घोर ‘अतिवाद’ का परिचय देती भारत-सरकार!

भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

किसकी पहल पर जम्मू-कश्मीर में ‘विदेशी’ सांसद बुलाये गये?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

भारत की सरकार इन दिनों जिस तरीक़े से अपने चरित्र-चाल-चेहरा को अन्तरराष्ट्रीय मंचों से ख़ूबसूरत दिखाने की कोशिश कर रही है, वे बेहद घिनौने हैं। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जम्मू-कश्मीर के हालात को बेहतर दिखाने के लिए ‘यूरोपीयसंघ’ के २७ सांसदों को जम्मू-कश्मीर भेजा गया है, जिनमें से २२ सांसद धुर दक्षिणपन्थी गुट के हैं तथा २ सांसद सेण्टर-लेफ़्ट पार्टी के हैं। वहीं जब भारतीय सांसदों ने जम्मू-कश्मीर में जाकर वहाँ की वास्तविक स्थिति जानने के लिए केन्द्रीय शासन से अनुमति माँगी थी; माँग रहे हैं तब उन्हें जाने से मना क्यों किया गया था; किया जा रहा है। जम्मू-कश्मीर के सन्दर्भ में सभी सांसदों को वहाँ की वास्तविकता दिखाने के नाम पर ‘नैनी झील’ में सैर-सपाटे कराकर वास्तविक स्थिति से अवगत कराया जा रहा है? साहस यदि हो तो बन्दी बनाये गये वहाँ के नेताओं, वहाँ की न्यायिक गतिविधियों के साथ जुड़े लोग, औद्योगिक कार्यों में लगे लोग आदिक से मिलवाओ, सही तस्वीर सामने आ जायेगी।

अब समझिए, उस महिला की माया को, जिसका नाम ‘मादी शर्मा’ है। उस महिला को नरेन्द्र मोदी का क़रीबी समझा जा सकता है। ऐसा इसलिए कि उस महिला के नरेन्द्र मोदी के साथ कई ऐसे चित्र हैं, जो किसी सामान्य व्यक्ति के नहीं कहे जा सकते। मादी शर्मा वह महिला है, जिसने अनेक ई०मेल के माध्यम से यूरोपीय संघ के सांसदों के साथ सम्पर्क किये थे। मादी शर्मा के वेब साइट पर जाइए तो अँगरेज़ी में ‘वेलकम’ लिखा हुआ है और उसका चित्र भी अंकित है। वह मादी शर्मा स्वयं को ‘इण्टरनेशनल बिजनेस ब्रोकर, शिक्षा उद्यमी’ कहती है। वह महिला ‘वीसिट’ नामक एन०जी०ओ० चलाती है। उसने अपने मेल में सांसदों से इस आशय की बात कही थी कि वह २८ अक्तूबर, २०१९ ई० को सांसदों को नरेन्द्र मोदी से मिलवायेगी/मोदी मिलेंगे। एक अन्य सांसद क्रिस डेविस ने आदी शर्मा के मेल का उत्तर देते हुए लिखा था :– मैं यदि आऊँगा तो फ्री होकर जिससे चाहूँगा, मिलूँगा। मैं किसी भी सुरक्षा-चक्रव्यूह से मुक्त होकर जिधर चाहूँगा, जाऊँगा। इस पर कथित मादी शर्मा नामक महिला ने आरम्भ में तो स्वीकार कर लिया था; परन्तु कुछ ही दिनों बाद उसने एक मेल भेज दिया था, जिसमें उसने प्रकारान्तर से क्रिस डेविस को आने से मना कर दिया था। उस महिला के विषय में इस तथ्य का भी उद्घाटन हुआ है कि वह ‘हलके-फुलके’ लोग को लेकर अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर तथाकथित लोग के साथ मित्रता करने में माहिर है। ऐसे में, उसने नरेन्द्र मोदी के नाम को भुनाकर अपना सीना चौड़ा किये घूम रही है।

अब प्रश्न है, किसके इशारे पर यूरोपीय संघ के सांसदों को मादी शर्मा ने पत्र भेजे थे।

वास्तविकता यह है कि जम्मू-कश्मीर के सभी प्रमुख नेताओं को बन्दी बनाकर रखा गया है, जो ‘हिटलरशाही’ का प्रतीक है। प्रश्न है, जब जम्मू-कश्मीर के हालात बेहतर हैं तब महीनों से विपक्षी नेताओं को बन्दी बनाकर क्यों रखा गया है? वहाँ के शिक्षणसंस्थानों के १४ लाख विद्यार्थी ८६ दिनों से अपने शिक्षालयों में नहीं गये हैं। क्यों बन्द रखा गया है, उनका विद्यालय? वहाँ के औद्योगिक प्रतिष्ठान बन्द क्यों हैं? आज (२९ अक्तूबर) अन्तरराष्ट्रीय इण्टरनेट डे’ है; किन्तु जम्मू-कश्मीर में ८६ दिनों से इण्टरनेट-सुविधा अवरुद्ध रखी गयी है। क्या यही ‘राजधर्म’ है? यदि हाँ तो बार-बार धिक्कार है, ऐसी शासननीति को! अमित शाह ने भारतीय संसद् में यह असत्य वाचन क्यों किया था :– जम्मू-कश्मीर में कोई नेता बन्दी नहीं है।

यूरोपीय सांसदों को जम्मू-कश्मीर भेजने का निर्णय किसका है? उन विदेशी सांसदों को जम्मू-कश्मीर जाने का न्योता देकर और भारतीय सांसदों को वहाँ जाने की अनुमति न देकर, कथित ‘मोदी-सरकार’ भारत के सांसदों का अपमान करते हुए, अपने ‘बेहद घिनौने’ आचरण का परिचय क्यों दे रही है?

हम ‘मुक्त मीडिया’ के समस्त मित्रमण्डल को इस विषय पर घोर आपत्ति है कि विदेशी सांसदों को जम्मू-कश्मीर क्यों जाने दिया गया है? क्या इस विषय पर विपक्ष के प्रमुख नेताओं के साथ विमर्श किया गया था? भारत की सरकार का ऐसा कुत्सित-गर्हित-घृणित आचरण भारतीय सांसदों का अपमान है। दूसरे शब्दों में, भारतीय लोकतन्त्र के साथ यह घिनौना मज़ाक़ है।

हमारे विपक्षी नेता भी दो कौड़ी के हैं, अन्यथा तथाकथित मोदी-सरकार इतनी मनबढ़ नहीं दिखती। विपक्षियों में यदि साहस हो तो अनिश्चित काल के लिए एक स्वर में भारतीय संसद् का बहिष्कार करें।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २९ अक्तूबर, २०१९ ईसवी)

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