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चिन्तन की समय-सत्य कड़ी

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

मनसा-वाचा-कर्मणा परिशुद्ध मनुष्य को कोई पसन्द नहीं करता; क्योंकि वह प्रत्येक सत्य को ‘सत्य’ के साथ निर्लिप्त भाव के साथ कहता है; उसके कथन और कर्म में कोई भेद नहीं होता। लक्ष्य-संधान करते समय उसे कण्टकाकीर्ण पथ को प्रशस्त कर अग्रसर होना पड़ता है। कोई अदृश्य शक्ति उसकी धैर्य की परीक्षा करती रहती है। ऐसे में, मनुष्य को संतुलित होकर अपने कर्म के प्रति सन्नद्ध होना चाहिए; अंततः, विजय उसी की होती है; जीवन के कर्म-क्षेत्र का ‘महारथी’ वही होता है तथा मृत्यूपरान्त (‘मृत्योपरान्त’ अशुद्ध शब्द है।) भी उसका वही सत्य उसके साथ रहता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २० मई, २०२१ ईसवी।)