सरकार की घृणित आर्थिक चाल!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


मैं एक सामान्य लेखक हूँ। मेरी आर्थिक स्थिति सामान्य स्तर की है। मैंने एक पुस्तक मुद्रित करायी थी। जब मुद्रक को भुगतान किया तब मैंने उस मुद्रक से ‘मुद्रित वैध कैशमेमो’ माँगा। उसने ‘जी०एस०टी०’ के चलते, उस वैध कैशमेमो को देने के लिए नियमत: अतिरिक्त ८०० रुपये माँगे थे।
यह तो ‘एक’ ईमानदार उदाहरण है।
‘जी०एस०टी०’ के नाम पर आज सत्ताधारी सामान्य वर्ग की कमर तोड़ रहे हैं और अपना ख़ज़ाना भर रहे हैं। होटल में भोजन करने से लेकर कोई भी काम करने के लिए इस सरकार ने देशवासियों की गति और प्रगति थाम ली है। सामान्य स्तर के देशवासियों के मन-मस्तिष्क को कुन्द कर दिया गया है। वे जिधर देखते हैं, उनके लिए ‘प्रगति के मार्ग’ अवरुद्ध दिखते हैं।
अब बताइए, देश के शासन चलानेवालों ने ‘जी०एस०टी०’ अर्थात् ‘एक राष्ट्र-एक कर’ के नाम पर देशवासियों के साथ कितना घिनौना मज़ाक़ किया है! वर्तमान प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ताविहीन रहने के समय कहा था : ‘जी०एस०टी०’ लागू होने से देश बरबाद हो जायेगा और जब वही व्यक्ति सत्ता पा गया तब ‘जी०एस०टी०’ लागू करा दिया क्योंकि देशवासियों को कैसे ‘दिव्यांग’ बनाया जाये, इसकी कला मोदी, शाह तथा जेटली अच्छी तरह से जानते हैं।
जी०एस०टी० के कारण ‘रीयल’, ‘लघु उद्योग’, ‘कल-कारख़ानों’ आदिक पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। आज जो देश की ‘जी०डी०पी०’, ‘आर्थिक विकास-दर’, ‘महँगाई-दर’, ‘रोज़गार की स्थिति इत्यादिक लड़खड़ायी हैं। उसके कारण के मूल में सरकार की अदूरदर्शितापूर्ण निर्णय ‘नोटबन्दी’ (नोटपरिवर्त्तन) और ‘जी०एस०टी०’ का परिणाम और प्रभाव सुस्पष्टत: दृष्टिगोचर होते हैं, जिसकी क़ीमत ‘जनविरोधी’ कृत्य करनेवाली सरकार को ठीक उसी तरह से चुकानी होगी, जिस तरह इन्दिरा गांधी-द्वारा घोषित ‘आपात्काल’ के समय की गयीं ज़्यादतियों से त्रस्त आकर देश की जनता ने काँग्रेस को कभी न भूलनेवाली सीख दी थी।
‘विकास’ का नारा लगानेवालों ने तो ‘विकास’ के नाम पर ‘हिन्दुत्व’, ‘रामजन्मभूमि’, ‘ताजमहल के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न’, ‘गोरक्षा’, ‘रोमियो स्क्वाड’, ‘खुला सम्प्रदायवाद’, ‘देशविभाजन करानेवाले बीभत्स वक्तव्य’, ‘मदरसा की राजनीति’ आदिक देश की वास्तविक प्रगति थामनेवाले कुत्सित-कलुषित कृत्य करते आ रहे हैं परन्तु अफ़सोस! ऐसे अराजक तत्त्व अपने भीतर झाँकने का साहस नहीं कर पाते।
भारतीय समाज ने उक्त समस्त स्थितियों को यदि गम्भीरतापूर्वक नहीं लिया तो परिस्थिति अति भयावह हो सकती है क्योंकि वर्ष २०१९ में पुन: सत्ता पाने के लिए वे किसी भी सीमा का अतिक्रमण कर सकते हैं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय; १९ अक्तूबर, २०१७ ई०)