कूड़े वाला आदमी

February 23, 2018 0

 प्रभाँशु कुमार- वह आदमी निराश नही है अपनी जिन्दगी से जो सड़क के किनारे लगे कूड़े को उठाता हुआ अपनी प्यासी आँखो से कुछ ढूंढ़ता हुआ फिर सड़क पर चलते हंसते खिलखिलाते धूल उड़ाते लोगों […]

एक भोजपुरी शोक-गीत

February 20, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय इसके पहले कि आप इस शोक-प्रधान भोजपुरी गीत को पढ़ें , समझें तथा अनुभव करें, आपकी सुविधा के लिए इसकी पृष्ठभूमि का एक शब्द-चित्र प्रस्तुत है :——– एक पिता का शव धरती […]

दुनिया से जाने के बाद

February 19, 2018 0

प्रभांशु कुमार, इलाहाबाद     दुनिया से जाने के बाद रह जाना चाहता हूं दीवार पर टंग जाने के बजाए किसी के लिए किसी अच्छे दिन की अविस्मरणीय स्मृति बनकर रह जाना चाहता हूं धरती की […]

जीता-जागता भारत हूँ

February 18, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) मञ्चों   से  नित   गीता  गाता, औ पढ़ता क़ुरान की आयत हूँ। विविध  धर्म औ  भाषाओं  संग, मैं वो जीता – जागता  भारत हूँ। सुबह   सवेरे    भरता    अज़ान, औ   पूजता   नित   ऐरावत  हूँ। […]

सदा वचन की धनी रहे

February 18, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) कविते! तेरे तरकश में, मेरी भी वाणी बनी रहे। उदात्त भाव से नित मेरी, मधुर  रागिनी  ठनी रहे। कर्कश न हो शब्द कभी, नित प्रेमभाव से सनी रहे। रिश्तों की हो नित […]

गर्लफ्रेंडन में नथइले तहार बबुआ

February 16, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- रात-दिन उधियइले तहार बबुआ, करेजवा जरवइले तहार बबुआ। ना बुझाला सुझाला ऊ बौका के अब अन्दाजा गरई पकड़े तहार बबुआ। खेत-खरिहान बेचले जेवरवो के ऊ, धूरि आँखी में झोंकले तहार बबुआ। गाँव-नगरी […]

धन्यवाद उस भगवान का जो आप जैसा पिता मिला

February 15, 2018 0

उपासना पाण्डेय ‘आकांक्षा’, हरदोई (उत्तर प्रदेश) मेरा क्या अस्तित्व होता , अगर आप जैसा पिता मुझे न मिलता, हर ज़िद को पूरा किया, हर पल मेरी खुशियों का ख्याल रखा । आप परेशान होते हो, […]

वैलेण्टाइनोत्सव पर सटीक व्यंग्यात्मक प्रस्तुति : काहेक सोचु करै…

February 15, 2018 0

अवधेश कुमार शुक्ला (प्र. अ. जू. हा. कामीपुर) बबूल के वृक्ष पर पीली- पीली रेखावत, लटकती, झूलती, कुछ गुच्छिल, कुछ स्वतन्त्र लटकनों को देखा । देखने में आकर्षक, आलिंगन को उसी तरह मचलती लगीं, जिस […]

वक़्त ने चाल चल दी है

February 15, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेपर्द: की बात करने लगे, बातों को वे कतरने लगे। ख़ुद को तूफ़ाँ समझते थे, बुलबुला से भी डरने लगे। वक़्त ने चाल चल दी है, हर गोटी को परखने लगे। देखते […]

मन सहकल बनि गइली तहार बबुनी

February 14, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सब केहू से अझुरइली तहार बबुनी, घर-अँगना भहरइली तहार बबुनी। मांग पोछाते उ नवका संंघतिया धइली, मुँह करिखा लगइली तहार बबुनी। अइसन कइली पढ़इया सहरिया में ऊ, बावन भतरी कहइली तहार बबुनी। […]

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