सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

2007 की 02 ख़बरों की परछाई में आपको आज ले चलते हैं मिल के वीरान परिसर

1999 में बन्द हुई लक्ष्मी शुगर मिल फिर नहीं बन सकी चुनावी मुद्दा

बृजेश ‘कबीर’ –
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1993 में लक्ष्मी शुगर मिल द्वारा संचालित गंगा देवी इण्टर कॉलेज में नौवीं कक्षा में दाखिला लिया था। तब मिल की मशीनों की कर्कश आवाज़ हजारों कामगारों के लिए सुरीले राग की तरह होती थी और लाखों लोगों के ज़ायके में मिठास घोलती थी। हम भी बहुत बार खोया घर से लेकर जाते और मिल के भीतर ताज़ी शक्कर मिला कर खाते थे। हमारे बलशाली सहपाठी #विवेक_गुप्ता मिल में जाने वाले ट्रकों से गन्ना खींचते थे और मेरे सहित सहपाठी #दीपक_गुप्ता, #हिमांशु_मिश्रा_गिल्लू, #मनोज_गुप्ता आदि आदि कॉलेज के सामने डिस्पेंसरी की बाउण्ड्री पर बैठ बड़े चाव से उन गन्नों को चूसते थे।

#राष्ट्रीय_सहारा के 02 जुलाई 2007 के अंक में ‘फिर गुलजार हो सकती है चीनी मिल’ और 09 जुलाई 2007 के अंक में ‘आस चढ़ी परवान : हरदोई चीनी मिल भी होगी गुलजार’ शीर्षक वाली ख़बरों की जो कतरनें देख रहे हैं आप वो आज हमारी फाइल का हिस्सा हैं। हमारी लिखीं इन ख़बरों पर बात से पहले बताते हैं मिल का संक्षिप्त इतिहास। लोकल के उद्योगपति बन्धु दया विनोद और सरन बाबू ने 1936 में लक्ष्मी शुगर मिल की स्थापना की थी। शक्कर के साइज के चलते जो रसूख इस मिल को हासिल था, वह दूसरी मिलों के लिए रश्क का सबब था। साल 1984 में यूपी की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने मिल का अधिग्रहण कर गन्ना एवं चीनी विकास निगम को सौंप दिया था।

सरकारी हाथों में जाने के बाद मिल की साख को ग्रहण लग गया। किसानों के गन्ने का भुगतान लटकने लगा तो उनका गन्ने की बुवाई से मोहभंग हो गया। गन्ने का रकबा घटा तो मिल को क्षमता के मुताबिक गन्ना नहीं मिलने से उत्पादन गिरने लगा। साल 1999 में हालात ये बने कि राज्य की तत्कालीन भाजपा सरकार ने घाटे का हवाला देते हुए गन्ना एवं चीनी विकास निगम की 36 में 15 मिलों को गजट जारी कर बन्द कर दिया, जिसमे एक लक्ष्मी शुगर मिल भी थी। मिल का बन्द होना स्थायी और अस्थायी करीब 2,000 कर्मचारियों के लिए बड़ा सदमा था।

मिल में कार्यरत 1,200 मुस्तकिल कामगारों को स्वैछिक सेवानिवृत्ति दे दी गई थी। कुछ कामगारों को प्रॉविडेण्ट फण्ड का 60 फ़ीसदी भुगतान और कुछ को आधी-अधूरी पेंशन मिली। बहुत ऐसे भी थे जिन्हें कुछ नसीब नहीं हुआ। बड़ी संख्या में किसानों का भुगतान मारा गया। गैर ज़िलों के कामगार जड़ों की ओर लौट गए। स्थानीय थे जो, वह छोटा-मोटा धन्धा या मज़दूरी करके ज़िन्दगी की गाड़ी खींचने लगे। कालान्तर में मिल की मशीने या तो डिस्पोज कर दी गईं या फिर आसपास के गांव वालों ने चुराकर कबाड़ में बेंच दीं। मिल के तकनीकी विभाग के कर्मचारी रहे सरदार हरदयाल सिंह आज सर्कुलर रोड पर साईकिल रिपेयरिंग और स्पेयर पार्ट्स की दुकान चलाते हैं। वह मिल चालू करवाने के सिलसिले में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी और उसके बाद राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से मिले, लेकिन आश्वासन से ज़्यादा कुछ भी लेकर नहीं लौटे।

2007 में मायावती सरकार ने चीनी मिल का ताला खुलने की उम्मीद तब जगाई, जब सहकारी चीनी मिल संघ की बन्द 28 मिलों को निजी क्षेत्र में सौंपने का फैसला किया। हरदयाल को तो नहीं, लेकिन मिल के एक अन्य पूर्व कर्मचारी बाबूलाल को आस बंधी कि गन्ना एवं चीनी विकास निगम की बन्द मिलों के दिन भी बहुरेंगे। उनका कहना था, 12 बरस में घूरे के दिन भी बहुर जाते हैं, ये तो फिर भी मिल है। बाबूलाल की आस महीना भीतर ही परवान चढ़ती भी दिखी जब माया सरकार ने गन्ना एवं चीनी विकास निगम की बन्द 33 मिलों के निजीकरण का निर्णय लिया।

लेकिन, इसके बाद मिल को निजी हाथों में सौंपे जाने की बाबत कोई सुगबुगाहट नहीं मिली, मायावती की सरकार का कार्यकाल पूरा होने तक। 2012 में अखिलेश सरकार आई और उसका भी कार्यकाल पूरा होने को है। 2012 के बाद 2017 के चुनाव में भी लक्ष्मी शुगर मिल किसी दल के एजेण्डे में नहीं रही। मिल परिसर उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद के हवाले करने की ख़बरें आईं थी काफी पहले। अब क्या कुछ हो रहा है या होना है, किसी को खबर हो तो बताए भाई।