कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

जीवन का अर्थ

February 21, 2017 0

निशा कुलश्रेष्ठ- सुबह सुबह का वक्त है मैं चाहती हूँ कुछ खिडकियाँ और दरवाजे खोल देना चाहती हूँ खुली हवा में साँस लेना जैसे ही खोलती हूँ अपने कमरे की एक बंद खिड़की भक्क से […]

हमारे गाँव में हमारा क्या है  !

February 20, 2017 0

अमित धर्मसिंह (बेहद सम्भावना से भरे मित्र अमित धर्म सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में शोध अध्येता हैं)– आठ बाई दस के कड़ियों वाले कमरे में पैदा हुए, खेलना सीखा तो माँ ने बताया हमारे कमरे से […]

अच्छी वस्तुओं को हेय दृष्टि से देखने की मानसिकता गलत है

February 19, 2017 0

विवेक साहू- एक समय की बात है। एक शहर में एक धनी आदमी रहता था। उसकी लंबी-चौड़ी खेती-बाड़ी थी और वह कई तरह के व्यापार करता था। बड़े विशाल क्षेत्र में उसके बगीचे फैले हुए […]

कहाँ हैं आप ?

February 18, 2017 0

आकांक्षा मिश्रा- बात कुछ अटपटा सा लगा होगा लेकिन बात शुरू हुई, कहा हैं आप ? शायद मन झल्ला गया होगा निःसन्देह दोनों ही ! आखिर ढाई शब्द के प्रश्न का उत्तर मिला क्यों ? […]

आशीर्वाद की अभिलाषा

February 18, 2017 0

सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ (लेखक/कवि, पत्रकार {हिन्दुस्तान} एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ )- गुरु पितु मातु प्रणाम तुम्हें, तुम बिन कौन हमारा है | बतियाने वाले बहुत दोस्त, संकट में कौन सहारा है || हे स्वर्ग के वासी […]

चाहे जिसको करो किन्तु मतदान जरूरी है

February 18, 2017 0

रचियता – सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ (लेखक/कवि, पत्रकार {हिन्दुस्तान} एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ ) मण्डल अध्यक्ष – ‘आल मीडिया एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन’ रचना समय 09:58 रात्रि, दिन-मंगलवार, दिनांक-24-01-17 स्थान- जनसेवा केन्द्र लखनऊ-हरदोई मार्ग, टावर प्लाट सुन्नी निकट […]

चिठ्ठियाँ तुम्हारे नाम की

February 17, 2017 0

आकांक्षा मिश्रा- तुम्हें….!! कभी-कभी चिठ्ठियाँ लिखा करुँगी । पता मेरे घर का ही होगा पढ़कर खुश तुम होना कुशल मेरे परिजन का ही होगा । सिहर जायेगा हृदय……. ये जानकर , तुम्हारे द्वार पर दिया आज […]

सोच रहा हूँ एक गीत लिखूं

February 15, 2017 0

पिण्टू कुमार पाल- सोच रहा हूंँ एक गीत लिखूं, मेरे मन का मीत लिखूं, या तेरे मन की प्रीति लिखूं, प्रकृति का सौन्दर्य लिखूं, या विधवा के मन की व्यथा लिखूं, किसान की आस लिखूं, […]

एक गीत होरी का गोदान

February 15, 2017 0

 दिवाकर दत्त त्रिपाठी- होरी का गोदान कभी क्या हो पायेगा ? पाँच पाँच करके हैं बीते साल कई । चोर उचक्के हुयें हैं मालामाल कई । खादी पहन के कइयों देश को लूट रहे खादी […]

अपने पुरखो का लेकर आशीर्वाद चलता हूँ

February 14, 2017 0

पिण्टू कुमार पाल- कौन कहता है कि मैं खाली हाथ चलता हूँ । हाथ में कलम लिए तलवार की धार चलता हूँ । अपने पुरखो का लेकर आशीर्वाद चलता हूँ । झुक गए जिस के […]

ऊँची उड़ान

February 14, 2017 0

पिण्टू कुमार पाल- आसमां भी आपका, जमी भी आपकी, हौसला भी आपका, उड़ान भी आपकी, उड़ो तो आसमान की ऊँचाई नाप दो, गिरो तो समंदर की गहराई नाप दो. भरो तुम बहुत ऊँची उड़ान, पर […]

अधूरा प्रेम

February 13, 2017 0

पिण्टू कुमार पाल- मैं गाता हूँ और वो सुनती है, प्यार के ताने बाने बुनती है । काश होता ये काश होता ये, सोच कर खुश वो होती है । हो गए हैं अब दोनों […]

गीत- कलम-कबूतर

February 13, 2017 0

राश दादा राश, बंगालुरू ये कलम है मेरी शोख ए अदा कबूतर बनकर उड जाती । हर छत पर जा दाना लाती कभी रात अंधेरे खो जाती ।  कभी गुटुर गुटुर करती चलती कभी बडे […]

गजल : प्रेम की जानकी का हरण हो गया

February 13, 2017 0

दिवाकर दत्त त्रिपाठी- शुष्क मरुभूमि अंतःकरण हो गया । दर्द का देख फिर अवतरण हो गया । भावना का जटायू हताहत हुआ, प्रेम की जानकी का हरण हो गया । कुछ नये पंथ थे ,पर […]

प्रेम में डूबी दर्द से भरी एक दास्ताँ

February 13, 2017 0

डॉ. आकांक्षा मिश्रा, बस्ती (उ. प्र.) प्रेम में डूबकर जख्म खाई लड़कियाँ आखिर हार जाती हैं ..। जीवन का हर दाँव , संवरने से पहले ही बिखर जाती हैं ..। जीवन से भी ; मंजिल […]

निराश क्यों ?

February 12, 2017 0

आकांक्षा मिश्रा बस्ती उत्तर -प्रदेश-  हे मनुष्य !! तुम कभी विफल नहीं हुए फिर अकारण निराश क्यों ? कल्पना के अधीन होकर स्थिरता का कैसा विस्तारण हो रहा हे मनुष्य !!! प्रकृति का स्पर्श ही […]

कविता : भारतवासी

February 11, 2017 0

राघवेन्द्र कुमार“राघव”- जो भारत माँ को माँ न माने, वह कैसे भारतवासी हैं ? जो मातृभूमि को ना पूजें, द्रोही हैं कुल नाशी हैं । जिसके आँचल का जल नस में, बनकर लहू दौड़ता है […]

बयाँदारी हमारी

February 10, 2017 0

राश दादा राश (बंगालुरू)- कायस्थ* हूँ कागजी कारोबार है मेरा स्याही से रिश्ता और कलम यार है मेरा नब्ज ना टटोलना यारों ,मेरे जिस्म का मयखाने की बस्तियां शराबी टोलियाँ मेरे धमनियों मे प्रवाहित रक्त […]

हंसी कभी धूमिल नहीं होती

February 10, 2017 0

आकांक्षा मिश्रा (बस्ती)- सब गलियाँ सुनसान हैं खनकती आवाजें भी ख़ामोश हैं बचपन कमरों में कैद हुआ स्वयं के जीवन का बोध करता हुआ अपनी माँ के प्रेम से दूर हैं गलियों में अंधेरा घना जीवन […]

कविता : प्रेम की अनुभूति

February 8, 2017 0

आकांक्षा मिश्रा, बस्ती- प्रेम की बारिश में ख्वाहिशों का समन्दर शब्दों के बन्धनों में बंधे हुए अब यही प्रेम मेरा समीकरण है जहां मेरा प्रेम ही मुझसे लिखवाता हैं तुम कहते हो कि प्रेम नहीं अभी […]

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