चाह, साहस और अनुभव

December 13, 2018 0

आकांक्षा मिश्रा- यह हर्ष का मौसम है सुनकर तुम्हें अजीब लगेगा मौसम तो आते हैं और जाते हैं लेकिन हम रहते है मौसम में ही एक लंबे अंतराल के बाद तुम्हें देखती हूं तो लगता […]

माँ ही मेरी जिंदगी और माँ से ही मेरी पहचान है

December 3, 2018 0

शिवांकित तिवारी, युवा कवि,लेखक एवं प्रेरक, सतना (म.प्र.) माँ शब्द मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा गुमान है, माँ ही मेरी जिंदगी और माँ से ही मेरी पहचान है। अंधेरों से उजालों तक के इस सफर में, […]

कविता-  मतदान

November 30, 2018 0

जयति जैन ‘नूतन’ मतदान करने जा तो रहे हो पर इतना ध्यान धरना । साम दाम दंड भेद काम है शैतान का बस इससे ही तुम बचना । सौ सही मगर चार गलत हों काम […]

मन का महाभारत

November 25, 2018 0

कवि राजेश पुरोहित काम क्रोध लोभ मोह के शत्रु। रात दिन महाभारत है करते।। मन के रणक्षेत्र के ये महारथी। कभी किसी से कम न पड़ते।। अपने अपने बाहुबल दिखाते। एक दूजे से झगड़ते- लड़ते।। […]

चक्रधरपुर के किसनलाल अग्रवाल की पुस्तक “मुस्कराना याद है” का लोकार्पण दिल्ली में

November 18, 2018 0

भवानीमंडी :- हिंदी के विकास और नए नए साहित्यकारों को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से गठित साहित्य संगम संस्थान, दिल्ली द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन, अमीर खुसरो सभागार, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी, मेट्रो गेट नंबर […]

मत समझ श्रान्त हूँ

November 18, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल…✍ (प्रयागराज) शब्द हूँ ;शान्त हूँ; मत समझ श्रान्त हूँ। वर्ण  के  भेद  से  वाक्य में क्लान्त हूँ।। वो  तो  श्रृंगार  से  थी  मोहब्बत मुझे; ओज धारण करूँ या नहीं; भ्रान्त  हूँ। थोड़ी बदली […]

ईश्वर आपस में नहीं झगड़ते इंसानों को मत लड़वाओ तुम

November 16, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल…✍ (प्रयागराज) ०९६७००१००१७ ईश्वर आपस में नहीं झगड़ते इंसानों को मत लड़वाओ तुम। मन्दिर-मसज़िद बहुत हुआ अब  बनवाओ रुग्णालय तुम।। असमय कलियाँ मुरझा जातीं, बिखरे    शूलों   के   भय  से। विदुर-नीति  भी  शरमा जातीं, कपटी  […]

ऐसी दिवाली बनाओ तुम

November 16, 2018 0

राग द्वेष लालच को हटाकर, अहंंकार को जड़ से मिटाकर, नई उमंग से उजियाला लाओ तुम। चहूँ दिशा में फैला है घनघोर अंधेरा, अब ले भी आओ नया सवेरा, जगमग मन के दीप जलाओ तुम […]

एक गीत चलते-चलते : अपमानों के गरल, कण्ठ कितना सहते ?

November 13, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद से प्रयागराज) बेमतलब के रिश्तों सङ्ग कितना  रहते? अपमानों के गरल कण्ठ कितना सहते? सबने है मुझको बेग़ैरत-सा समझा; मैं ही था जो रिश्तों में था बैठा उलझा। बिन समझे मुझको उलझन […]

पुस्तक समीक्षा कृति :-राष्ट्रभाषा और समाज

November 11, 2018 0

लेखिका:-जयति जैन “नूतन” प्रकाशक:-अन्तरा शब्द शक्ति प्रकाशन इंदौर, मध्यप्रदेश (मातृभाषा उन्नयन संस्थान के सौजन्य से प्रकाशित) पृष्ठ:-32 मूल्य:-55/- समीक्षक:-राजेश कुमार शर्मा “पुरोहित” देश की युवा लेखिका व सामाजिक चिंतक जयति जैन”नूतन” की प्रस्तुत करती राष्ट्र […]

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