्ली
संस्करण :- प्रथम, 2018
पृष्ठ:- 127, मूल्य:-180/-

रचनाकार:- छगनलाल गर्ग ‘विज्ञ’

राजस्थान के ग्राम जीरावल तहसील रेवदर जिला सिरोही के सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, सेवानिवृत प्रधानाचार्य , वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार श्री छगनलाल गर्ग विज्ञ की विज्ञ छंद साधना सातवीं कृति है। इससे पूर्व इनके काव्य संग्रह क्षणबोध, मदान्ध मन, रंजन रस, तथाता, अंतिम पृष्ठ, विज्ञ विनोद आदि कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी है।

काव्य श्री, तुलसी सम्मान, हिन्दी साहित्य गौरव, राष्ट्रभाषा गौरव, छंदोउन्नायक सम्मान जैसे कई सम्मानों से सम्मानित विज्ञ साहब की प्रस्तुत कृति में अनेकों छन्दों व सवैया लिखने की तकनीक के साथ ही सामाजिक विषमताओं को प्रमुखताओं से उठाया गया है। आध्यात्मिक ग्रंथ जैसी ये कृति प्रतीत होती है जिसका एक एक शब्द मणि की तरह कीमती है। साहित्य साधना कर कठिन तपश्चर्या से गुजरते हुए विज्ञ जी ने अपनी रचनाओं को विभिन्न छन्दों के माध्यम से लिखा है। छन्दों को लिखने का विधान भी इस कृति में दिया है जिससे नवोदित कलमकार या जो कोई भी छन्द लिखने का अभ्यास करना चाहे वह सीख सकता है। यह कृति उसके लिए गुरु बन जाएगी।

छोटे से गाँव से निकलकर पूरे देश मे साहित्य जगत में नाम रोशन करने वाले व्याकरणीय ज्ञान के मर्मज्ञ विज्ञ जी ने प्रस्तुत कृति में सद्गुरु की महिमा का बखान किया है। हरिसिंह जिज्ञासु वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार इस कृति में अपने शुभकामना संदेश में लिखते हैं यह कृति उच्च कोटि का काव्य है जिसे छंदबद्ध काव्य साधना करने वाले तपस्वी कवि ने लिखा है। इसकी रचनाएँ भारतीय संस्कृति की रक्षा करने और गुणी पाठकों को लुभाने में सार्थक हैं। प्रस्तुत कृति माँ शारदे की वंदना कवि विज्ञ अपनी धर्मपत्नी सुरजदेवी गर्ग को समर्पित की है।

इस कृति की भूमिका दुलीचन्द वेदी साहब ने लिखी जो काव्यज्योत्सना साहित्यिक संस्था मेरठ के अध्यक्ष , वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार हैं। वे लिखते हैं विज्ञ छन्दों की बारीकियां जानते हैं। आज जब छंदमुक्त रचनाएँ लिखने का दौर है ऐसे में छंदबद्ध रचनाओं को लिखना अपनी रचनाधर्मिता से जुड़े रहना विज्ञ जी जैसे हिन्दी प्रेमी ही कर सकते हैं यह उनकी सातवीं कृति है । अब तक जितनी भी कृतियाँ उन्होंने लिखी सभी छंदबद्ध हैं। प्रस्तुत कृति में गुरु की महिमा का वर्णन है। सद्गुरु को समर्पित रचनाएँ हैं। गुरु का महत्व गुरु भक्ति आदि देखने को मिलती है।
” गुरुवर सहारा, और न दूजा आस पास। महादुख पुराना, चाहत माया मोह आस।।”
कवि के मनोभाव देखिए:-
“रजनी नीरव मन दशा, उमड़े अथक विचार। तृष्णा बादल चित्त रमे, भीतर भरे विकार।।”

