कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

खिल उठा देख कुमुद का यौवन

June 10, 2017 0

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी- चाँदनी रात, महकता चंदन । खिल उठा देख कुमुद का यौवन। * हवा मे रात की रानी महकी दूर महका कोई सघन उपवन । * गर तेरे रूप की फुहार पड़े […]

बहुत भड़का चराग़-ए-इश्क़ बुझाए जाने से पहले

June 8, 2017 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ लखनऊ – बहुत भड़का चराग़-ए-इश्क़ बुझाए जाने से पहले | ग़ज़ब के हर्फ़ लिख डाले मिटाए जाने से पहले || सम्हाले दिल को रखना तुम कहीं ये टूट न जाए | […]

वो दिन भी थे ज़माना जब हमारी बात करता था

June 6, 2017 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ- सुहाने पल न जाने क्यूँ ख़्यालों में नहीं आते | अन्धेरों में हैं खोए सब उजालों में नहीं आते || नहीं बुझती प्यास मेरी बहुत ज़्यादा मैं प्यासा हूँ | […]

दिल ने तुमको बुलाया है चले आओ मुझे लेने

June 4, 2017 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ –   बहुत तुमने सताया है चले आओ मुझे लेने | बहुत तुमने रुलाया है चले आओ मुझे लेने ||    नहीं जी पाएंगे तुम बिन बहुत तुम याद आते […]

इन गुलाबों से ख़ुद को सजा लीजिए

June 3, 2017 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ- जाँ मेरी छोड़ मुझको अगर जाएगी | ज़िन्दगी टूट कर के बिखर जाएगी || इन गुलाबों से ख़ुद को सजा लीजिए | कुछ तो इनकी भी लाली निखर जाएगी || […]

तेरा नाम ले के डूबे, दीवानगी पे रोए

June 1, 2017 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ- पल-पल जो बढ़ रही है उस तिश्नगी पे रोए | ग़म-ए-ज़िन्दगी से ज़्यादा ग़म-ए-आशिक़ी पे रोए || मेरा राब्ता नहीं अब कुछ तुझसे रह गया है | रग-रग में फिर […]

तुम्हें अब ‘जान’ कह कहकर बुलाने कौन आएगा

May 31, 2017 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ- ज़रा सोचो अधूरे ख़्वाब सजाने कौन आएगा | अगर रूठी तो अब तुमको मनाने कौन आएगा || सोचा मिलता चलूँ तुमसे कहीं मैं जा रहा था और | बहाने कर […]

क्यों मिली थी हमें फिर सजा देर तक

May 29, 2017 0

भावना दीपक मेहरा (कमला नगर, आगरा)- हम न समझा सके क्या हुआ देर तक औ तमाशा वहां पर लगा देर तक । की नहीं हमने कोई खता थी मगर क्यों मिली थी हमें फिर सजा […]

ग़ज़ल- मुहब्बत में असर होता तो ये हालात न होते

May 29, 2017 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ (लखनऊ)  सज़ाएं काट लूँगा मैं तुम्हारा नाम न लूँगा | कभी भी अब ज़माने में प्यार से काम न लूँगा || मुहब्बत में असर होता तो ये हालात न होते | […]

कुत्ते को गाय बनाना, बात कठिन

May 29, 2017 0

डा. दिवाकर दत्त त्रिपाठी (चिकित्सक/युवा साहित्यकार)- बंदर को आइना दिखाना , बात कठिन । मूरख को सच भी समझाना, बात कठिन। . साबुन से नहला दो ,ये कर सकते हो ! पर कुत्ते को गाय […]

कविता : वेदना

May 29, 2017 0

  आदित्य त्रिपाठी “यादवेन्द्र” भला कब कौन समझा है भला कब कौन समझेगा. ह्रदय की वेदना तेरे सिवा अब कौन समझेगा । मैं तुझको आजमा लेता मगर क्या आजमाऊँगा, तुम्हारे प्यार से दीपित दिए दिल […]

तुम्हारे साथ बीते पल मुझे बस याद रह जाएं

May 28, 2017 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ (लखनऊ) –        तुम्हारे दिल में मेरे कुछ छिपे जज़्बात रह जाएं | मुझे तुम छोड़ न पाओ ऐसे हालात रह जाएं || मैं सब कुछ भूल भी जाऊँ मुझे […]

ख़ुद ही ख़ुद का क़ैदी हूँ मैं ख़ुद ही ख़ुद का ज़िन्दान हूँ मैं

May 27, 2017 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ (लखनऊ) मुझको नहीं मालूम है कैसे तेरे अन्दर ज़िन्दा हूँ मैं | तेरे दिल की क़ैद में रोता टूटा एक परिन्दा हूँ मैं || सारे जहाँ की ख़ुशियों को मैं ठोकर […]

मेरी ग़ज़लों में तेरा ज़िक्र बस यूँ ही नहीं होता

May 26, 2017 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ (लखनऊ) बहारें चल कर आएंगी तेरा दामन सजाने को | मैं फिर से लौट आऊँगा तेरी दुनिया बसाने को || तुझे मिलने की ख़ातिर ग़र क़यामत का सफ़र ही है | […]

लघु कहानी – स्टेशनरी

May 25, 2017 0

योगेश समदर्शी (साहित्यकार, दिल्ली)- एक अदद तख्ता घर में पड़ा मिल गया. जिसकी चौड़ाई रही होगी लगभग एक फिट और लम्बाई दो फिट. भुल्लन ने उसे उठाया और सीधे पहुंच गया बेगराज खाती के पास. […]

गीत : विष आलिंगन में खुश रहना, यह मैंने चंदन से सीखा

May 2, 2017 0

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी- सोने जैसा खरा नही हूँ । पर इतना भी बुरा नही हूँ । मुद्दों को मत मीत बनाओ , मत राई को मेरु बनाओ। मेरे घाव बहुत दुखते हैं, मत खंजर […]

रंगे सियारों से सारी उम्मीदें बेमानी हैं

April 28, 2017 0

राघवेन्द्र कुमार “राघव” राजनीति के रंगे सियारों से सारी उम्मीदें बेमानी हैं, सत्ता लोलुपता के कारण मर गया आँख का पानी है । भीतर विद्रोही मार रहे बाहर आतंकी काट रहे, लेकिन हम हैं बेशर्म […]

मैं सुन रहा हूँ आर्तनाद विधवाओं का

April 24, 2017 0

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी ऐ मेरी देश की बहरी सरकार ! भला कब तक तू निंदा का राग यूँ अलापेगी? क्लीव हो चुके हैं देश के चालक सभी, दिल्ली की सोई हुई सत्ता कब जागेगी? […]

वह तुम थे या नियति का परिहास कोई

April 21, 2017 0

कृष्ण प्रिया- क्या लौट आई थी प्रतिध्वनि मेरी! स्वर न हो सका शंखनाद! उस दिन ख्वाबों के घाट तुम ही तो चले आए थे न श्याम मेरी आंखों में अविश्वास घनेरे थे कैसे करती विश्वास […]

एक अतुकांत कविता- मेस वाला लड़का

April 18, 2017 0

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी-  वो मेस वाला लड़का , जो खाना लेकर आता है। मेरे मन में वो ढेरो सवाल छोड़ जाता है । अभी उमर उसकी क्या होगी? दस ,बारह या तेरह , यही […]

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