व्यंग्य भोजपुरी भाषा में : अब काँहें पिपरा ता, झँख!

November 19, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ”अच्छे दिन आयेंगे-अच्छे आयेंगे”—- इहे सुनाई-सुनाई के, देखाइ-देखाइ के उ तहरा के भरमवले रहे आ तब तहरा के हमार बतिया न नू बुझात रहे; तब त कनवाँ में ठेपी लगाइ के ‘नमो-नमो’ […]

गधा-हड़ताल ज़िन्दाबाद!

October 3, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- गधे बेचारे सोच रहे हैं, हम तो ‘गधे-के-गधे’ रहे और जो हमसे रात-दिन प्रेरणा लेता रहा, वह तो ‘शातिर’ निकला। ऐसे में, गधों की मण्डलीे ‘जन्तर-मन्तर’ में आगामी १५ अक्तूबर को रविवार […]

हो जाऊँ मालामाल

September 22, 2017 0

राघवेन्द्र कुमार राघव- मिल जाए हमको माल किसी का, मैं हो जाऊँ मालामाल । चाहे हो वो चोरी का, या दे दे वो ससुराल । कण्डीशन लग जाए कोई, चाहें जो हो हाल । मिल […]

बुढ़ापा : एक मार्मिक अहसास

September 15, 2017 0

राघवेन्द्र कुमार राघव- अंगों में भरी शिथिलता नज़र कमज़ोर हो गयी । देह को कसा झुर्रियों ने बालों की स्याह गयी । ख़ून भी पानी बनकर दूर तक बहने लगा । जीवन का यह छोर […]

साहित्याकाश में पसरता औसतपन

August 18, 2017 0

अविनाश मिश्र (प्रतिभाशाली युवा समालोचक)- एक पटाखा रॉकेट था जो कुछ ऊपर तक गया और उसने कुछ रोशनी फैलाई. अब अंधकार पूर्ववत है और मैं इस अंधकार से कुछ बोल रहा हूं. इस अंधकार में […]

लघु कथा- पार्क की घुमक्कड़ी

July 27, 2017 0

 अभिरंजन शर्मा (बिहार)- वो दोनों बेफिक्र हो कर पार्क में घूमते थे। हाल-ए-दिल बयां करते थे। वे हर दिन मिलते थे। बिना किसी डर-भय के। बगल में पुलिस थाना भी था। समाज की हर बंदिशों […]

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