विज्ञ सबसे पहले सद्गुरु को याद करते है जो भीतर के दिये को प्रज्वलित करता है । फिर परा व अपरा प्रवर्तियों के आश्रय ईश्वर को । यह काव्य संग्रह आध्यत्मिकता की पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। इसमें काव्य के विभिन्न छन्द जीवन कि समूची व्याख्या करने में समर्थ और सजग प्रतीत होते हैं। विज्ञ लिखते हैं प्रस्तुत कृति में मानव की सामाजिक चेतना के प्रति आग्रह, समाज मे व्याप्त भीषण विसंगतियां, संघर्षशील व्यक्तित्व की जटिलताएं, मानवीय मूल्यों का पतन, वासना सरिता का वेगमयी प्रवाह भारतीय संस्कृति दर्शन विचारों को विनष्ट करने की प्रवर्तियों की आहट। भारतीय दर्शन व आध्यात्मिकता श्रद्धा का आईना है।
“नीचे तल में पल रहा प्रेम भरा व्यवहार।
ऊपर सघन उड़ान में,डूबे भाव विचार।।”
विज्ञ लिखते हैं संग्रहण की प्रवृति से संतोष नहीं मिलता।
“जीवन बंधन जान मन फंसा मझधार में।
मोहिनी रूप जाल,बहा तेज दुख धार में।।”

आज का मानव धन दौलत की व्यर्थता नहीं समझ रहा है। आज पाखण्डता बढ़ी है। यह काव्य संग्रह आध्यामिकता भाव भूमि व चेतना का छन्द काव्य है जिसमें भक्त की निर्लिप्त दशा साधना गुरु भक्ति नित्य सात्विक कर्म संकल्प शक्ति आचार विचार चिंतन मनन ब्रह्म चिंतन कर्म की शुद्धता देह की भंगुरता सत्य के आग्रह का बोध जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं को क्रमिक काव्य रचनाओं में लिखा है। इस कृति में मनमोहक छन्द विधान,काव्य की भावाभिव्यक्ति काव्य की उपादेयता भारतीय दर्शन की पृष्ठभूमि को दर्शाता है।

सर्वप्रथम सोरठा छन्द इस कृति का देखिए जिसमें कहा कि आज के मनुष्य को कितने ही रोगों ने घेर रखा है जिन्हें वह अपनी आंखों से देख नहीं रहा है। उसकी आंखें उन रोगों को नहीं देख रही है। लोग टलते जाते हैं। लेकिन अपनों की आफत रहती है।
“घेर रहे अब रोग,देख रहे नैनन नहीं।
टलते जाते लोग,अपनों की आफत रही।।”
उन्होंने अपने सोरठा में लिखा अब लोगों में भाव नहीं रहा बाहर कुछ तो अंदर कुछ है। सत असत को समझाया। आज मतलब के रिश्ते हो गए है विज्ञ लिखते हैं कि ” प्रेमहीन अलगाव, रिश्ते नाते मतलब भरे।
दोष मिले हर भाव, लोभ लोग चाहत करे। “
इन सभी झंझावतों से बचने का एक ही उपाय विज्ञ जी बताते हैं कि भगवान के शरणागत हो जाओ । वे कहते हैं “मेरे चित्त तो श्याम,अरज करूँ सुनो गिरधर।
तृष्णा घिरती काम,तारो तो तरूं नटवर।।”
छप्पय छन्द में गुरु महिमा का गान किया है”कृपा गुरु की अपार, चित्त गुण नित गाने लगा। बोध हुआ अवतार भाव रस विचरने लगा।।

पदपादाकुलक चौपाई मापनी युक्त में शिल्प विधान लिखते हुए विज्ञ जी कहते हैं “नर नाविक जग तल नाथ यहाँ। गुरु पावन पग रज माथ रहा। चल साधक सतपथ साथ यहाँ। भर आँचल सत धन नाम रहा।।

गुरु के पाँवों की धूल माथे पर साधक लगाकर धन्य हो जता है। ऐसा साधक सत्य के पथ पर चलता है। वह सत्य रूपी धन को एकत्रित करता है। परमात्मा ही नाविक है जो साधक को ज्ञान रूपी नाव में बैठाकर कर जल से थल पर लाने का कार्य करते हैं। विज्ञ जी ने चौपाई लिखी जिसमे सुख दुख धर्म कर्म माया मोह मन के विकारों जैसे विषयों पर आधारित बात कही है
वे लिखते हैं “लालच विकार भरती गागर, कहीं नहीं दिखता रस सागर।
मात-पिता से नफरत आफत, घरवाली में रहती चाहत।।”

