संजय सिंह, सांसद, आप ने पेयजल एवं स्वच्छता मिशन पर उठाए सवाल! | IV24 News | Lucknow

एक गीत होरी का गोदान

February 15, 2017 0

 दिवाकर दत्त त्रिपाठी- होरी का गोदान कभी क्या हो पायेगा ? पाँच पाँच करके हैं बीते साल कई । चोर उचक्के हुयें हैं मालामाल कई । खादी पहन के कइयों देश को लूट रहे खादी […]

अपने पुरखो का लेकर आशीर्वाद चलता हूँ

February 14, 2017 0

पिण्टू कुमार पाल- कौन कहता है कि मैं खाली हाथ चलता हूँ । हाथ में कलम लिए तलवार की धार चलता हूँ । अपने पुरखो का लेकर आशीर्वाद चलता हूँ । झुक गए जिस के […]

ऊँची उड़ान

February 14, 2017 0

पिण्टू कुमार पाल- आसमां भी आपका, जमी भी आपकी, हौसला भी आपका, उड़ान भी आपकी, उड़ो तो आसमान की ऊँचाई नाप दो, गिरो तो समंदर की गहराई नाप दो. भरो तुम बहुत ऊँची उड़ान, पर […]

अधूरा प्रेम

February 13, 2017 0

पिण्टू कुमार पाल- मैं गाता हूँ और वो सुनती है, प्यार के ताने बाने बुनती है । काश होता ये काश होता ये, सोच कर खुश वो होती है । हो गए हैं अब दोनों […]

गीत- कलम-कबूतर

February 13, 2017 0

राश दादा राश, बंगालुरू ये कलम है मेरी शोख ए अदा कबूतर बनकर उड जाती । हर छत पर जा दाना लाती कभी रात अंधेरे खो जाती ।  कभी गुटुर गुटुर करती चलती कभी बडे […]

गजल : प्रेम की जानकी का हरण हो गया

February 13, 2017 0

दिवाकर दत्त त्रिपाठी- शुष्क मरुभूमि अंतःकरण हो गया । दर्द का देख फिर अवतरण हो गया । भावना का जटायू हताहत हुआ, प्रेम की जानकी का हरण हो गया । कुछ नये पंथ थे ,पर […]

प्रेम में डूबी दर्द से भरी एक दास्ताँ

February 13, 2017 0

डॉ. आकांक्षा मिश्रा, बस्ती (उ. प्र.) प्रेम में डूबकर जख्म खाई लड़कियाँ आखिर हार जाती हैं ..। जीवन का हर दाँव , संवरने से पहले ही बिखर जाती हैं ..। जीवन से भी ; मंजिल […]

निराश क्यों ?

February 12, 2017 0

आकांक्षा मिश्रा बस्ती उत्तर -प्रदेश-  हे मनुष्य !! तुम कभी विफल नहीं हुए फिर अकारण निराश क्यों ? कल्पना के अधीन होकर स्थिरता का कैसा विस्तारण हो रहा हे मनुष्य !!! प्रकृति का स्पर्श ही […]

कविता : भारतवासी

February 11, 2017 0

राघवेन्द्र कुमार“राघव”- जो भारत माँ को माँ न माने, वह कैसे भारतवासी हैं ? जो मातृभूमि को ना पूजें, द्रोही हैं कुल नाशी हैं । जिसके आँचल का जल नस में, बनकर लहू दौड़ता है […]

बयाँदारी हमारी

February 10, 2017 0

राश दादा राश (बंगालुरू)- कायस्थ* हूँ कागजी कारोबार है मेरा स्याही से रिश्ता और कलम यार है मेरा नब्ज ना टटोलना यारों ,मेरे जिस्म का मयखाने की बस्तियां शराबी टोलियाँ मेरे धमनियों मे प्रवाहित रक्त […]

हंसी कभी धूमिल नहीं होती

February 10, 2017 0

आकांक्षा मिश्रा (बस्ती)- सब गलियाँ सुनसान हैं खनकती आवाजें भी ख़ामोश हैं बचपन कमरों में कैद हुआ स्वयं के जीवन का बोध करता हुआ अपनी माँ के प्रेम से दूर हैं गलियों में अंधेरा घना जीवन […]

कविता : प्रेम की अनुभूति

February 8, 2017 0

आकांक्षा मिश्रा, बस्ती- प्रेम की बारिश में ख्वाहिशों का समन्दर शब्दों के बन्धनों में बंधे हुए अब यही प्रेम मेरा समीकरण है जहां मेरा प्रेम ही मुझसे लिखवाता हैं तुम कहते हो कि प्रेम नहीं अभी […]

कविता : मृगमरीचिका

February 5, 2017 0

राश दादा राश (दार्शनिक/साहित्यकार)- जमीं से उठता वो ;जो आसमाँ नजर आता है ये सही नहीं वो आशियाँ बनाता है बलुआई रेत के संशय सुखद लुभाए ,, ,, मृगमरीचिका जो टूटे धैर्य का बन्धन करूँ […]

कविता – स्त्री

February 3, 2017 0

डॉ. आकांक्षा मिश्रा-   एक स्त्री आधी से ज्यादा दूरी अकेले तय करती हैं , तुम्हारे सारे अधिकारों को कर्तव्य मानकर सफर जारी करती हुई तुम्हें मुक्त कर देती हैं मुड़कर मत देखो , अधूरी रहेगी […]

नोटा है भई नोटा है

January 11, 2017 0

शशांक कृष्ण मिश्रा- देश का बेड़ा ग़र्क कर दिया राजनीती के, आकाओ ने भृष्टाचाऱ से लतपत होकर राज किया है नेताओ ने पांच साल में वोट की खातिर एक बार ये आते है वोट की […]

देश के युवा साथियों के नाम एक कविता

January 4, 2017 0

सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ –लखनऊ-हरदोई राजमार्ग, टावर प्लाट, सुन्नी, हरदोई (उ॰प्र॰) युवा साथियों जोश मे आओ, अपने देश की शान को | विश्व गुरु भारत भूमि के, मिलके बढ़ाओ मान को || केवल अपने तक सीमित रहना, […]

खतरे का जंगल

December 18, 2016 0

12 वर्ष के संतोष मौर्या के द्वारा गढ़ी गयी कहानी- नोट- संतोष मौर्या कक्षा 8 में पढ़ते हैं, लेकिन उनकी कहानी से उनके भीतर एक अनजाने से डर के पलने की कसक महसूस होती है। […]

मानव समाज में केवल दो वर्ग

December 16, 2016 0

राम सिंह प्रेमी (वरिष्ठ कवि – कुरसठ, हरदोई)- दो ही पहलू हैं समाज में ,एक उजेरा एक अंधेरा | दो ही वर्ग बने समाज में , एक लुटेरा एक कमेरा || कुछ रहते ए सी […]

देश बेंच के खा डाला है, नेता और दलालों ने…

December 9, 2016 0

राघवेन्द्र कुमार “राघव”-  देश बेंच के खा डाला है नेता और दलालों ने । जनता के घर डाका डाला मिलकर नमक हरामों ने । खादी टोपी बर्बादी की बनी आज परिचायक है । चोर उचक्के […]

मूक प्रेम (कहानी )

November 20, 2016 0

निशा गुप्ता, तिनसुकिया, असम आज लगभग एक साल हो गया उसको देखते हुए वह प्रति दिन प्रातः काल ठीक आठ चालीस पर उसके घर के सामने से गुजरता था कुछ देर रूकता उसे देखता फिर […]

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