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महीयसी महादेवी वर्मा की शब्दसत्ता : एक अनुशीलन

चित्र-विवरण-- सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध में-- डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय और महादेवी वर्मा।

आज (११ सितम्बर) ही की तिथि में महादेवी जी का शरीरान्त हुआ था।

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

प्रयाग-आगमन और क्रॉस्थवेट स्कूल, बाई का बाग़, इलाहाबाद में प्रवेश पाने के बाद महादेवी जी की साहित्य-साधना अबाध्य गति में चलती रही। ‘माँ ने सुनी एक करुण कथा’ का प्राय: सौ छन्दों में वर्णन कर, महादेवी जी ने खण्ड काव्य की रचना कर दी थी। सुभद्रा कुमारी चौहान जी से उनकी भेंट इसी विद्यालय में हुई थी, तब महादेवी जी पाँचवीं और सुभद्रा जी सातवीं कक्षा में पढ़ती थीं। मिडिल स्कूल में अध्ययन से पूर्व ही महादेवी जी का ध्यान बाह्य जीवन के दु:ख की ओर गया और तभी से ‘अबला’, ‘विधवा’ आदिक शीर्षक से शब्दचित्र (यहाँ ‘रेखाचित्र’ का प्रयोग अशुद्ध है।) स्थान पा चुके थे। स्कूल के छात्रावास में महादेवी जी बहुत कम बोलती थीं। वे गुमसुम बैठीं अपनी पुस्तक में लगी रहती थीं।

श्रीधर पाठक की पुत्री ललिता पाठक के साथ उनका विशेष लगाव था। स्कूल में उनका जीवन ‘बाल भगतिन-जैसा था। अपनी इसी प्रवृत्ति के कारण वे कवि-सम्मेलनों में अधिक भाग नहीं ले पाती थीं। विद्यापीठ और घर में बाहरी-भीतरी क्षेत्र की सीमाएँ रहीं।

वे इलाहाबाद से प्रकाशित क्रान्तिकारी पत्रिका ‘चाँद’ में वर्ष १९३१ से वर्ष १९३४ तक लिखती रहीं, जिनमें से २१ निबन्धों का संकलन नारी की स्थिति, अधिकार, कार्यक्षेत्र, व्यवसाय, समस्याओं तथा समाज शक्ति में नारी की स्थिति का अमूल्य दस्तावेज़ है। साहित्यिक परिवारों से इलाहाबाद में आनेवाले साहित्यकारों के लिए तो उनका निवास उनका ‘घर’-जैसा ही था; किन्तु अन्य अतिथियों के लिए भी उनका द्वार मुक्त रूप से खुला ही रहता था। मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था,”मेरी प्रयाग-यात्रा केवल संगम-स्नान से पूरी नहीं होती; उसको सर्वथा सार्थक बनाने के लिए मुझे सरस्वती (महादेवी) के दर्शन के लिए प्रयाग महिला विद्यापीठ जाना पड़ता है। संगम में कुछ फूल-अक्षत चढ़ाना पड़ता है। सरस्वती मन्दिर में कुछ प्रसाद मिलता है। ‘साहित्यकार संसद्’ हिन्दी के लिए उन्हीं का प्रसाद है।”

विविध आयोजनों में महादेवी जी जीवनपक्ष, सामाजिक पक्ष, सामाजिक प्रतिक्रिया तथा सामाजिक मूल्यों आदिक विषयों पर विशद और विस्तृत चर्चा करती थीं। यह एक अलग विषय है कि वे अन्तर्मुखी थीं। वे विरोध को जीती थीं और प्रतिकार करने की क्षमता भी विकसित कर लेती थीं। ऐसा नहीं देखा गया कि वे समकालीन साहित्यकारों में इतनी घुली-मिली रही हों अथवा घुल-मिल जाती रही हों। हाँ, वे सभी का समादर करती थीं। यही कारण है कि जब भी कोई बाहर का साहित्यकार इलाहाबाद आता था, वह महादेवी जी से मिलने की अभिलाषा को प्राथमिकता देता था। इलाहाबाद के सभी प्रसिद्ध साहित्यकार उनसे भेंटकर, तत्कालीन काव्य-परिदृश्य पर संवाद-परिसंवाद अवश्य करते थे; उनसे दिशा-निर्देश की चाह रखते हुए मिलनेवाले साहित्यकार-लेखक, कवि-कवयित्री, पत्रकार, समीक्षक आदिक उनकी ओर से कभी निराश नहीं होते थे। यही कारण है कि अशोकनगर, इलाहाबाद-स्थित उनका निवास ‘साहित्यकार-संसद्’ के रूप में विख्यात रहा।

निराला जी की भाँति वे भी किसी साहित्यकार का अपमान ‘स्वयं’ का अपमान समझती थीं। आर्थिक परिस्थिति से विक्षिप्त निराला जी को महल में रखने का उनका स्वप्न ‘साहित्यकार-संसद्’ निर्माण से पूर्ण हुआ था। यह अलग बात है कि ‘साहित्यकार-संसद्’ वर्तमान में ‘विवाद’ का विषय बना हुआ है और जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसका निर्माण कराया गया था, वह अब पूरी तरह से इलाहाबाद और बाहर के साहित्यकारों को अँगूठा दिखा रहा है। उस ट्रस्ट की सम्पत्ति को कुछ लोग अपनी सम्पदा मानकर स्वेच्छाचारिता का परिचय दे रहे हैं और स्वयं को साहित्यकार-कवि माननेवाले लोग ‘गांधी जी के तीन बन्दर’ का चरित्र जीते आ रहे हैं।

बहरहाल, महीयसी महादेवी वर्मा ने अपनी सारस्वत लेखनी से इलाहाबाद-सहित शेष भारत को शब्दधर्मिता का जो गुण-धर्म दिया है, वह चिर-कालीन स्मरणीय रहेगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ११ सितम्बर, २०२१ ईसवी।)