आज यही हो रहा है पत्नी आई। सास ससुर को आश्रम भेज दो बुजुर्गों की अब परिवार में जरूरत नहीं। बेटा भी पत्नी की बातों में सहमति दे देता है। बेटा बेटी में अंतर, माया मद आदि विषयों पर विज्ञ जी ने लिखी चौपाइयाँ।
“कन्या ब्याह बाप दुख जागे, लालच डूबा वर धन मांगे।
लोभ राग की माया नगरी, नारी का जीवन दुख गगरी।।”

नारी का जीवन हमेशा दुखी ही रहता है । आज विवाह में वर पक्ष वाले बेटी वाले से दहेज मांगते हैं ऐसी प्रथाओं का अंत होना जरूरी है। जीवन के ऐसे सभी संकटों में घिरे होने पर सतगुरु के चरणों की वन्दना करनी चाहिए ” सतगुरु साहिब दाता मेरे, संकट काटो फँसा घनेरे । और नहीं है कोई जग में, करे दया मिटे कष्ट पल में।।” पुनीत छन्द में विज्ञ कवि दुष्यंत को याद करते हुए कहते हैं” दुष्यंत है स्मृति भण्डार, भोपाल नगर का विस्तार।
अनुपम पाया चेतन सार, माँ कुष्मांडा छाया प्यार।।”
राम नाम ही नौका है जिसमें बैठकर भवसागर पार कर सकते हैं। सतगुरु उस नौका को चलाने वाले हैं। वे ही पार उतारेंगे।
“राम नाम सुन्दर है नाव। गहरी खाई घायल भाव।सतगुरु मेरे भरते चाव। चल दी सागर बैठे नाव।।”

चंचरी छन्द में लिखते हैं “चाहत केवल मन की, रखो सभी के सुख की। करो वही जो चित्त में,भला करो जग में। मनुष्य तन मिला है इसमें भलाई करो। दूसरों को सुख मिले ऐसे काम करो सीख देती यह रचना अच्छी लगी। मकरन्द छन्द, में कवि ने सतगुरु के सुमिरण की विधि बताई है। राजहँसी छन्द में विज्ञ लिखते हैं “तरल है वही प्राण से भरा। सरल है वही काम मे खरा।। नमन से घनी आस है सुनो। मनन में भरा सार है गुनो।।” मनन चिंतन करना चाहिए यही सार है।

लयग्राही छन्द, सिंहनाद छन्द आदि भी प्रमुख है। रुक्मवती छन्द में कवि कहते हैं” मेरे नाथ सहारा,माया कारण कारा। तोड़ो ये भव बाधा, जोड़ो ये मन साधा।।”
ईश्वर ही हम सबका सहारा है और माया बंधन है कारा है। ये कारा यदि कोई तोड़े तो वह है ईश्वर। मन जब नियंत्रित हो जाता है तो परमात्मा भी अनुकूल हो जाया करते हैं। सुखेलक छन्द में बताया कि परम् प्रभु के पास कैसे जायें ” तन मन नेह चरण धाम जाइये।सतगुरु नेह में असल सार पाइये।
भजन भावना,अलख चाह पालिये।।

महामोहकारी छन्द, शालिनी छन्द,गजपति छन्द, रतिलीला छन्द, रसाल छन्द, मोटनक छन्द, हीर छन्द, सुलेखक छन्द, शीन छन्द, आख्यानिकी छन्द, ब्रह्तय छन्द, वर्ष छन्द, पावन छन्द, चंचल छन्द, रमेश छन्द, पंडव छन्द, गजपति छन्द की रचनाएं भी महत्वपूर्ण हैं। ब्रह्मरूपक छन्द में कवि कहते हैं “मानवी बता रहा भरा नवीन बोध काज। काम का रहा नहीं कभी असीम ज्ञान राज।। भावना जली नहीं तपा रहा विज्ञान बोध। नाम से सदा दया गुरु मिटा अपार क्रोध। कवि क्रोध के शमन के लिए सतगुरु से याचना कर रहा है।

