जयपुर में हिन्दीमय होता ‘एन०आइ०टी०, उत्तराखण्ड

चित्र-विवरण : बायें से :-- डॉ० सन्तोष यादव, डॉ० मुथुसामी तथा डॉ० अजय कुमार चौबे मुख्य अतिथि और मार्गदर्शक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय को समलंकृत करते हुए ।

अधिकतर लोग का मानना है कि चिकित्सा,अभियान्त्रिकी, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, रक्षा-प्रतिरक्षा-आरक्षा, कृषि, वानिकी आदिक विषयों के विद्यार्थी और अध्यापक ‘हिन्दी-भाषा’ को ग्रहण करने, सीखने, संशोधित-परिष्कार करने के प्रति सजग और जागरूक नहीं रहते। उन लोग की मान्यता अंशत: सत्य तो है; परन्तु पूर्ण नहीं। ऐसा सिद्ध कर दिखाया है, जयपुर, उत्तराखण्ड के ‘राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान’ (एन०आइ०टी०) ने।

ज्ञातव्य है कि उक्त संस्थान की ओर से हिन्दी-दिवस के अवसर पर जयपुर (राजस्थान) में ‘मदनमोहन मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान’ (एम० एन० आइ० टी०) के सभागार में राष्ट्रीय भाषिक समारोह ‘समग्र हिन्दीभाषा कर्मशाला’ का पंचदिवसीय (१४ सितम्बर- १८ सितम्बर, २०१९ ई०) आयोजन किया था, जिसके बहुविध आयोजन में वहाँ के प्राध्यापक और संयोजक डॉ० अजय कुमार चौबे और उनके सहयोगी प्राध्यापक डॉ० सन्तोष यादव की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।

एन० आइ०टी०, उत्तराखण्ड की ओर से जयपुर में आयोजित पंचदिवसीय (१४ सितम्बर से १८ सितम्बर, २०१९ ई० तक) ‘राष्ट्रीय हिन्दीभाषा-मन्थन’ कर्मशाला में सिद्धो कान्हो मूर्मू विश्वविद्यालय, राँची ( झारखण्ड) में हिन्दीविभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ० अजय शुक्ल-द्वारा भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय के कर्तृत्व-व्यक्तित्व पर आधारित शोधप्रबन्ध का लोकार्पण करते हुए डॉ० धर्मेन्द्र त्रिपाठी, डॉ० एच० मुथुसामी, डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, डॉ० अजय कुमार चौबे तथा डॉ० लालता प्रसाद।

प्रयागराज से पधारे भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उक्त राष्ट्रीय कर्मशाला में मुख्य अतिथि और मार्गदर्शक थे। उन्होंने दीप प्रज्वलित कर शैक्षिक समारोह का उद्घाटन किया था। माँ शारदा के चित्र पर पुष्प चढ़ाकर सम्पूर्ण वातावरण सारस्वतमय बना दिया था।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का एकल प्रदर्शन वास्तव में, विलक्षण था। आरम्भ में, विद्यार्थी और शिक्षकगण सभागार में गुमसुम बैठे थे; परन्तु सभी के चेहरे पर कुतूहल, जिज्ञासा तथा विस्मय के भाव तैरते दिखायी दे रहे थे। जैसे-जैसे मार्गदर्शक डॉ० पाण्डेय ने ‘हिन्दीभाषा की बदलती प्रवृत्ति तथा तकनीकी और प्रशासनिक गतिविधियों पर इसके प्रभाव’ को बताना और समझाना प्रारम्भ किया था वैसे-वैसे कर्मशाला में सहभागिता कर रहे विद्यार्थी और अध्यापक- गण के चेहरे सहज होते गये और वे सभी संवाद-प्रश्न-प्रतिप्रश्न और उत्तर-प्रत्युत्तर की प्रक्रियाओं से जुड़ते गये। देखते-ही-देखते सभागार में बैठे प्रशिक्षणार्थियों में सीखने के प्रति ललक जाग्रत् हो उठी। उतावलापन इतना अधिक दिख रहा था, मानो वे एक-दो घण्टे के भीतर सब-कुछ सीख लेना चाह रहे हों। यह एक शुभ-संकेत है। डॉ० पाण्डेय ने इस ओर चिन्ता व्यक्त की कि भारत-शासन का तकनीकी शब्दावली आयोग जिस प्रकार की क्लिष्ट और अनुपयुक्त हिन्दी- शब्दावली तैयार कराने में अब तक करोड़ों रुपये व्यय कर चुका है, उससे सुस्पष्ट हो चुका है कि वह सुग्राह्य शब्दरचना कराने में असमर्थ है। यही कारण है कि आयोग की कुछ ही पारिभाषिकी और तकनीकी शब्दावली व्यवहार में हैं। अपने मत-प्रतिपादन के पक्ष में उन्होंने कई शब्दों की निरर्थकता पर प्रकाश डाले थे। इसके साथ ही उन्होंने भाषा, विभाषा, बोली आदिक के विविध पक्षों से विद्यार्थी और अध्यापकवृन्द को अवगत कराया था।

