साम्प्रदायिकता और प्रगतिशीलता

 

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


कल विलम्ब रात्रि में अचानक मेरा घर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते सम्बित पात्रा और अतुल अनजाना आ गये। हम तीनों किसी और विषय पर संवाद करना चाहते थे कि अचानक सम्बित और अतुल में ‘साम्प्रदायिकता’ और ‘प्रगतिशीलता’ को लेकर बहस शुरू हो गयी। दोनों अपने-अपने तर्क को लेकर भिड़े हुए थे; रुकने का कोई नाम नहीं ले रहा था, अन्तत:, दोनों ने मेरी ओर देखकर कहा, “डॉ० साहेब! हम दोनों में कौन सही बोल रहा है? वैसे आप यदि हमसे असहमत हों तो अपना तर्क रखिए।”
वास्तव में, मैं दोनों के विचारों से सहमत नहीं था, इसलिए मैंने दोनों की ओर भेदभरी मुसकुराहट के साथ (वैसे मैं कब मुसकुराता हूँ, पता नहीं।) उत्तर दिया, ” सच तो यह है कि ‘साम्प्रदायिकता’ और ‘प्रगतिशीलता’ शब्दों की व्यावहारिकता ने आज़ादी के बाद से देश में विषाक्त कटुता फैला रखी है।” फिर सम्बित पात्रा को निहारते हुए मैंने कहा, ” साम्प्रदायिकता ने धर्म के नाम पर देश में आग लगा दी है। आश्चर्य है, इतना सब होने के बाद भी आप ‘मायने’ पूछ रहे हैं? सम्बित जी! अब यथार्थ उत्तर सुनिए : सनातन के नाम पर हिन्दू-हिन्दूत्व, इसलाम के नाम पर मुसलमान-मुसलमानत्व इत्यादिक तथाकथित धर्मों का परचम लहरा कर जनजीवन अस्त-व्यस्त करना साम्प्रदायिकता है, जो कि आप लोग बाख़ूबी कर रहे हैं।”
उसके बाद अतुल अनजाना की ओर नज़रें ले जाते हुए मैंने कहा, ” अनजाना जी!काहें अनजान बन रहे हो। घर-परिवार में बहू-बेटियों को क़ैद करके रखना और दूसरों के घर में ताक-झाँक करना तथा मंचों से आस्तीन चढ़ाकर नारी-विमर्श पर प्रवचन करना ‘प्रगतिशीलता’ है।”
इतना सुनते ही दोनों की आँखों ने न जाने क्या-क्या गुफ़्तुगू कीं कि सम्बित पात्रा ‘लघुशंका’ के बहाने वहाँ से खिसक लिये, जबकि पाँच मिनट बाद अतुल अनजाना ‘हँसिया-बाली’ का झण्डा लिये हुए कान में मोबाइल सटाकर मेरी ओर देखकर बोले,”सर जी! ‘ऑफ़िस में कुछ वी०आई०पी० कॉमरेड आ गये हैं; जल्दी फिर मिलेंगे।” वे भी सटक लिये।
अचानक चिड़ियाँ चहचहाने लगीं; पलकें खुलीं तो माजरा समझ में आ गया। फिर एक ही वाक्य निकला : धत् तेरी की!
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ८ अप्रैल, २०१८ ई०)

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