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संघर्ष की प्रतिमूर्ति फ़ादर स्टैन स्वामी सरकारी साज़िश के शिकार

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक ऐसे व्यक्तित्व का, जो मूल राष्ट्रीय धारा से जुड़कर दलितों-पतितों-वंचितों-शोषितों का संरक्षण करता रहा, ५ जुलाई को एक चिकित्सालय में निधन हो गया था। वे वही फ़ादर स्टैन स्वामी थे, जिन पर जनवरी, २०१८ ई० में ‘भीमा कोरेगाँव’ के हिंसा से जुड़े ‘एल्गार परिषद्-प्रकरण’ में लिप्त बताकर एन० आइ० ए० (नेशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी) ने ८ अक्तूबर, २०२० ई० को राँची-स्थित उनके घर से उन्हें बन्दी बना लिया था। उन पर सी० पी० आइ० (माओवादी) का सदस्य होने का आरोप लगाकर २४ जनवरी, २०२० ई० को एन० आइ० ए० को जाँच सौंप दी गयी थी। उनकी गिरिफ़्तारी के दूसरे ही दिन उन्हें एन० आइ० ए० के मुम्बई-स्थित विशेष न्यायालय में उपस्थित कर उनके विरुद्ध एक पूरक आरोपपत्र प्रस्तुत किया गया था। उस आरोपपत्र में फ़ादर स्टैन स्वामी के विरुद्ध ‘भारतीय दण्ड संहिता’ की धाराएँ १२० (बी), १२१, १२१ (ए), १२४ (ए) तथा ३४ लगायी गयी थीं। इतना ही नहीं, उन पर यू० ए० पी० ए० की धाराएँ १३, १६, १८, २०, ३८ तथा ३९ भी लगायी गयी थीं। वे अपने गम्भीर होते स्वास्थ्य के आधार पर ज़मानत-याचिका प्रस्तुत करते थे; किन्तु न्यायालय निरस्त कर देता था। अन्तत:, सरकारी साज़िश ने उनकी जान ले ली।

उनका मूल नाम स्टैनिस्लॉस लोर्दूस्वामी था। वे एक रोमन कैथोलिक पादरी थे। नब्वे के दशक में उन्होंने झारखण्ड के आदिवासियों के अस्तित्व की लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने उन आदिवासियों का खोया सम्मान लौटाने के लिए प्राणपण से संघर्ष किया था। फ़ादर का सारा जीवन मनुष्यता की रक्षा करते हुए व्यतीत हुआ था। ६ जुलाई को उनकी ज़मानत-याचिका पर सुनवाई होनी थी; परन्तु अस्वस्थ होने के कारण उन्हें कारागार से मुम्बई-स्थित होली फ़ेमिली हॉस्पिटल ले जाया गया, जहाँ उनका निधन हो गया था।

८४ वर्षीय फ़ादर एक प्रखर विचारक और मुखर प्रवक्ता थे। उन्होंने जहाँ कहीं भी शोषित-दोहित-वंचितों के साथ किये जाते रहे अन्याय और अत्याचार को देखा था, तत्काल विरोध प्रकट किया था। उन्होंने वर्ष २०१० में एक पुस्तक लिखी थी, जिसका नाम ‘जेल में बन्द क़ैदियों का सच’ था। उसमें उन्होंने बताया था कि अपने अधिकारों की माँग कर रहे आदिवासियों को किस तरह से षड्यन्त्र के अन्तर्गत बन्दी बना लिया जाता है और बिना कारण बताये कारागार में डाल दिया जाता है; उन पर ‘नक्सलवादी’ होने का आरोप मढ़ते हुए कैसी-कैसी यातनाएँ दी जाती हैं।

उनका व्यक्तित्व क्रान्तिकारिक था। वे झारखण्ड के कारागारों में जाकर बन्दियों से मिलते थे और उनके साथ वार्त्ता करते थे। उसी के आधार पर उन्होंने वर्ष २०१४ में एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि नक्सलवाद के नाम पर बन्दी बनाये गये ३,००० युवकों में से ९७ प्रतिशत ऐसे थे, जिनका नक्सली गतिविधियों से कोई लेना-देना नहीं था।

उनके क्रान्तिकारिक प्रभुत्व से भय खाकर ग़लत तरीक़े से गिरिफ़्तार करा लिया गया था।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ८ जुलाई, २०२१ ईसवी।)