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शिक्षा-परीक्षा को कलुषित और निरर्थक करती हमारी व्यवस्था

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

—- आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

श्रमिक-वर्ग की बेकारी उतना चिन्त्य नहीं है जितना कि शिक्षित-वर्ग की। श्रमिक-वर्ग कहीं-न-कहीं सामयिक काम पाकर अपना जीवन-यापन कर लेता है; परन्तु शिक्षित-वर्ग जीविका के अभाव में आधियों-व्याधियों का शिकार बनता जाता है। वह व्यावहारिकता से शून्य पुस्तकीय शिक्षा के उपार्जन में अपने स्वास्थ्य को तो गवाँ देता ही है, शारीरिक श्रम से विमुख हो,अकर्मण्य भी बन जाता है।

शिक्षित-वर्ग की बेकारी की स्थिति यह है कि प्रत्येक वर्ष लाखों पढ़े-लिखे युवा नौकरी के लिए तैयार हो जाते हैं, जबकि राज्य और केन्द्र की सरकारों के पास उन सबको खपाने के लिए कहीं-कोई कोई ठोस व्यवस्था तक नहीं है। स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय प्रतिवर्ष बुद्धिजीवी और कुर्सियों से जूझनेवाले बाबुओं को पैदा करते आ रहे हैं। नौकरशाही तो भारत से चली ही गयी; किन्तु नौकरशाही की बू भारतीयों के मन-मस्तिष्क से जा नहीं पा रही है। लॉर्ड मैकाले के स्वप्न की नीवँ भारतवासियों के मस्तिष्क में गहराई तक पैठी हुई है।

‘उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद्’ और ‘सी० बी० एस० ई०’ विगत कुछ वर्षों से जिस तरह से परीक्षा-परिणामों को तैयार कराते समय अति उदारवादिता का परिचय देती आ रही हैं, उन पर अब शासन-स्तर पर संज्ञान करने (‘लेने’ का शब्द-प्रयोग अशुद्ध है |) की आवश्यकता आ पड़ी है। ये दोनों ही परिषद् एक-दूसरे के साथ प्रतिद्वन्द्विता के स्तर पर काहिलों-जाहिलों-बेरोज़गारों-अपराधियों की प्रतिवर्ष एक दुर्दमनीय फ़ौज तैयार करने में योग दे रही हैं।

कथित दोनों ही संस्थानों ने कुछ वर्षों से जिस तरह के परीक्षा-परिणाम प्रसारित किये हैं, उससे ख़ुद-ब-ख़ुद अँगुलियाँ दाँतों-तले आ जा रही हैं! अब आप ज़रा ग़ौर कीजिए— विज्ञान में १०० में १०० अंक और अर्थशास्त्र में १०० अंक, हिन्दी में १००, इतिहास, भूगोल, अँगरेज़ी, राजनीतिशास्त्र, मनोविज्ञान आदिक विषयों में १०० में १०० अंक दिये जा रहे हैं! अब प्रश्न उठता है– इतने अधिक अंक विद्यार्थियों को किस वैधानिक और औचित्यपूर्ण नियमों के अन्तर्गत प्राप्त हो रहे हैं, फिर दूषित और भविष्यघाती मूल्यांकन-पद्धति के प्रभावी होने से वे आई० ए० एस०, इंजीनियर, डॉक्टर आदिक बनाने का ख़्वाब भी देखने लगते हैं; परन्तु कितनों के ख़्वाब पूरे हो पाते हैं, इसे हम दशकों से देखते आ रहे हैं। ‘नीट’ और ‘जे०ई०’ प्रवेश-परीक्षाओं में सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। वहीं एक अतीव मेधावी विद्यार्थी ८० से ८५ प्रतिशत अंक पाकर रह जाता है! आखिर इतनी अधिक विसंगति क्यों?