सम्भागाध्यक्ष (राजभाषा) प्रो० एच० मुथुसामी भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का सम्मान करते हुए

विषय विशेषज्ञ डॉ० पृथ्वी नाथ पाण्डेय ने कर्मशाला में अगले दिन ‘मौखिक और लिखित भाषाओं के अशुद्ध-अनुपयुक्त और शुद्ध-उपयुक्त रूपों’ को पढ़ना और लिखना सिखाया। उन्होंने अनुवाद और पत्रलेखन की बारीक़ियों तथा शिक्षा, साहित्य, व्यवसाय, मीडिया आदिक क्षेत्रों में निरंकुश भाव से किये जा रहे अशुद्ध और अनुपयुक्त शब्दप्रयोग से विमुख रहकर शुद्धलेखन के प्रति आग्रहशीलता का परिचय देने के लिए आह्वान किया था। उन्होंने ककहरा (बारह खड़ी), स्वर-व्यंजन, संयुक्त व्यंजन, विराम चिह्नों के उपयुक्त प्रयोग आदिक को सिखाया था। इसी अवसर पर सिद्धो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, राँची (झारखण्ड) के सहायक प्राध्यापक डॉ० अजय शुक्ल-द्वारा डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय के व्यक्तित्व-कर्तृत्व पर आधारित शोधप्रबन्ध का लोकार्पण किया गया था। समारोह में सम्भागाध्यक्ष (राजभाषा) प्रो० एच० मुथुसामी का हिन्दी-माध्यम में सम्बोधन सभागार में समुपस्थित समस्त सहभागियों के लिए हर्षदायक रहा। डॉ० पाण्डेय ने कार्यशाला-कर्मशाला, जन्मदिन-जन्मतिथि, सहस्त्र-सहस्र, नाप-माप, तौल-तोल वाङ्गमय-वाङ्मय, वाह्य-बाह्य, श्वाँस-श्वास-श्वसन, मात्रा-संख्या, विज्ञान-विज्ञानी-वैज्ञानिक, योगदान दिया-योगदान-किया, फूल-कली, आरोपी-आरोपित आदिक बड़ी संख्या में शब्दों की शुद्धता और अशुद्धता की ओर ध्यान आकर्षित किया था, जो कि सहभागियों को विस्मित करनेवाले थे। समारोह में प्रो० एच० मुथुसामी का हिन्दी म़े सम्बोधन सभागार में उपस्थित समस्त सहभागियों के लिए हर्षदायक रहा। अपने स्वागतभाषण में तमिलनाडु के मूल निवासी प्रो० मुथुसामी ने कहा,”हिन्दी सम्पूर्ण विश्व में बोली जानेवाली प्रथम स्थान पर रहनेवाली भाषा है। जितना हो सके, हमें हिन्दी पर गर्व करना चाहिए।”

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