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चित्रगुप्त-महोत्सव और कवि-सम्मेलन सम्पन्न

चित्रगुप्त सर्वसमाज के आराध्य देव हैं : आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘साहित्यांजलि प्रज्योदि’ और ‘अखिल भारतीय कायस्थ महासभा’, प्रयागराज के संयुक्त तत्त्वावधान में ‘सारस्वत सभागार, लूकरगंज, प्रयागराज में अध्यात्म और संस्कृति का दिव्य ज्योति प्रज्वलित कर, सम्पूर्ण वातावरण को आलोकित किया गया। आकाशवाणी इलाहाबाद-केन्द्र के निदेशक लोकेश शुक्ल, प्रख्यात संगीतज्ञ आर० एस० चित्रांशी, उदीयमान गायिका लक्ष्मी श्रीवास्तव तथा चर्चित तबलावादक राजेश श्रीवास्तव ने विद्या-ज्ञानदायिनी माँ शारदा, मंगलदायक गणेश तथा चराचर जगत् के प्रथम न्यायकर्त्ता चित्रगुप्त की विधिवत् सांगीतिक आराधना कर सभागार को संगीतमय बना दिया था।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए, भाषाविद् और समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “चित्रगुप्त सर्वसमाज के आराध्य देव हैं। जनसामान्य उनकी पूजा करता है; परन्तु आज तक नहीं जान पाया कि उनका नाम ‘चित्रगुप्त’ क्यों पड़ा। हमारे वेदों ने हज़ारों वर्ष पहले ही बता दिया था कि जब जीव की मृत्यु हो जाती है तब कुछ समय के लिए उसका मस्तिष्क जीवित रहता है। उस समय वह अपने कर्मों को ‘चित्र’ के रूप में देखता रहता है, जो कि ‘गुप्त’ रहता है। उसके उन कर्मों का सम्पूर्ण विवरण जिसके पास रहता है, उसे ‘चित्रगुप्त’ कहा गया है।” मरणोपरान्त जीव की मस्तिष्कजीविता की पुष्टि विश्वविज्ञानियों ने भी की है।” मुख्य अतिथि सुनीता दरबारी और विशिष्ट अतिथि पं० ब्रजभूषण शुक्ल ने सभी के प्रति मंगलकामना व्यक्त कीं।

कवि-सम्मेलन के आरम्भ में रक्त-सम्बन्धों की विडम्बना का चित्रण करते हुए युवा कवि सौरभ मुसाफ़िर ने एक गीत सुनाया– पुत्र को यह ज्ञात नहीं, छिपकर पिता जी क्यों रोते हैं। कलियुग में अब श्रीराम नहीं, दशरथ वन में जाते हैं। राजेश सिंह ने सुनाया– दर्द अन्तस् में जब पला होगा, अश्क बनकर कहीं ढला होगा। संचालक डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने दोहा सुनाया– एक पिता की है यही बस इतनी पहचान। झोली में भरकर सदा लाता है मुसकान।। डॉ० रवि मिश्र ने प्रेमदर्शन की अभिव्यक्ति इस रूप में की, “उसने फूल नहीं भेजे हैं, न प्यार जताया करती है। जब मेरी आँखें नम होती हैं, वह सागर हो जाया करती है। लोकेश शुक्ल ने सुनाया– फ़ज़ाओं में सदाएँ गूँजती यूँ, मुक़द्दत हिन्द का पैग़ाम जैसे। आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने सुनाया– सदियों से भटकती हुई तलाश लिखता हूँ, हवा, पानी, आँधी और बतास लिखता हूँ। अभिषेक केसरवानी ने पढ़ा– आँखों में चमक इतनी कैसे ये कर लिया, बिजली निचोड़ करके हाथों में भर लिया। रुस्तम इलाहाबादी ने सुनाया– पहले जाँचा-परखा कर, फिर किसी पे भरोसा कर, वक़्त से तू समझौता कर, वक़्त बुरा है समझाकर। डॉ० नायाब बलियावी ने सुनाया– जब कभी ठण्ढ पहाड़ों से उतर आती है, ये हक़ीक़त है, ग़रीबों के ही घर जाती है। विपिन दिलकश ने पढ़ा– किसी ने कहा कि दिल से तमन्ना निकालिए, मिलने-मिलाने का कोई रस्ता निकालिए। डॉ० वीरेन्द्र तिवारी ने गीत पढ़ा– एक पल भी तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं, सब कुछ तुम्हारे बिना प्रार्थना भी नहीं। रामलखन चौरसिया ने सुनाया– कोयल भागी मंच से, गर्दभ गावत फाग। हारा हंस चुनाव में, जीत गया है काग।।

समारोह की व्यवस्था में ज्योति चित्रांशी की विशेष भूमिका रही। समारोह का संयोजन रोचक दरबारी और आलोक अग्रवाल ने किया। समारोह में गरिमा, नीरखी, प्रशान्त, राजू, प्रेमनारायण, तनु, पुष्पा आदि की उपस्थिति रही।

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