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अप्रत्याशित जनादेश ने ढहाये जातीय क़िले

भाजपा की प्रचंड जीत के पीछे आरएसएस का विशाल संगठन और सांस्कृतिक युद्ध भी महत्वपूर्ण है

सुधान्शु बाजपेयी- वरिष्ठ छात्रनेता लखनऊ विश्व विद्यालय (स्वतंत्र पत्रकार के रूप में लेखनकार्य)


उप्र में भाजपा को अप्रत्याशित जनादेश चौंकाने वाला है, परंतु विधानसभा के परिणामों में लोकसभा के नतीजों की अनदेखी भी छिपी है। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने गैरयादव-गैरजाटव मुस्लिम विरोध के सू़त्र को अपनाया और लोकसभा की 73 सीटें लेकर आयी, लेकिन सपा और बसपा ने इसे एकमात्र संयोग या मोदी का जादू मान इन नतीजों की अनदेखी की । बहनजी जहां दलित वोटों को अपना एकाधिकार समझती रहीं , वहीं अखिलेश अपने काम और मोदी शैली में प्रचार से मोदी को परास्त करने का मंसूबा पालते रहे, जबकि भाजपा लगातार इनकी जमीन खोखली करती रही।

हार का पहला बड़ा कारण यह है कि सपा बसपा , केवल सामाजिक न्याय का ढोल पीटती रहीं, परंतु अपने दलों में भी सही मायनों में सामाजिक न्याय लागू नहीं किया। दोनों ही दलों में नेतृत्व की जाति विशेष का ही वर्चस्व बना रहा, सरकार आने पर इन जातियों के लोगों को मनमानी करने, कानून हाथ में लेनें की खुली छूट रहती,नौकरियों में भी पूरे समुदाय-वर्ग को प्रतिनिधित्व देने के बजाय जाति विशेष का ही बोलबाला रहता, जिससे इनके अपने ही वर्गों में लोग असंतुष्ट रहने लगे, बीजेपी ने इस अन्तर्विरोध को पकड़ा, हर जाति के प्रकोष्ठ बनाए , सांगठनिक राजनीति में पहचान और प्रतिनिधित्व दिया और भाजपा अपनी रणनीति में कामयाब हुयी। देखा जाये तो यह सामाजिक न्याय की जीत है परंतु उसके ठेकेदारों की हार है। दूसरा बड़ा कारण मुस्लिम विरोधी माहौल है, जो एक दिन का काम नहीं है, आरएसएस ने पिछले 90 सालों में देश में धीरे धीरे मुस्लिमों के खिलाफ घृणा और दुराग्रहों को काॅमनसेंस के रूप में स्थापित करनें में कामयाब रहा,जिसके कभी कोई वैचारिक प्रतिवाद का इतिहास सपा बसपा का नहीं रहा बल्कि इस प्रचार के सहभागी ही इनके कैडर-समर्थक रहे,ऐसे में स्वाभाविक ही इनके समर्थकों को मुस्लिमों के खिलाफ अपने पालें में जानें में भाजपा सफल रही । तीसरा कारण सैद्धांतिक ज्यादा है, सपा बसपा ने अस्मिता की राजनीति के आक्रामक नारों के साथ सोशल इंजीनियरिंग कर कांग्रेस और थोड़ी बहुत लेफ्ट की जमीन को तोड़ दो दशक तक राज किया, भाजपा ने अब उसी सोशल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल कर उससे बड़ी हिन्दू अस्मिता के आक्रामक नारों के साथ उसको उसी के हथियार से मात दे दी। जाति रहेगी तो हिन्दुत्व भी रहेगा, जाति मजबूत होगी तो हिन्दुत्व मजबूत होगा । बाबा साहेब ने कहा- जाति तोड़ो, इन दलों ने बाबा साहेब की फोटो दिखाकर कहा जाति जोड़ो, तो भाजपा ने भी फोटो दिखाकर समझा दिया कि हिन्दुत्व पर संकट है, बाबा साहेब ने भी मुस्लिमों और पाकिस्तान को ही देशका दुश्मन कहा था, इसलिये हिन्दुत्व की छतरी के नीचे गोलबंद हो जाओ। आपने कहा कि जाति पर गर्व करो, उन्होनें कहा कि धर्म पर गर्व करो। कुलमिलाकर यूँ कहा जाये कि जाति की लघु अस्मिता को सम्प्रदाय या धर्म की विराट अस्मिता ने उदरस्थ कर लिया।

हो सकता है कि बिहार की तर्ज पर सपा-बसपा एक होकर जातीय गोलबंदी को एक हद तक अपने पक्ष में करके भाजपा को चुनौती दे भी दें , फिर भी यह चुनौती यूपी हो या बिहार लंबे समय तक नहीं चलने वाली, क्योंकि भाजपा की इन प्रचंड जीत के पीछे आरएसएस का विशालकाय संगठन और सांस्कृतिक युद्ध भी महत्वपूर्ण है, जिसका विकल्प फिलहाल इन अस्मितावादी दलों के पास नहीं दिखता। जब हम आरएसएस को एक सांस्कृतिक संगठन और उसके साम्प्रदायिक अभियान को सांस्कृतिक युद्ध कह रहे हैं तो यह बात स्पष्ट तौर पर निहित है, उससे युद्ध के लिए भी हर घर तक पहुंच रखने वाला सक्रिय संगठन हो और उसके पास वैकल्पिक राजनैतिक सांस्कृतिक विचार हो। आरएसएस को चैलेंज करने वाली फिलवक्त दो ही विचारधाराएं हैं और दोनों ही कैडर आधारित राजनीति पर जोर देती हैं और इन दोनों की एकता की जरूरत है न कि झण्डों की, बल्कि इन विचारों को मानने वाली संघर्षशील जनता की। आशा करते हैं कि दमन के खिलाफ जनता के संघर्षों के बीच से रूढिबद्ध हो चुकी वाम-अंबेडकर राजनीति को नयी दिशा देने के लिये युवा नेतृत्व निकलेगा।