अन्ततः, इन्हीं तथाकथित टॉपरों और जो किसी भी क़ीमत पर कक्षोन्नति लायक़ भी नहीं रहते, उन्हें ९० से ९९ प्रतिशत तक अंक दिये जाते हैं। ऐसे कथित टॉपरों में से अधिकतर विद्यार्थी वे होते हैं, जो सही ढंग से न तो हिन्दी जानते-समझते हैं और न ही अँगरेज़ी! परीक्षा के टकसाल कहे जानेवाले वे दोनों ही बोर्ड विद्यार्थियों के सबसे बड़े शत्रु हैं। जब वे सभी ‘टॉपर’, उन परीक्षाओं का सामना करेंगे, जहाँ अपेक्षाकृत कम कदाचार है, वहाँ उनमें से अधिकतर बार-बार असफल होंगे और अन्त में, निराश होकर देश का ‘नेता’ बनकर विधानमण्डल और संसद् में पहुँचकर लात-जूता करेंगे; माँ-बहन को तोलेंगे; राहज़नी करेंगे तथा चोरी लूट-डक़ैती करेंगे। ऐसे ही जाहिल भारत माता के माथे का कलंक बनेंगे। गाँव-देहात के स्कूलों से नक़्ल (नकल/नक़ल)के बल पर टॉपर का तमगा अपने माथे पर चिपकाये लड़कियाँ अपनी तथाकथित क़िस्मत पर ज़ार-ज़ार रोयेंगी।

गाँव-गाँव, शहर-शहर तरह-तरह के महाविद्यालय खुल गये हैं, जो सुविधा-शुल्क लेकर प्रथम श्रेणी में पास करने का ठीका ले लेते हैं। इसे शासन जानता है और प्रशासन भी। सरकार चलानेवालों और जनप्रतिनिधि कहलानेवालों के परिवार के लोग और उनके रिश्तेदार इस मलाईदार धन्धे में सिर से पैर तक डूबे हुए हैं। इन्हीं में से अधिकतर रिश्वत देकर नौकरी भी पा जाते हैं और ऐसे लोग ही वहाँ हर तरह का पापाचार का वातावरण तैयार करते हैं; योग्य अभ्यर्थियों को आने नहीं देते, जैसा कि हम दशकों से मौन साधे देखते आ रहे हैं।

इन कुकृत्यों को बढ़ावा देने में उन माँ-बाप और अभिभावकों की सर्वाधिक भूमिका रहती है, जो रुपये की ताक़त दिखाकर-दादागिरी का प्रदर्शन कर-करवाकर अपने बच्चों और पाल्यों को अवैध तरीक़ों से प्रवेश और परीक्षा दिलवाकर समूची व्यवस्था को विकृत करते आ रहे हैं। इससे हमारे उन विद्यार्थियों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग जाता है, जो अति-मेधावी हैं; परन्तु संस्कारवान होने के कारण वे अनुचित मार्ग का चुनाव नहीं कर पाते। इसका यह अर्थ नहीं कि देश की वास्तविक प्रतिभा और मेधा के साथ खुली आँखों से अन्याय किया जाये और शासन-प्रशासन के ज़िम्मादार (जिम्मेदार/ज़िम्मेदार शब्द-प्रयोग अशुद्ध है।) लोग अपनी-अपनी आँखों पर पट्टियाँ बाँध कर ‘धृतराष्ट्र-गान्धारी’ की घृणित भूमिका में दिखते रहें। ऐसे बेईमान लोग को अब ‘सबक़’ सिखाने का समय आ चुका है।

यह परीक्षा-पद्धति अब कोढ़ में खाज का काम कर रही है। हमारे देश के अधिकतर बुद्धिजीवी और शिक्षाशास्त्री बिक गये हैं; वे सिफ़लिस के रोगी की तरह से चादर तानकर अपना गर्हित जीवन काट रहे हैं। उन्हें इस सड़ी-गली शिक्षा-परीक्षा-व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है; जागरूक-वर्ग को इसके विरुद्ध अब उठ खड़े होने की ज़रूरत है!

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ जून, २०२० ईसवी)

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