घनश्याम छन्द पत्रिका, सुदर्शन छन्द की काव्य रचनाएँ सुन्दर है। रजन छन्द की रचना देखिए “हे सतगुरु चित्त, पावन चितवन पावन गुरुवर हे अवतारी। भावना बसा रस, आप जन्म दिन सागर सरगम हे जगतारी।।”
पवित्र चित्त वालों को ही सतगुरु दर्शन देते हैं। रसना छन्द, प्रतिभा छन्द, रमनीयक छन्द, ब्रह्मरूपक छन्द, पवन छन्द, रसाल छन्दों में विज्ञ जी ने गुरु के सानिध्य के फल बताए हैं।

कुंडलियाँ छन्दों में विज्ञ जी ने 76 के लगभग कुंडलियाँ लिखी जिनमे जीवन की सच्चाई जाहिर की है।वे लिखते हैं:-
“कचरा सारा बह गया प्रेम भरी बरसात। विरह रैन घटना घटी दोष गुण घुल जात। दोष गुण घुल जात भावना छायी आंधी। लोभ मोह तल घात अनोखी आशा बांधी। नेह मिटा अवसाद विमल तन होता बदरा। मिला गुरु परशाद भवों का जरता कचरा।।

सतगुरु प्रेम से मिलते हैं। जब प्रेम रूपी बरसात होती है तो कचरा सारा बह जाता है मनुष्य की विजातीय प्रवर्तियों का अंत हो जाता है व्यक्ति के दोष खत्म हो जाते हैं। अवसाद हट जाते हैं तन मन निर्मल हो जाता है। तब गुरु रूपी प्रसाद मिलता है। भूमिसुता छन्द ,मालिनी छन्द, मतगयंद सवैया, वल्लकी छन्द, बरवै छन्द, रोला छन्द आदि भी इस कृति के प्राण है।
“चलो करें एक काम नेह दीप हम जलायें।
मानव हो दुख पार, राम नाम धुन जगायें।।”
प्रेम से सभी मिलकर रहने का संदेश देता कवि। इस कृति में महाभुजंग प्रयात सवैया, मानिनी सवैया, अरविंद सवैया, अरसात सवैया, सुन्दरी सवैया, वाम सवैया, मुक्तहरा सवैया, गंगोदक सवैया, किरीट सवैया, द्रुत विलम्बित छन्द , दुर्मिल सवैया, सुमुखी सवैया, मतगयंद सवैया, मदिरा सवैया में विज्ञ जी ने विपुल सृजन किया।
इस कृति की मुझे जो रचना अधिक पसन्द आई वह देखिए:-
” प्रेम चहे उजियास बड़प्पन अम्बर तेज भरे चित साधिका
सत्य वचन जब नेह बढ़े मन मन्दिर दीप जले तन नायिका। मोक्ष कहो जब तृप्ति करे तन कंठ गिरा प्रभु प्रीति निहारिका नेह लगे घनश्याम पुकारत नैन निहाल लखे जब राधिका।।”

कृति के प्रकाशक हेमन्त शर्मा जी निदेशक उत्कर्ष प्रकाशन दिल्ली लिखते हैं विद्वान कवि एवम साहित्यकार विज्ञ की यह कृति नवोदित काव्यप्रेमियों के लिए सीख का स्रोत बनेगी। वहीं एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करेगी। यथार्थ में आज ऐसी कृतियों की नए कवि कवयित्रियों को बहुत आवश्यकता है जो कुछ सीखना चाहते हैं जो साहित्य जगत में कालजयी रचना लिखना चाहते हैं। मेरी ओर से आदरणीय छंगनलाल गर्ग विज्ञ जी को आत्मिक बधाई व मंगलमय शुभकामनाएं । आपकी यह कृति युगों युगों तक साहित्य जगत में चमकती रहे। करोड़ो काव्यप्रेमियों का मार्गदर्शन करती रहे। देश विदेश के हिंदी प्रेमी एक बार इस कृति को मनोयोग से अवश्य पढ़ें। आध्यात्मिक कृति कर रूप में यह कृतिअपनी पहचान बनाएगी इसी विश्वास के साथ पुनः बधाई ।

राजेश कुमार शर्मा ‘पुरोहित’
समीक्षक, कवि, साहित्यकार
98, पुरोहित कुटी ,श्रीराम कॉलोनी
भवानीमंडी, जिला-झालावाड़, राजस्थान पिन-326502

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